नोएडा (ईएमएस)। नए शैक्षणिक सत्र 2025-26 की शुरुआत होते ही स्कूलों ने मनमानी भी शुरू हो गई है। स्कूल एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम के अलावा अपने स्तर पर निजी पब्लिकेशन की किताबें खरीदने के लिए जोर दे रहे हैं। एक तरफ स्कूलों ने फीस बढ़ा दी है, तो दूसरी तरफ परिसर में दुकानें खोल मनमाने दामों में किताबों को बेच रहे हैं। मजबूरन अभिभावकों को स्कूल के परिसर में खुली दुकानों से ही किताबें खरीदना पड़ रही है। प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबों की कीमत एनसीईआरटी पाठ्यक्रम से अधिक महंगी हैं। यदि अभिभावक स्कूल में किताबों लिस्ट की सूची मांगते हैं तो वह परिसर में खुली दुकान की तरफ इशारा कर देते हैं, दुकानदार मनमाने दामों में किताबें बेचता है। अभिभावक को मजबूरन उन्हें खरीदना पड़ रही है। जिले में लगभग 1065 सभी बोर्ड के संचालित स्कूलों में 7.5 लाख बच्चे पढ़ रहे हैं। अभिभावक ने बताया कि कक्षा में उपयोग में आने वाली स्टेशनरी का पैसा स्कूल लेते हैं,लेकिन स्टेशनरी अभिभावकों को नहीं मिलती है। पूछने पर दुकानदार का कहना होता है कि आपके बच्चे को स्कूल में स्टेशनरी मिल जाएगी। बच्चे को स्टेशनरी मिली या नहीं मिली इसकी जानकारी अभिभावकों को नहीं मिल पाती है। किस सामान का कितना भुगतान किया यह जानकारी भी अभिभावकों को नहीं दी जा रही है। बच्चे की फीस, स्टेशनरी, वाहन शुल्क, यूनिफार्म के खर्च ने अभिभावकों का बजट गड़बड़ कर दिया है। अभिभावक की कमाई का एक तिहाई हिस्सा बच्चे की पढ़ाई पर खर्च हो रहा है। स्कूलों में बढ़ती फीस और मनमाने तरीके से किताबों की तय कीमतें अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। नियमानुसार प्राइवेट स्कूलों को फीस,शिक्षकों की सैलरी,किताबों की कीमतें,वाहन शुल्क आदि को डिस्प्ले नहीं करते हैं। सभी नियमों को ताख पर रखकर स्कूल प्रबंधन मनमानी कर रहा है। अधिकारी भी मौन रहकर स्कूलों को मनमानी करने दे रहे हैं। इस संबंध में गौतमबुद्धनगर पेरेंट्स वेल्फेयर सोसाइटी के संस्थापक मनोज कटारिया ने कहा कि अधिकारियों ने लंबे समय से डिस्ट्रिक्ट फीस रेग्यूलेरिटी समिति (डीएफआरसी) की बैठक नहीं की है जिससे अभिभावकों तक जानकारी नहीं पहुंच पा रही है। बैठक न होने से पारदर्शिता पूरी तरह खत्म हो गई है। अभिभावक ऑनलाइन शिकायतें करते हैं लेकिन शिकायतों का निवारण नहीं किया जा रहा है। अजीत झा /देवेन्द्र/नई दिल्ली/ईएमएस/03/अप्रैल/2025