(4 अप्रैल को जयंती पर विशेष ) हम सिर्फ इस गौरव की अनुभूति कर सकते हैं। जो मध्य प्रदेश में रहने वाले नागरिकों को होना चाहिए। यहां पर माखनलाल जी जैसे महापुरुष ने जन्म लिया और अपने संपूर्ण जीवन में संपूर्ण मानव की आकृति कैसी होती है उसका प्रत्यक्ष दर्शन कराया। वैसे तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस देश में पृथक-पृथक हिस्सो में बड़े-बड़े महापुरुषों ने अपना योगदान दिया और उन सबके जीवन से हम चिर परिचित हैं। लेकिन यदि मैं यह कहूं कि माखनलाल जी ने साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम का संबंध कितना करीब का हो सकता है और वह एक दूसरे के प्रेरक हो सकते हैं। शायद इतना सुंदर समन्वय और और किसी महापुरुष के जीवन में हमें उस दौरान नहीं मिलेगा और यही वजह है कि जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बीच में उनका एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान है। वहीं पर साहित्य जगत में शायद उनसे भी ज्यादा विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान उनका है। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4अप्रैल 1889को मध्य प्रदेश के बाबई में हुआ था। इनके पिता का नाम नंदलाल और मां का नाम सुदरबाई था। चतुर्वेदी जी के बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया था। फलत बाल्यकाल के उन सुहाने दिनों से वंचित हो गए, खेलने खाने की आयु में उन्हें संघर्ष का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपने जीवन काल में कभी भी संघर्ष से मुंह नहीं मोड़ा। वे अध्यापक के पुत्र होने के कारण सन् 1914-15में खंडवा के प्रायमरी स्कूल के अध्यापक बने। उन्होंने गांव देखा। जमींदारों द्वारा लुटतीं फसलें देखी गरीबी देखी ही नहीं,भोगी भी। अपने समय की ललकार और चुनौतियों को भी उन्होंने सुना, उन्होंने विद्यार्थीयो को सिर्फ पाठ्यक्रम में शामिल पुस्तक ही नहीं पढाई , बल्कि स्वदेश मुकित का पाठ भी पढ़ाया। उनके पढ़ाए विद्यार्थी काफी बड़ी संख्या में राष्ट्रीय कार्यकर्ता बनकर देश भर में बिखर गए। जो प्रतिभा संपन्न थे। वे कवि ,लेखक और पत्रकार बन गए। उनकी अध्यापिकी के क्या कहने उन्हें वेतन मिलता था सिर्फ सात रुपए। लेकिन वेतन लेकर घर लौटते लौटते कुछ आने बच जाए तो बहुत बड़ी बात होती थी। विद्यार्थी उनके कपड़े तक उनसे मांग कर ले जाते थे। ऐसी स्थिति में कभी-कभी तो वे स्कूल में शाल ओढ लेते थे। अक्सर घर लौटते समय वह भी नदारद मिलती थी। वह अपने लिए कभी भी किसी से कुछ नहीं मांगते थे। धन एकत्र करना उनका लक्ष्य नहीं था। वह असमर्थ साहित्यकारों और दीन हीन विद्यार्थियों के लिए किसी से कुछ भी मांग सकते थे। कैसा टूयूशन?उस दौर में इसका चलन भी नहीं था। माखनलाल जी छात्रों को अपने घर पर निशुल्क पढ़ाया करते थे। दद्वा जेल तो 1921और 1930मे ही ग ए। 1921 में सी क्लास में रहे और 1930 में बी क्लास में। लेकिन वे महाकौशल से असहयोग आंदोलन में जेल जाने वाले वे पहले सत्याग्रही थे। और 31 वर्ष की अवस्था में एक सफल लेखक, पत्रकार और ओजस्वी वक्त के रूप में काफी शोहरत हासिल कर ली थी। उनसे अंग्रेजी सरकार डर गई थी। 1921 में सिर्फ तीन सत्याग्रही जेल गए, महात्मा भगवान दीन, पंडित सुंदरलाल और दादा माखनलाल चतुर्वेदी ,महात्मा जी नागपुर के माने जाते थे। पंडित जी सुंदरलाल उत्तर प्रदेश से आए थे। सिर्फ दादा माखनलाल चतुर्वेदी ही ऐसे थे जो महाकौशल के भूमिपुत्र और सही मायने में जनता के आदमी थे। इसलिए उनके जेल जाने और सी क्लास की यातनाए सहने से एक इतिहास बन गया। 1921 का जेल और वह भी सी क्लास है। एक ऐसे तरुण के लिए जो कुछ समय पहले मरणासन्न हो चुका था और बड़ी मुश्किल से उसे बचाया गया था। बिलासपुर जेल ने उन्हें हमेशा के लिए रोगी बना दिया। वे शायद अपनी ही पंक्तियों को दोहराते हुए जेल की मियाद रस्सी बुनते हुए पूरी करते रहे। बाद में वे अध्यापिकी छोड़ कर खंडवा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका प्रभा के संपादक बन गए थे। 1920में रायपुर के पं माधवसप्रे और कटनी के पं विष्णु शुकला ने जबलपुर से कर्मवीर नामक राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र को प्रकाशित करने की योजना बनाई और उसके संपादक के लिए उन्होंने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी को चुना। चतुर्वेदी जी कलेक्टर के पास जब कर्मवीर के प्रकाशन की अनुमति लेने गए तो कलेक्टर ने उनसे कहा दद्वा प्रदेश में हिंदी और अंग्रेजी के समाचार पत्र प्रकाशित हो ही रहे हैं तो नवीन समाचार पत्र के प्रकाशन की आवश्यकता क्यों हो रही है। चतुर्वेदी जी ने बिना किसी हिचकिचाहट के निर्भीकता से कहा कि आप जिन समाचार पत्रों का जिक्र कर रहे हैं। वे तो जी हुजूरी वाले समाचार पत्र है। उनमें जनता की आवाज सुनाई नही देती। कलेक्टर ने इतना सुनते ही चतुर्वेदी जी को कर्मवीर के प्रकाशन की अनुमति दे दी। कर्मवीर का संपादन कार्य माखनलाल जी की प्रतिभा और स्वाधीनता प्रेमी व्यक्तित्व के बहुत अनुकूल था। उन्होंने अपना उत्तरदायित्व सहर्ष स्वीकार किया और इस तरह मध्य प्रदेश की पत्रकारिता के अखिल भारतीय गौरव कर्मवीर का जन्म हुआ। यह भी कह सकते हैं कि कर्मवीर के रूप में हिंदी पत्रकारिता ने अपनी स्वतंत्र निर्भीक सत्ता की वास्तविक अभिव्यक्ति प्राप्त की। कर्मवीर के प्रथम अंग 17.1, 1920 में उन्होंने लिखा कि हम अपनी जनता के संपूर्ण स्वरूप के उपासक होंगे, अपना यह विश्वास दृढ़ रखेंगे की कोई विशेष मनुष्य या समूह ही नहीं प्रत्येक मनुष्य और समूह मातृ सेवा का समान अधिकारी है। हमारा पथ वही होगा जिस पर संसार भर सुगमता से जा सके। उनमें छत्र धारण किए हुए और चवर से सुशोभित सिर की भी वही कीमत होगी जो कृषकाय लकड़ी के भार से दबे हुए मजदूर की होगी ... हम स्वतंत्रता के हामी हैं -- मुक्ति के उपासक हैं, राजनीति में समाज में साहित्य में या धर्म में जहां भी स्वतंत्रता का पथ रोका जाएगा ,ठोकर मारने वाले का पहला प्रहार और घातक के शस्त्र का पहला बार आदर् से लेकर मुक्त होने के लिए प्रस्तुत रहेंगे। दास्तां से हमारा मतभेद रहेगा। फिर वह शरीर की हो या मन की , व्यक्तियों की हो या परिस्थितियोंकी दोषियों की हो या निर्देषियों की, शासको की या शासितों की.... माखनलाल जी ने स्वाधीनता समर की अनेक गतिविधियों में सफलतापूर्वक भाग लिया उसका प्रारंभ रतौना कसाई खाना आंदोलन से माना जा सकता है। इस आंदोलन के अंतर्गत अंग्रेजों को एक तरह से अपनी पहली पराजय का मुंह देखना पड़ा था। कर्मवीर में रतौना के कसाई खाने के खुलने से पहले उन्होंने समाचार पत्र में संपादकीय प्रकाशित करके उसके खिलाफ जन आंदोलन खड़ा कर दिया। अतः सरकार को कसाईखाना खोलने का निर्णय त्यागना पड़ा। इस तरह 2500 गाये प्रति दिन कटने से बच गयी। बिलासपुर की जिला कांफ्रेंस के मौके पर दद्वा द्वारा दिए गए भाषण पर उनपर राजद्रोह का अपराध लगाया गया और उन्हें रेल द्वारा बिलासपुर ले जाया गया। रास्ते में पड़ने वाले स्टेशन पर काफी बड़ी संख्या में लोगो ने उनका स्वागत किया। कटनी में तो बहुत बड़ी संख्या में लोग दद्वा का स्वागत करने आए। बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर जैसे ही पुलिस ने मध्य रात्रि के बावजूद भीड़ को दद्वा के स्वागत में जमा होते देखा तो पुलिस ने उन्हें बिलासपुर रेलवे स्टेशन से पहले ही उतार लिया। 20 जून को मिस्टर पारधी फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा प्रारंभ हुआ। अदालत के वक्त भी हजारों की भीड़ तिरंगा लिए हुए कोर्ट के बाहर खड़ी थी। चतुर्वेदी जी पर दफा 196 के अनुसार आरोप था कि उन्होंने ब्रिटिश भारत की जो सरकार कानून द्वारा स्थापित है। उसके प्रति अपने भाषणों से घृणा और द्वेष उत्पन्न कर अप्रिया स्थिति उत्पन्न की ,उसे अत्याचारी कहा और 1857 के गदर की तारीफ करते हुए कहा कि वह भारत की स्वतंत्रता के लिए किया गया प्रशंसनीय प्रयत्न था उन्होंने ब्रिटिश सरकार पर आरोप लगाया कि उन्होंने हिंदुस्तान के कपड़ा उद्योग को नष्ट करने के लिए हिंदुस्तानी जुलाहो के अंगूठे काट डाले। दादा ने अंग्रेजों को हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों का दुश्मन कहा और श्रोताओं को समझाया कि 33 करोड़ हिंदुस्तानी मुट्ठी भर अंग्रेजों को बड़ी आसानी से हिंदुस्तान से बाहर निकाल सकते हैं। हालांकि माखनलाल चतुर्वेदी की इस गिरफ्तारी के विरुद्ध न सिर्फ बिलासपुर के म्यूनिसिपल स्कूल के मेदांन में रविशंकर जी शुक्ला की अध्यक्षता में विशाल सभा हुई शेष भारत में भी भूचाल सा आ गया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप में महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में और अनेक देश प्रदेश के समाचार पत्रों ने दद्वा की गिरफ्तारी का खुलकर विरोध किया। माखनलाल जी को 1922 में जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से छूटते ही वे दूसरे आंदोलन में सक्रिय हो गए। जो इतिहास में झंडा सत्याग्रह के नाम से विख्यात है। झंडा सत्याग्रह सबसे पहले जबलपुर में प्रारंभ हुआ था। इसकी धारणा सर्वप्रथम विख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पंडित माखनलाल के अग्रज मित्र पंडित सुंदरलाल में जागृत हुई थी। वे राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान की भावना जागृत करने के लिए कुछ असाधारण कार्य करना चाहते थे। इस बीच उन्हें एक ऐसा अवसर प्राप्त हो गया कि यह सत्याग्रह स्वयं प्रारंभ हो गया। सन 1922 में कांग्रेस के अध्यक्ष देशबंधु चितरंजनदास चुन गए थे। किंतु उनके जेल चले जाने से हकीम अजमल खान साहब को अध्यक्ष का दायित्व ग्रहण करना पड़ा अजमल खा साहब एक महान विभूति थे। उन दिनों कांग्रेस ने सत्याग्रह जांच कमेटी बनाई थी। जिसे यह पता लगाना था कि भावी असहयोग आंदोलन के लिए देश कितना तैयार था। 18 मार्च 1922 को यही कमेटी श्री हकीम के नेतृत्व में जबलपुर आई थी। जबलपुर कांग्रेस ने उनके आगमन के उपलक्ष में तय किया था की खा साहब को वह अभिनंदन पत्र देगी तथा म्युनिसिपल कमिटी पर राष्ट्रीय ध्वज पर फहरायेगी प्रस्ताव पास होने की देर थी कि राष्ट्रीय झंडा जबलपुर म्युनिसिपल कमिटी के भवन पर फहराने लगा। कर्मवीर में माखनलाल चतुर्वेदी ने तमाम सारी प्रेरणादायक रचनाएं लिखी किसी कारण से जब कर्मवीर का प्रकाशन बंद हो गया। तब माखनलाल जी प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी के निमंत्रण पर कानपुर चले गए और प्रताप के संपादन में योगदान देते रहे। खंडवा माखनलाल जी के संपादक कल में जो प्रभा नामक मासिक पत्रिका निकल रही थी। वह आप कानपुर से निकलने लगे तब तक वह काफी प्रसिद्ध पा चुकी थी। चतुर्वेदी जी उसके संपादन में अपना योगदान देते रहे। मंदिर के बंद हो जाने पर कुछ वर्षों बाद सपना जी और शुक्ला जी ने उसे पुनः प्रकाशित करने की योजना बनाई और से खंडवा से प्रकाशित करने का निश्चय किया और माखनलाल जी को उसका संपादक बना दिया। चतुर्वेदी जी का प्रथम काव्य संग्रह हिम किरीटिनी एक भारतीय आत्मा के नाम से सन् 1942में आया। इसमें उनके द्वारा सन् 1913से 40के मध्य लिखी गई कविताओं में से सिर्फ 44ही संग्रहीत हैं। इनमें से आधा दर्जन बिलासपुर और जबलपुर सेन्ट्रल जेल में लिखी गई थी। चतुर्वेदी जी का दूसरा काव्य संग्रह हिमतरंगिनी 1949में प्रकाशित हुआ। इसमें सन् 1908से लेकर 45तक की 55कविताये संकलित हैं। दद्वा का तीसरा काव्य संग्रह सन् 1951में माता नाम से प्रकाशित हुआ। इसमें 56 कविताएं संग्रहित हैं जो 1904से लेकर सन् 45के बीच लिखी गई है। सन् 1960में दद्वा के ललित निबंधों का एक संग्रह अमीर इरादे गरीब इरादे नाम से प्रकाशित हुआ। इसमें उनके 33निबध संकलित हैं। सन् 1968मे उनकी अंतिम कृति समय के पांव प्रकाशित हुई। हालांकि उनके निधन के पश्चात भी दो कृतियां पांव पांव (लेख संग्रह) और धूम वलय ( कविता संकलन) के नाम से प्रकाशित हुई। सन 1926 में मध्य प्रदेश विद्यार्थी परिषद के अधिवेशन का एग्जाम निर्णय लिया गया तब उसमें सभापति के लिए बनारस विद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापक लाल भगवान दिन का नाम प्रस्तावित किया उसे समय हिंदू विश्वविद्यालय मेंमध्यप्रदेश में आजाद एक दौर ऐसा था जब मध्य प्रदेश की राजनीति में माखनलाल जी का दबदबा था। वह प्रदेश हाई कमान के बहुत करीबी थे। मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल और राजनीति के चाणक्य पंडित द्वारका प्रसाद मिश्रा जैसे दिग्गज भी उनके कृपाकांक्षी रहे थे। वह चाहते तो प्रदेश के और देश के कर्णधारों में उनकी भी गिनती हो जाती। देश की राजनीतिक नामावली में उनका भी नाम संरक्षण में उभर कर आ जाता। घर भी धन्य धान से भर लेते। लेकिन यह स्वाभिमानी साहित्यकार उस समय के लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को भी खरी खोटी सुनाने में नहीं चुका। जिसका परिणाम यह हुआ कि दद्वा ने राजनीति का घर छोड़ दिया। इसके पश्चात राजनीतिक लोगों ने उनसे दूरी बना ली। उन्होंने भी इस बात की कतई फिक्र नहीं की। उन्होंने न भोपाल की ओर देखा और न नागपुर की ओर। न इलाहाबाद की ओर न वर्धा की ओर। दिल्ली की ओर से भी निगाहे फेर ली। दद्वा ने अपने जीवन में ही यह सिद्ध करके दिखा दिया कि साहित्य का सुखासन राजनीति के सिंहासन से कितना ऊंचा है। चाहे प्रदेश ने उनका सम्मान किया हो या केन्द्र ने उन्हे कोई भी अलंकरण भेंट किया हो ,माखनलाल जी उसे लेने घर से बाहर नहीं निकले। प्रदेश और देश की राजधानियों को चलकर उनके घर पहुंचना पड़ा। माखनलाल जी ने 1913 में प्रभा मासिक पत्रिका का 1920 में कर्मवीर का और 1923 में प्रताप का संपादन किया। 1925 में जब कर्मवीर जबलपुर से खंडवा आ गया। तब से जीवन के अंतकाल (30 जनवरी 68) तक वे उसके संपादक रहे। इस तरह माखनलाल जी ने तकरीबन 45 वर्ष सक्रिय पत्रकारिता की। उच्च कोटि के संपादक के रूप में उन्हें स्वतंत्रता पूर्व देश में जो सम्मान प्राप्त था। यह इसी से सिद्ध हो जाता है कि माखनलाल जी 1927 में भरतपुर संपादक सम्मेलन के और 1939 में काशी की अखिल भारतीय पत्रकार परिषद के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। पत्रकार के रूप में उनके लेखनी कितनी प्रभावशील थी या श्री रघुपति सहाय फिराक के वक्तव्य से स्पष्ट हो जाता है। फिराक ने स्पष्ट कहा था -- कि मुझे याद आता है कि अब से कोई 30 -40 वर्ष पहले देश गुलाम था तो कर्मवीर में पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के लेख मेरे और मेरे जैसे लाखों देशवासियों के दिल में गुलामी के खिलाफ ऐसा जोश उत्पन्न कर देते थे जिसे भुलाया नहीं जा सकता। जब से देश गुलाम हुआ तब से 70-80 बरसों तक अंग्रेजी भाषा में और भारतीय भाषाओं में देश प्रेम के समर्थन और गुलामी के विरोध में कई करोड़ शब्द बोले गए और लिखे गए लेकिन यह सब हवा में विलीन होकर रह गए। आज किसी के दिल या कानों में नहीं गूंज रहे है। लेकिन माखनलाल जी के लेख अब तक कानों और दिल में गूंज रहे हैं। उनके लेखकों को पढ़ते समय ऐसा मालूम होता था कि आदि शक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही है या गंगा स्वर्ग से उतर रही है। उक्त शैली हिंदी में ही भारत की दूसरी भाषाओं में बिरले ही लोगों को लोगों को नसीब हुई। शब्दों की आदिशक्ति के धनी माखनलाल जी ने भरतपुर की पत्रकार परिषद में समाचार पत्रों तथा पत्रकारों की भूमिका तथा दायित्वो आदि को लेकर बहुत कुछ कहा था। असम्बद्व रूप में वे यहां उद्वत है। माखनलाल जी ने कहा था -- बंधुओं समाचार पत्र संसार की एक बड़ी ताकत है तो उसके सर जोखिम भी काम नहीं है। पर्वत की जो शिखरे हिम रहे से चमकती और राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवारें बनती हैं, उन्हें ऊंची होना पड़ता है। जगत में समाचार पत्र यदि बड़प्पन पाए हुए हैं तो उसकी जिम्मेदारी भी भारी है। बिना जिम्मेदारी के बड़प्पन का मूल्य ही क्या है और वह बड़प्पन तो मिट्टी के मोल हो जाता है जो अपनी जिम्मेदारी को नहीं संभाल सकता ------ जिस बात के लिखने में संपादक को थोड़ा ही कष्ट उठाना पड़ता है ,केवल जरा सोचना और कुछ संदर्भ पुस्तकों को देखना पड़ता है, यदि वही बात परिस्थिति को देखकर या हानि - लाभ का ख्याल कर कर न लिखी जाए तो वह पाठकों के चरित्र धन, गौरव और ज्ञान के रूप में हानि कर सकती है। इसलिए कि समाचार पत्र का पाठक जीवन युद्ध में लगा हुआ जीव होता है समाचार पत्र से पाए हुए ज्ञान न को परिमार्जित करने के लिए विद्वान शिक्षकों और उचित अवकाश का उसके पास अभाव होता है..... अतः समाचार पत्रों के सेवक को अपनी कलम तलवार से कहीं अधिक सावधानी से उठानी पड़ती है। तलवार की पीड़ा प्रारंभ में ही होती है, अतः घाव पूरा होने से पहले ही वार बचाने का प्रयास किया जा सकता है। लेकिन पत्र संपादक के प्रहार का अनुभव,नाश और हानि के साथ होता है। अतः इस दिशा में क़लम उठाने वाले की दृष्टि परिणाम पर सतत् लगी रहनी चाहिये... वर्तमान में जब हमारे चारों ओर समाचार पत्रों की, सम्पादकों की कतार दर कतार लगी हुई है जब पहले से कई गुना अधिक दूरियां और पाठकों तक उनकी पहुंच हो रही है तब पत्रकारिता और समाज के रिश्तों और उन अनुशासनो पर विचार करना हमारे लिए जरूरी है जिनका उल्लेख पंडित माखनलाल जी ने किया है। माखनलाल जी पत्रकारिता की और पत्र सम्पादको की शक्ति को समाज के लिए अत्यंत उपयोगी मानते थे लेकिन वे इस बात की भी चिन्ता करते थे कि संपादकों अक्षमताएं, स्वार्थ आपसी द्वंद्व, मानसिक विकार समाज के लिए कितने हानिकारक है। दद्वा मन , वचन और कर्म से समूचे भारतीय थे। भारत की स्वाधीनता के लिए भी अनेक बार जेल गए। अपनी ओजस्वी पत्रकारिता और काव्य साधना से उन्होंने राष्ट्रीय चेतना का विस्तार किया। उनकी भाव चेतना में देश के चित् को अभिभूत करने वाले वैष्णव धर्म का यथेष्ट विन्यास हुआ। उनका जन्म एक वैष्णव परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज श्री राधावल्लभ संप्रदाय के अनुयाई थे। उनके परिवार में वैष्णव भक्त कवियों के मधुर पदों का गायन होता था। सूर ,तुलसी ,मीरा इत्यादि भक्त कवियों की मार्मिक रचनाओं ने बचपन से ही कंठस्थ थी। सन् 1904 में लगभग 16 वर्ष की अवस्था में उन्होंने जो पहला गीत रचा ,उस पर वैष्णव भक्तों की पदशैली और भाव-भंगिमा की अपूर्व छाप थी -- श्याम लोचन मन बस गए री मधुर बैन नैन सैन सो, चतुर्वेदी जी ने प्रणय गीतों की रचना भी प्रचुर मात्रा में की। गौरतलब बात यह है कि अधिकांश गीत नारी के प्रणय निवेदन अथवा नारी की विरह-वेदना के रूप में लिखे गए। राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में चतुर्वेदी जी का शारीरिक साहित्यिक दोनों ही द्वषिटयो में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जेल की यातनाओं को सहकर, अनेकों बार पुलिस को धता बताकर गुप्त योजनाओं में सक्रिय योगदान देने वाले दद्वा कभी चुप नहीं बैठ सके। साहित्यिक क्षेत्र में केवल काव्य रचना करके शाब्दिक क्रांति करने वालों में से चतुर्वेदी नहीं थे बल्कि बल्कि खुलेआम अंग्रेजों की खबर उनके द्वारा निर्भीकता से हर कदम पर ली जाती रही। प्रताप और कर्मवीर के द्वारा देश की तत्कालीन जो सेवाएं की गई वे सभी के बूते की बात नहीं थी। चतुर्वेदी जी तो मानकर ही चलते थे कि उनका एक पैर जेल के भीतर है दूसरा प्रेस में। एक हाथ में कलम और और तलवार है दूसरे में गोपनीय योजनाएं। उनकी यही निर्भीक राष्ट्रीयता से ओतप्रोत वाणी उनके उन निबंधों में भी अंकित है। जिसे पढ़कर एक और जहां भावनाओं में विह्वल होता है वहीं देश के लिए एक प्रेरणा पाकर नये उत्साह से आगे बढ़ने का संकल्प भी ग्रहण करता है। राष्ट्रीयता आपका मूल मंत्र था। (लेखक के विषय में -मध्य प्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है) ईएमएस / 03 अप्रैल 25