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निरंतर विजय ----संस्कृति का पुनर्जागरण ! (लेखक- डॉक्टर अरविन्द जैन/ईएमएस)

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सिकंदर जब विश्व विजेता बनता हुआ भारत में आया तो उसे एक साधू मिले। साधु से वार्तालाप होते होते साधु ने पूछा सिकंदर यह बताओ की यदि तुमने पूरा विश्व जीत लिया तो उसके बाद क्या करोगे ?इस पर सिंकंदर निरुत्तर हुआ और रूककर बोला इस बात पर कभी ध्यान नहीं दिया। साधु ने पूछा सिकंदर मानलो तुम एक रेगिस्तान में हो और तुमको बहुत प्यास लगी हैं ,प्राण निकलने को हैं और मेरे पास एक लोटा पानी हैं तो तुम क्या करोगे? तो सिकंदर बोला में आधा  राज्य आपको दे दूंगा। साधु बोला मैं जब पानी  दूंगा तब ना! इस पर सिकन्दर बोला मैं पूरा राज्य सौप दूंगा तब साधु बोला सिकंदर तुम्हारे कुल राज्य की कीमत मात्र एक लोटा पानी और उसके लिए इतनी दौड़ धुप ,खून खराबा।और अंत समय वह खुले हाथ गया कुछ अपने साथ नहीं ले गया। नाम रह गया।
इसी प्रकार कौरवों ने शकुनि के माध्यम से द्रोपदी को जीता उस समय दुर्योधन का समस्त शरीर रोम रोम आल्हादित हुआ कारण जीत की प्रसन्नता में रोम रोम में ख़ुशी झलकती हैं।वैसे ही वर्तमान में मोदी जी ने अपने प्रधान मंत्रित्व के दौरान सम्पूर्ण भारत में विजय पताका फहराने में पूरी शक्ति ,श्रम ,चतुराई , कौशल दिखाकर निरंतर विजयी हो रहे हैं और कहा भी जाता हैं की प्यार और युध्य में सब जायज होता हैं। इस जीत के बाद कुछ और  राज्य हैं जिन्होंने उनकी अधीनता नहीं स्वीकारी हैं उनको पाना भी लक्ष्य हैं। जब तक सम्पूर्ण देश उनका नहीं होगा  तब तक आराम हराम हैं। और अर्जुन जैसा लक्ष्य बना लिया हैं तो कोई कठिन नहीं हैं विजय पताका फहराना इस प्रकार की विजय से एक पार्टी ,एक देश, एक व्यक्ति का शासन होगा। जिस प्रकार पहले राजशाही होती थी वैसे ही लोकतंत्र में एक व्यक्ति एक राजा होगा। इससे यह फायदा होगा की अब भविष्य में कोई भी योजना लागु कराने और करने में कोई बाधा नहीं होंगी। और राजा जिस मानसिकता , विचारधारा , संस्कृति को धोपना, लागु करना चाहेगा वह कर सकेगा बिना रोक टोक के। इसप्रकार राजा का यह स्वर्णिम युग माना जाएगा। और यह होना भी चाहिए कारण जब तक व्यक्ति सपने में या जागते समय अपना लक्ष्य ना निर्धारित करे तब तक उसे संघर्ष करते रहना चाहिए। ये अच्छा हैं हमें मुस्लिम शासकों जैसे गद्दी पर बैठने के लिए किसी का हक़ नहीं छीनना पड़ता हैं कारण हम प्रजातान्त्रिक ढंग से जीत कर गद्दी पर बैठते हैं।
वैसे प्रशासन का एक सिद्धांत हैं की हम सबसे पहले अपने कार्यालय , घर , राष्ट्र को अपने नियंत्रण में करे और उसके बाद हम सत्ता का उपयोग अपनी नीति रीति के लिए करे।स्वाभाविक हैं जैसे आजकल शादी करने के बाद युवा दंपत्ति ५ वर्ष तक संतान नहीं चाहते कारण उस दौरान मौज मस्ती का रहता हैं,इसी प्रकार शासक ने भी यही लक्ष्य बनाया हैं और जैसे नव बधु ससुराल में आती हैं तो पहले अपने नाते रिश्तेदारों से मेल जोल करती हैं,व्यवहार बनाती  वह उनके घर जाती हैं और उनको अपने यहाँ बुलाती हैं
।इस प्रकार आदान प्रदान होता हैं फिर कुछ समय घर गृहस्थी में गुजारती हैं। मतलब उसे पहले पांच साल सम्बन्ध बनाने ,निभाने और गृहस्थी समझने में लगते हैं। उसके बाद गर्भवती होने पर गर्भस्थ शिशु की देखरेख और उसे बाद लालन पालन में समय देना पड़ता हैं।इसकाआशय यह हैंकि हमारे देश का विकास आगामी पांच वर्षों में शुरू होगा। अभी तो बीजा रोपण के पहले की जमीन तैयार की गयी हैं। इसका मतलब खेत ,बीज पर निजत्व भाव आ गया हैं। इसके पूर्व खेत के बचाव की पूरी भूमिका कर ली गयी हैं। कोई बाहरी पशु ना आ आये तो दीवारें मजबूत बना ली हैं। बस अब खेत में बोबई करके फसल तैयार कर काटने का समय आ गया हैं। 
इस क्रम में अब अपनी भावना , विचारधारा को विकसित करने के लिए  राष्ट्र के चार स्तम्भों पर अपना कब्ज़ा करना जरुरी हैं जो सत्ता के सामने बीन बजाये ,जैसा सत्ताशीन चाहे वैसा वह नाचे। वर्तमान में यही स्थिति हमारे देशमे हैं और आगामी वर्षों में  ये संस्थाएं विलुप्त या समाप्त या अस्तित्वहीन हो जाएँगी। वे वैसा ही बोलेंगी करेंगी जैसा सत्ताशीन चाहेंगे। आज भी बुद्धिजीवी वर्ग को वैसा ही दिखाया , पढ़ाया , कराया जा रहा हैं जैसा राजा या सत्ताधारी पार्टी चाहती हैं। इसमें पूरी तरह से एक निर्धारित रणनीति के तहत काम किया जा रहा हैं जिससे स्वयं सफलता कदम चूमती हैं। 
हम देश वासियों को  आगामी चुनाव की जीत के बाद ही विकास और अच्छेदिन की गति , प्रगति देखने मिलेंगी। जैसा युघिष्ठिर ने सभा में एक भिक्षु को कहा था की आप अगले सप्ताह अपनी भीख ले जाना तब भीम ने ज़ोर से हंसकर कहा था की धर्मराज ने यमराज को वश में कर लिया हैं यानी धर्मराज अगले सप्ताह तक जिन्दा रहेंगे  !इसी प्रकार  हमारे देश में विकास की गंगा अगले पंचवर्षीय काल में बहेंगी। कारण विकास में कुछ विरोधी बाधक हो रहे हैं ,निर्बाध रूप से गंगा नहीं बह  पा रही हैं। जब तक पूर्ण विरोधी मुक्त देश नहीं होगा विकास असंभव हैं।
जनता को अपने अधीन रखना हैं तो सबसे पहले आर्थिक
नाकेबंदी करो जिससे उसकी कमर टूट जाएँगी और कराधान ऐसा लगाओ की उसके कारण खजाना भरता जाए और उससे विकास की संभावना बढ़ेंगी। दरिद्रता में आदमी अपनेपेट की रोटी की सोचता हैं आर्थिक सम्पन्नता के उपरान्त उसे अस्तित्व की लड़ाई की सोचना पड़ता हैं। विकास के कई पहलु हैं पहला स्वयं उसके बाद देश। समाज या परिवार का कोई अर्थ नहीं। जैसे स्वतंत्रता के पहले और बाद में क्या अंतर आया। स्वतंत्रता के पूर्व व्यक्ति देश के ,फिर समाज के लिए और अंत में परिवार के लिए सोचता था पर स्वतंत्रता के बाद पहले परिवार ,फिर समाज और अंत में देश। पर वर्तमान में गनीमत हैं की हमारा राजा अकेला हैं,परिवार विहीन जैसे कीचड में कमल ,आकिंचन्य भाव से राज्य का सञ्चालन कर रहे हैं जिसके कारण वह विजेता के समान हमारे बीच उभरकर आये हैं। 
यह समय युवा दंपत्ति जैसे सुहागरात जैसा समय हैं ,इस समय विकास की संभावना कम हैं। जो हुआ हैं वह पिछले सरकार की देन हैं जो अच्छा हैं वह मेरा और ख़राब हैं वह पिछले का। वर्तमान सरकार की हालत ऐसी हैं जैसे कोई विधवा और ऊपर से गर्भवती। वर्तमान सरकार पूर्णरूपेण सतीत्व की रक्षा के साथ निष्ठापूर्ण एक नारी ब्रह्मचारी की भूमिका में हैं। कारण बंध्या या ब्रह्मचारी होना इसका आशय संतानहीन। ऐसा ही हमारा नेतृत्व हैं उसे बाह्य जगत से कुछ नहीं लेना देना हैं यहाँ तक की न खुद खाएंगे और ना खाने देंगे। इस प्रकार हमारे देश की संस्कृति रही हैं की राजा को ईमानदार, दक्ष, प्रवीण, नीतिज्ञ, लोक कल्याणकारी भावना से युक्त, राष्ट्रप्रेमी उदार भावना वाला होना चाहिए जो अपनी सस्कृति की रक्षा के  लिए कटिबद्ध हो जो वर्तमान में सटीक हैं।
-ईएमएस/सोनी/8मार्च18
 
Admin | Mar 08, 2018 11:17 AM IST
 

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