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माणिक राज समाप्त होते ही त्रिपुरा की आग सारे देश में

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(सनत जैन) 
त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव का परिणाम भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में रहा। सत्ता परिवर्तन का इतना गहरा और बुरा असर, त्रिपुरा में होगा। यह किसी ने सोचा भी नहीं था। विधानसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद भारतीय जनता पार्टी के अतिउत्साही कार्यकर्ताओं ने वामपंथी संगठनों और उनके कार्यकर्ताओं पर हमले करना शुरू कर दिए। त्रिपुरा में साम्यवादी व्यवस्था के जन्मदाता लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर से ढहा दिया गया। शाम होते-होते एक अन्य लेनिन के बुत को भी ढहा दिया गया। चुनाव परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद त्रिपुरा में शुरू हुआ, हिंसा का दौर समाप्त नहीं हो रहा है। त्रिपुरा में हिंसक घटनाओं में बड़ी संख्या में वामपंथी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया। लोकसभा में माकपा के उपनेता मोहम्मद सलीम के अनुसार 5 मार्च की शाम से त्रिपुरा में शुरू हुई, हिंसक घटनाओं में 514 लोग बुरी तरह घायल हुए हैं। 1539 घरों पर हमले किए गए हैं। वही 196 घरों में आग लगा दी गई है। माकापा के 134 पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ करते हुए, माकापा के 208 कार्यालयों पर कब्जा करने की जानकारी उन्होंने लोकसभा सचिवालय में दी है। 25 साल पहले सीमावर्ती राज्य त्रिपुरा की गिनती अशांत राज्यों में होती थी। आदिवासी बनाम बांग्ला-बनाम उग्रवादी बनाम अलगाववादी झड़प में त्रिपुरा अशांत रहता था। माणिक सरकार के मुख्यमंत्री बनने के बाद धीरे-धीरे यह शांति का टापू बन गया। 25 वर्ष तक मुख्यमंत्री के रूप में सादगी के साथ मूल्यों की राजनीति करते हुए, उन्होंने आदिवासी, बांग्ला घुसपैठियों, उग्रवादी और अलगाववादियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।
पूर्वोत्तर राज्य भ्रष्टाचार में सुपर भ्रष्ट माने जाते हैं। पूर्वोत्तर के 7 राज्यों में त्रिपुरा ही इसका अपवाद रहा है। त्रिपुरा विकास के मामले में, साक्षरता के मामले में, सामाजिक विकास के मामले में अरुणाचल, असम, नागालैंड, मणिपुर से आगे बना रहा। माणिक सरकार ने बिना किसी हो-हल्ले के त्रिपुरा में ना खाऊंगा ना खाने दूंगा, कि महामंत्र से राज्य को विकास की ओर अग्रसर किया था। माणिक सरकार, 25 साल के शासनकाल में मुख्यमंत्री के रूप में जो वेतन उन्हें मिलता था। वह उसे पार्टी में जमा कर देते थे। पार्टी उन्हें घर खर्च के लिए कुछ हजार रुपए देती थी। उनकी पत्नी केंद्र सरकार की कर्मचारी थी। वह अपना घर का खर्च चलाती थी। सब्जी लेने भी वह स्वयं रिक्शा पर चली जाती थी। माणिक सरकार भी सरकारी सुख-सुविधाओं का कोई लाभ नहीं लेते थे। खुद के मकान में वह अपनी पत्नी के साथ रहे। उनकी पत्नी और उनके नाम कुल 43 लाख रुपए की संपत्ति है। जो उनकी पारिवारिक संपत्ति और उनकी पत्नी द्वारा सरकारी नौकरी में रहते हुए, जो प्राप्त हुआ, वहीं उनके पास मुख्यमंत्री पद छोड़ने पर रही। उनकी पत्नी भी सादगी और सहजता की प्रतिमूर्ति हैं। साइकिल रिक्शा में आना जाना और कभी मुख्यमंत्री की पत्नी होने का एहसास भी उन्होंने त्रिपुरा वासियों को नहीं होने दिया।
भारतीय जनता पार्टी ने त्रिपुरा के युवाओं में विकास मॉडल और भौतिक सुख-सुविधाओं का ऐसा जाल बिछाया। जिससे त्रिपुरा में परिवर्तन की एक लहर चली। चुनाव में सत्ता भारतीय जनता पार्टी के हाथों पर पहुंच गई। विधानसभा चुनाव में मतदाताओं द्वारा दिए गए, वोटों में भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच  मात्र 2 फ़ीसदी का अंतर है। युवाओं के वर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के लोकलुभावन वादों पर विश्वास किया। चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री के रूप में माणिक सरकार ने भी सत्ता छोड़ने में कोई विलंब नहीं किया।
त्रिपुरा में सत्ता परिवर्तन हो भी नहीं पाया, भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री ने शपथ भी नहीं ली। उसके पूर्व ही त्रिपुरा में जिस तरह से हमले शुरू हो गए। लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर से हटा दिया गया। जगह-जगह वामपंथी कार्यकर्ताओं पर हमले शुरू हो गए। उससे 25 साल तक त्रिपुरा का जो इतिहास बना था। वह बिखर गया, और एक बार फिर त्रिपुरा अशांत हो गया। 13 से ज्यादा जिलों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। मुख्यमंत्री की शपथ ग्रहण के पूर्व सारा त्रिपुरा आग में जल रहा है। भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। किंतु सत्ता की इस लड़ाई में केंद्र सरकार की भूमिका आश्चर्यजनक रही।
त्रिपुरा सीमावर्ती राज्य है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में कम्युनिस्टों का काफी प्रभाव है। यदि 25 साल तक ज्योति बसु और माणिक सरकार जैसे नेताओं ने अनवरत रूप से अपनी सरकार बनाए रखी। इसके पीछे कहीं ना कहीं बड़ा भारी जनसमर्थन भी उन्हें मिला हुआ है। परिवर्तन के इस युग में आर्थिक और भौतिक मांग बढ़ने के बाद भी कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा जिस सादगी के साथ शासन व्यवस्था की जाती है। वह उन्हें समाज के सबसे कमजोर वर्ग से जोड़ कर रखती है। सीमित संसाधनों में किस तरह आम आदमी को जोड़ कर रखा जा सकता है। यह कम्युनिस्ट नेताओं से सारे देश को सीखने की जरूरत है।
लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान में नरेंद्र मोदी ने बहुत बड़े-बड़े सपने सारे देश को दिखाए थे। किंतु जब उन सपनों के साकार करने की जिम्मेदारी सत्ता में बैठकर आई। तब उसमें बहुत सारे किंतु-परंतु लगाकर आम जनता को भरमाने का प्रयास किया जा रहा है। इसकी परिणति जन रोष के रूप में उत्तर भारत के कई राज्यों में देखने को मिलने लगी है। त्रिपुरा में जिस तरीके की घटनाएं घटी है, अनावश्यक रुप से लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर से हटाया गया है। जगह-जगह कम्युनिस्ट शासन के प्रतीकों को नष्ट किया जा रहा है। भाजपा के नेता एच.राजा त्रिपुरा की जीत से इतने अधिक उत्साहित हो गए, कि उन्होंने तमिलनाडु के सबसे बड़े समाज सुधारक पेरियार की प्रतिमा को गिराने की खुलेआम धमकी दे दी है। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव एच.राजा ने फेसबुक पोस्ट में लिखा, लेनिन कौन है, भारत से उनका क्या रिश्ता है, वामपंथियों का भारत से क्या रिश्ता है, त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया गया है। तमिलनाडु के पीवीआर रामास्वामी पेरियार की प्रतिमा को गिराने की धमकी भी उन्होंने दी। तमिलनाडू में प्रतिक्रिया होने पर उन्होंने माफी भी मांग ली। डीएमके के कार्यवाहक अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने एच.राजा की गुंडा एक्ट में गिरफ्तारी की मांग करते हुए, कहा कि पेरियार की प्रतिमा को जो हाथ लगाएगा। उसका हाथ काट लिया जाएगा।
पूंजीवादी व्यवस्था की चरम सीमा पर पहुंचने के बाद, त्रिपुरा में जिस तरह अनावश्यक रुप से लेनिन की प्रतिमा को गिराया गया है। उससे देश में पूंजीवाद बनाम साम्यवाद की एक नई लड़ाई शुरु होने के रूप में भी देखी जा सकती है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में सत्ता परिवर्तन में कभी इस तरह के परिणाम देखने को नहीं मिले थे। आपातकाल के बाद जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उत्तर-भारत में बुरी तरह चुनाव में पराजित हुई थी। उन्होंने भी तुरन्त अपना पद छोड़ दिया था। त्रिपुरा में पराजय के बाद माणिक सरकार ने बिना किसी हो हल्ला के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर नई सरकार के गठन का रास्ता साफ किया था। उसके बाद इस तरह की स्थितियां होना आश्चर्यजनक है। सीमावर्ती राज्यों में यदि इस तरीके से अशांति बढ़ती रही, तो भारत को अपनी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के दोनों मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा। वर्तमान स्थिति में यह बड़ी चिंताजनक बात है। लेनिन का बुत तोड़कर त्रिपुरा से जो आग भड़की वह सारे देश में फैल गई। पेरियार, अम्बेडकर, दीनदयाल उपाध्याय की मूर्तियां खण्डित की जाने लगी। तब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को इस नुकसान का एहसास हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी को इस दिशा में भी गंभीरता के साथ मंथन करने की जरूरत है।
ईएमएस/ चन्द्रबली सिंह / 07 मार्च 2018
 
 
Admin | Mar 08, 2018 11:18 AM IST
 

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