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नई किस्म की राजनीति का ये अंजाम

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वीरेन्द्र सिंह परिहार
अपने को अन्ना आंदोलन से उत्पन्न होने का दम भरने वाली आम आदमी पार्टी (आप) इस अंजाम तक पहंुच सकती है, शायद इसकी कल्पना भी लोगों ने नहीं की होगी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में इस तरह का कोई उदाहरण नहीं है जो 19 फरवरी 2018 की रत्रि को हुआ। वस्तुतः 19 फरवरी को आधी रात यानी रात के 12 बजे एक बैठक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर पर आयोजित की गई, जिसमें दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव अंषु प्रकाष को भी बुलाया गया। यद्यपि अंषु प्रकाष को इस तरह से आधी रात को बुलाया जाना बहुत जमा नहीं था, इसलिए उन्होंने कहा था कि इस बैठक को सबेरे रख लिया जाए। लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल के निज सचिव के ज्यादा दबाव डालने पर अंषु प्रकाष उस बैठक में षामिल होने चले गए। उस बैठक में केजरीवाल के अलावा ‘आप’ के 12-13 विधायक भी मौजूद थे। जिन्होंने बैठक के दौरान मुख्य सचिव को बंदी जैसा बना लिया और उन्हें भद्दी-भद्दी गालियाॅ दीं, यहां तक कि उनके साथ मारपीट भी की गई। हद तो यह हुई कि यह सब कुछ अरविंद केजरीवाल की आॅखों के सामने हुआ, और उन्होंने इसे रोकने का रंच-मात्र प्रयास भी नहीं किया। इसका निहितार्थ स्पश्ट है कि ऐसे घिनौने कृत्य में केजरीवाल की भी सहमति थी। अब मारपीट की घटना का ‘आप’ चाहे जितना खण्डन करे, पर मेडिकल रिपोर्ट में इस बात की पुश्टि हो चुकी है कि मुख्य सचिव के साथ मारपीट की गई है। पर ‘आप’ तो ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे’ की तर्ज पर भले ही मुख्य सचिव पर ही बदसलूकी का आरोप लगाए। पर यह तथ्य इसी से प्रमाणित है कि मुख्य सचिव को सबक सिखाने के लिए ही यह बैठक रात 12 बजे बुलाई गई थी, ताकि रात के 1 बजे जब यह घटना हो तो मुख्य सचिव तत्काल किसी को इस घटना से अवगत न करा सकें। इस घटना की सच्चाई इसी से पुश्ट हो जाती है कि जहां मुख्यमंत्री सचिवालय यह कह रहा है कि यह बैठक अप्रकाषित विज्ञापनों के मुद्दे पर बुलाई गई थी, वहीं ‘आप’ का कहना है कि मुख्य सचिव को गरीबों को दिए जाने वाले राषन के मुद्दे पर बुलाया गया था। हकीकत यही है कि यह बैठक एक विज्ञापन को लेकर ही बुलाई गई थी, जिसके लिए मुख्य सचिव तैयार नहीं थे। वस्तुतः मुख्य सचिव का इस विज्ञापन में एक लाईन को लेकर मतभेद था, जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यह कहते दिखाए जाते हैं कि जब कोई व्यक्ति ईमानदारी एवं निश्ठा के साथ कार्य करता है, तो सम्पूर्ण विष्व की षक्तियाॅ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उसकी मदद करने लगती हैं। वस्तुतः इस तरह से अरविंद केजरीवाल अपनी विवादित कार्यषैली और छवि को लेकर यह संदेष देना चाहते थे कि एक तो वे ईमानदार और निश्ठावान हैं, और वह भी इस हद तक है कि विष्व की सम्पूर्ण अदृष्य षक्तियाॅ उनकी मदद कर रही हैं। इस तरह से वह अपने को यह भी प्रचारित करना चाहते थे कि वह मात्र मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि एक बड़े ऊॅचे स्तर के संत या आध्यात्मिक गुरु भी हैं। अब ऐसी ऊल-जलूल बातों को मुख्य सचिव विज्ञापन में प्रकाषित होने की अनुमति कैसे दे सकते थे? आखिर में जवाबदेही तो उन्हीं पर आती। ऐसी स्थिति में मुख्य सचिव को सबक सिखाने के लिए जानबूझकर आधी रात को यह बैठक बुलाई गई थी। चंूकि मुख्य सचिव के विरुद्ध कार्यवाही करने या हटाने का अधिकार दिल्ली के मुख्यमंत्री को नहीं है, इसलिए उन्हें दादागीरी के द्वारा यह सबक सिखाया गया कि यदि वह उनके रास्ते में आए तो उनके साथ इसी तरह का व्यवहार किया जाएगा।
यद्यपि मुख्य सचिव की रिपोर्ट पर ‘आप’ के दो विधायकों अमानुल्ला खान एवं एक अन्य विधायक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन बड़ी बात यह कि इस घटना को लेकर अधिकारी तबके में तीव्र रोश व्याप्त है कि यदि मुख्यमंत्री ही ऐसी घटनाओं को अंजाम दिलाने लगे तो फिर अधिकारियों की सुरक्षा और षासन-प्रषासन का भगवान ही मालिक है।
विडम्बना यह कि इस घटना के दूसरे दिन केजरीवाल कमल हासन भी नई पार्टी को लांच किए जाने के अवसर पर मद्रास में सोमनाथ भारती जैसे विवादित और आपराधिक छवि के विधायक के साथ मंच साझा कर रहे थे।
यह तो सभी को पता है कि अभी-अभी चुनाव आयोग ने कदाचरण के चलते ‘आप’ के बीस विधायकों को विधायकी से अयोग्य घाशित कर दिया है। ‘आप’ के मंत्रियों और विधायकों के कारनामें सरकार बनते ही सामने आते रहे हैं, जिसमें उनके कुछ मंत्रियों को त्याग-पत्र देना पड़ा तो कई विधायकों के फर्जीवाड़े और यौन षोशण तक के प्रकरण सामने आए। पर नए किस्म की राजनीति करने का दावा करने वाले केजरीवाल ऐसे लोगों के समर्थन में ही खड़े नजर आए। ‘आप’ में केजरीवाल ने व्यक्तिवादी राजनीति की इंतिहाॅ यह है कि राज्यसभा चुनाव में कुमार विष्वास जैसे प्रमुख नेता या पार्टी में कार्यरत किसी को मौका न देकर दो ऐसे सजातीय लोगों को राज्यसभा में भेजा गया, जिनकी न तो कोई राजनीतिक पृश्ठ भूमि है और न समाज में विषिश्ट लोग ही कहे जा सकते हैं। कुल मिलाकर नई किस्म की राजनीति की बात अलग है, केजरीवाल और उनकी पार्टी को लोक-लाज की भी कोई परवाह नहीं है। आए दिन यह कहने वाले कि फला मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी कुछ क्यों नहीं बोलते? इतने ज्वलंत मुद्दे पर केजरीवाल स्वतः क्यों नहीं बोल रहे हैं? अब जब पुलिस केजरीवाल के बंगले पर घटना की जांच करने जाती है, तो उसमें 21 में 7 सी.सी.टी.वी. कैमरे बंद पाए जाते हैं और इन कैमरों का समय 40 मिनट पीछे कर दिया जाता है। षायद केजरीवाल की यही तिकड़मी प्रवृत्तियाॅ पारदर्षिता की पक्षधरता कहलती हों। आप पार्टी इस बात को लेकर भी हो-हल्ला कर रही है कि मुख्यमंत्री के बंगले पर इस तरह से छापा डाला जा रहा है, जबकि अपराधषास्त्र का यह मूलभूत नियम है कि जहां अपराध होगा, उस स्थल की जांच अनिवार्य है, लेकिन षायद आम आदमी की पार्टी कहलाने का दावा करने वाले इसी तरह से विषेशाधिकार से सम्पन्न रहना चाहते हैं।
 
Admin | Mar 08, 2018 11:17 AM IST
 

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