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आने वाला कल बचायें प्रकृति के सफाईकर्मी गिद्ध को बचायें

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- डाईक्लोफेनिक सोडियम दवा का इस्तेमाल न करें
सागर,(ईएमएस)। वर्तमान में गिद्ध प्रजाति के पक्षियों की संख्या दिनों दिन कम हो रही है। इसका कारण यह है कि चिकित्सा क्षेत्र में मानव उपयोग आने वाली दवा डाईक्लोफेनिक सोडियम का उपयोग अब पशु चिकित्सा क्षेत्र में होने लगा है। इससे इस दवा का सेवन किये हुए किसी पशु के मरने जब कोई गिद्ध मृत पशु के शव का उपभोग करता है तो उससे गिद्ध के गुर्दे खराब हो जाते है और कालांतर में गिद्ध मर जाता है। इस संदर्भ में कलेक्टर अलोक कुमार सिंह में उपसंचालक पशु चिकित्सा को निर्देशित की वे पशुपालकों को डाईक्लोफेनिक सोडियम दवा के स्थान पर किसी अन्य दवा को उपयोग करने का सुझाव दें। उपसंचालक, पशु चिकित्सा, सागर में अपने अधीन मैदानी अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि वे किसानों/पशुपालकों/गौसेवकों डाईक्लोफेनिक सोडियम दवा का इस्तेमाल न करने में और गिद्ध प्रजाति के संरक्षण में सहयोग दें। जिला औषधि विक्रेता संघ सागर ने जिले के सभी
केमिस्ट/दवा विक्रेताओं से अपील की है वे डाईक्लोफेनिक सोडियम सूत्र के किसी भी उत्पाद का विक्रय पशु उपचार के लिए कतई न करें और गिद्ध संरक्षण में सहयोग दें। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार द्वारा वर्ष 2006 में पशु उपचार में प्रयोग की जाने वाली डाईक्लोफेनिक सोडियम दवा को प्रतिबंधित कर दिया गया था। परंतु आज भी गिद्ध विलुप्ति के कगार में पहुंच चुके हैं। इससे चिंतित होकर भारत सरकार ने जुलाई 2015 में मानव उपयोग आने डाईक्लोफेनिक सोडियम दवा की बहुखुराक शीशी (30 मिली) को प्रतिबंधित कर केवल एक ईकाई खुराक (03 मिली) में पैक करने के आदेश जारी किये हैं। रानी दुर्गावती वन्यजीव अभ्यारण्य सिंगौरगढ में बड़ी संख्या में दिखे प्रवासी गिद्ध पर स्थानीय गिद्ध प्रजातियॉं अभी भी कम बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के संरक्षण जीवविज्ञानी श्री योगेश वामदेव ने बताया कि भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां, जबकि बुंदेलखण्ड क्षे़त्र में गिद्धों की सात प्रजातियॉं मिलती हैं। जिनमें से चार (लम्बी-चोंच वाला गिद्ध, सफेद-पीठ वाला गिद्ध, राजगिद्ध व इजिप्शियन गिद्ध) यहां की स्थानीय प्रजाति हैं और तीन प्रजातियां (हिमालयन ग्रिफॉन, युरेसियन ग्रिफॉन व सिनेरियस गिद्ध) सर्दी के मौसम यहां प्रवास करती हैं। रानी दुर्गावती वन्यजीव अभ्यारण्य, सिंगौरगढ में गिद्धों के घौंसलों के नियमित सर्वे के दौरान वहां एक सौ से भी ज्यादा गिद्ध मिले, जिनमें
ज्यादातर प्रवासी हिमालयन ग्रिफॉन व युरेसियन ग्रिफॉन थे। गिद्ध जो प्रकृति का माहिर सफाईकर्मी पक्षी है, कभी बहुतायत में पाए जाते थे। परंतु वर्तमान में पशु इलाज में प्रयोग की जाने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफिनेक के कारण देश में इनकी संख्या कुछ ही हजारों में शेष रह गई है। गिद्ध मृत पशुओं के शवों को खाकर पर्यावरण एवं प्रकृति की सफाई करते
हैं। हिन्दू धर्म में भी गिद्धों को पूजा जाता है। रामायण में भी गिद्धों का उल्लेख मिलता है, जटायु नामक गिद्ध ने सीताहरण के समय रावण से सीतामाता की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। संस्था के संरक्षण जीवविज्ञानी ने बताया कि डाइक्लोफिनेक दवा से इलाज के दौरान यदि 72 घंटे के अंदर पशु की मौत हो जाए, तो यह दवा उसके शरीर में ही रह जाती है और ऐसे मृत पशु के शव को जब गिद्ध खाते हैं, तो यह दवा उनके शरीर में पहुंचकर उनकी किडनी खराब कर मौत का कारण बनती है। भारत सरकार ने वर्ष 2006 में डाइक्लोफिनेक दवा को पशु इलाज के लिए प्रतिबंधित कर दिया था। परंतु दुर्भाग्यवश उसके बाद मानव उपचार वाली डाइक्लोफिनेक सोडियम दवा की बडी शीशी को पशु इलाज के लिए अवैध रूप से प्रयोग किया जाने लगा जिससे गिद्धों की मौत का सिलसिला अभी भी जारी है। भारत सरकार ने वर्ष 2015 से मानव उपचार वाली डाइक्लोफिनेक दवा को बडी शीशी में पैक करना भी प्रतिबंधित कर दिया है।                         
 9 फरवरी 18/ ईएमएस 
 
Admin | Feb 09, 2018 15:36 PM IST
 

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