लेख
03-Apr-2025
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(शायर अनीस मेरठी की पुण्यतिथि पर ) शायर अनीस मेरठी कहते है, ग़लत पते के लिफ़ाफ़े सा मुझको मत समझो, मुझे तलाश करो, मैं यहीं कहीं पर हूँ। रुड़की के महान शायर अनीस मेरठी अब इस दुनिया मे नही है,लेकिन अपनी उम्दा शायरी की वजह से वे हमेशा अपने साहित्य के वतन में जीवित रहेंगे। उनका गत वर्ष अचानक जाना मुझे अंदर तक झकझोर गया था।कई वर्षों से उनकी तबीयत तो ऊपर नीचे होती रहती थी,लेकिन वे इसी ख़राब तबियत का बहाना कर चले जायेंगे,ऐसा किसी ने भी नही सोचा था।उर्दू शायरी के उस्ताद शायर अनीस मेरठी बेहद शांत स्वभाव के धीरे-धीरे बोलने वाले परिपक्व शायर थे।न जाने उनमे ऐसा क्या था ,जो मेरे मन मे उनके प्रति अथाह सम्मान रहा है।उन्हें भी मुझसे विशेष लगाव था,जब भी उनका मुझसे मिलने का मन होता तो अपनी बेटी बुशरा से मुझे फोन कराते,मुझे भी बुशरा में एक बहन का प्यार झलकता है और मैं अधिकार के साथ बुशरा को बोल देता,अब्बू से मिलने तभी जाऊंगा,जब तुम भी वहां मिलो,बुशरा सहज ही मान जाती और अपने घरेलू कामो को बीच मे ही छोड़कर अब्बू व मेरे लिए दौड़ी दौड़ी अपनी ससुराल से मायके चली आती।हिंदी साहित्य में बहन बुशरा को महारथ हासिल है,जबकि उर्दू में अनीस मेरठी को किसी गुरु या फिर उस्ताद से कम नही आंका जा सकता।कुछ साल पहले दूरदर्शन ने अनीस मेरठी का एक विशेष साक्षात्कार प्रसारित किया था,मेरे डिवाइन मिरर हिंदी चैनल पर भी उनसे उनके साहित्यिक अवदान को लेकर की गई बातचीत खूब पसंद की गई। यह मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे अनीस मेरठी का एक साक्षात्कार करने का अवसर उनकी 84 वर्ष की आयु में उनके घर पर मिला।वायदे के मुताबिक बहन बुशरा भी वहां मौजूद रही, जब बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो मुझे आभास हुआ कि अनीस मेरठी नज़्म और गज़ल विधा में शब्दों के जादूगर है,उनकी शायरी पर 2 पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी है।बिजली विभाग में नोकरी करते हुए शायरी के क्षेत्र में आगे बढ़े अनीस मेरठी का कहते थे कि शायरी में आदमी कभी मुकम्मल नही होता,जितना सीखता है उतना निखरता जाता है।वे कहते थे कि शायरी में उनके पिता के अलावा उनका कोई उस्ताद नही रहा।उनका यह भी कहना था कि कोई भी शख्स एक अच्छा शायर तभी हो सकता है,जब वह एक अच्छा इंसान हो,क्योंकि शायरी के लिए सबसे पहले एक अच्छा इंसान होना जरूरी है।सन 1936 में जन्मे अनीस मेरठी सन 1947 में आजादी मिलने के समय कक्षा 6 में पढ़ते थे ,उन्होंने बचपन मे अंग्रेजों का दौर भी देखा,तभी तो वे मानते थे कि देश में आजादी के दीवानों ने जिस आजादी का सपना बुना था,वह आज तक भी पूरा नही हो पाया है।वे मंदिर -मस्जिद के मुद्दे को मात्र सियासी मानते थे,वह भी केवल वोट की सियासत तक।अनीस मेरठी बेबाक बोलते हुए कहते थे कि आज के कवि सम्मेलन व मुशायरे केवल पैसे कमाने का जरिया बनकर रह गए है।साहिर लुधयानवी से प्रभावित अनीस मेरठी नई पीढ़ी को कुछ लिखने से पहले ग़ालिब, फैज अहमद फैज व सोज़ को पढ़ने और फिर कुछ लिखने की नसीहत देते थे।उन्होंने पहले मेरठ और फिर रुड़की में रहते हुए न जाने कितने कवि सम्मेलनों, मुशायरों में शिरकत की और अपनी मौजूदगी का एहसास अपने क़लाम से कराया।दूरदर्शन पर उनका साक्षात्कार अविस्मरणीय रहा।अफ़सोस यह रहा कि उर्दू के इस महान रचनाकार को सरकार की ओर से कभी कोई तवज्जो नही मिली।अच्छा होता वे जीतेजी सरकारी स्तर पर किसी सम्मान से नवाज़े जाते ,जिसके वे हकदार भी थे,हालांकि हम कह सकते है कि अनीस मेरठी किसी सम्मान के कभी मोहताज़ नही रहे क्योंकि उनकी उम्दा शायरी ही उनके आला होने का सबूत है और यह सबूत हमेशा जिंदा रहेगा। (लेखक विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के उपकुलपति व वरिष्ठ साहित्यकार है) ईएमएस / 03 अप्रैल 25