01-Apr-2025
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नई दिल्ली (ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बेला त्रिवेदी और वकीलों के बीच तीखी बहस हुई। यह विवाद तब खड़ा हुआ जब जस्टिस त्रिवेदी और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (एओआर) पी. सोमा सुंदरम को एक आपराधिक मामले में अनावश्यक और अनुचित याचिका दायर करने पर फटकार लगा दी। वकीलों ने कोर्ट के आदेश को पूर्वनिर्धारित बताकर कड़ा विरोध जताकर कहा कि संपूर्ण बार (वकील संघ) पीड़ित वकील के साथ खड़ा है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ को अपने एक आदेश में संशोधन करना पड़ा। क्या है पूरा मामला? रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की अन्य धाराओं के तहत दर्ज एक अपराध से जुड़ा था। निचली अदालत ने आरोपी को आईपीसी की धारा के तहत दोषी मनाकर तीन साल की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी, इस अपील को 2023 में खारिज किया गया। इसके बाद, याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देकर आत्मसमर्पण से छूट मांगी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मांग को खारिज कर दो सप्ताह में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया। बावजूद इसके, याचिकाकर्ता ने फिर से विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर कर आत्मसमर्पण से छूट मांगी, इसपर अदालत ने कड़ी आपत्ति जाहिर की। सुनवाई के दौरान जब अधिवक्ता सुंदरम कोर्ट में पेश हुए, तब कोर्ट ने पाया कि याचिका में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर मेल नहीं खा रहे थे और सभी कागजात पर सिर्फ अधिवक्ताओं के हस्ताक्षर थे। वकीलों का कड़ा विरोध कोर्ट के आदेश का कड़े शब्दों में विरोध कर अदालत को अपने आदेश को संशोधित करने के लिए मजबूर किया। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के कई सदस्यों ने अदालत में फैसले पर सवाल उठाए। एक वकील ने कहा, उन्हें सुने बिना कैसे दोषी ठहरा सकते हैं? एक मौका मिलाना चाहिए। दूसरे वकील ने कहा, यह पूर्वनिर्धारित आदेश है, हम यही कह रहे हैं। इसके बाद वकीलों के कड़े विरोध के बाद कोर्ट ने अपने आदेश में संशोधन किया और याचिकाकर्ता तथा संबंधित अधिवक्ताओं को इस मामले में अपना स्पष्टीकरण देने का मौका दिया। आशीष दुबे / 01 अप्रैल 2025