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(विचार-मंथन) प्रतिनिधि सभा ने दिखाई ताकत तो नप भी सकते हैं ट्रंप (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

09/11/2018


यह लोकतंत्र है जहां बिना खूनी क्रांति सरकारें बदल जाती हैं और कोई सत्ताधारी यदि मनमर्जी पर उतर आए तो उस पर लगाम लगाए रखने के लिए भी बेहतर व्यवस्था जनता द्वारा कर दी जाती है। इसका जीता जागता उदाहरण इस समय अमेरिका में देखने को मिला है। दरअसल अमेरिका के मध्यावधि चुनाव 2018 में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा यानी कांग्रेस के लोवर चेंबर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर कब्ज़ा जमाने में सफलता हासिल कर लिया है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि संवैधानिक तौर पर अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लगाम लगाने में डेमोक्रेटिक पार्टी कोई कोर कसर बाकी नहीं रखने वाली है। मध्यावधि चुनाव नतीजों के बाद अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेटिक पार्टी ने 245 के करीब सीटों पर कब्जा जमा लिया है। इस प्रकार प्रतिनिधि सभा की कुल 435 सीटों में से 218 के बहुमत का जादुई आंकड़ा उसने पार कर अपनी उपस्थिति बेहतर तरीके से दर्ज करा दी है। इस हार के बाद तय हो गया है कि प्रतिनिधि सभा में राष्ट्रपति ट्रंप को मुश्किलों का सामना भी करना पड़ेगा। हालांकि सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा पहले की ही तरह बरकरार रहेगा। गौरतलब है कि रिपब्लिकन पार्टी को सीनेट में कुल 100 सीटों में से 54 सीटें मिली हैं, जो कि जादुई आंकड़े 51 से कहीं ज्यादा है। बावजूद इसके अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में ट्रंप को करारा झटका लगा है, जिससे सारे समीकरण बदल जाने वाले हैं।
इससे पहले तक राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत दोनों सदनों में था, जिस कारण उन्हें किसी भी प्रकार के निर्णय लेने में कोई दिक्कत महसूस नहीं होती थी। अब जबकि निचले सदन में डेमोक्रेट्स बहुमत में आ गए हैं तो इससे ट्रंप के लिए मुश्किलें खड़ी होना स्वभाविक बात है। खास बात यह है कि राष्ट्रपति चुनाव 2016 के दौरान रूस के दखल की जो बात बढ़-चढ़कर की जा रही थी और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो इस मामले की उच्चस्तरीय जांच के भी आदेश दिए हुए थे, जिसके तहत रुसी हस्तक्षेप मामले की जांच भी कुछ दूर चली थी, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के हस्तक्षेप के चलते जांच का मामला जो रुका तो फिर खुद ट्रंप ने रुस में ही उसे क्लीनचिट देने जैसा बयान भी दे दिया था। यह अलग बात है कि वापस जब वो अमेरिका आए तो उनके स्वर बदले हुए थे। अब वही जांच आगे भी बढ़ सकती है। यही नहीं अब तो यदि जांच में रुस का हस्तक्षेप साबित हुआ तो फिर ट्रंप पर महाभियोग चलाने का माहौल भी बनता दिखे तो किसी को हैरानी नहीं होगी। गौरतलब है कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के 2 साल बाद रिपब्लिकन पार्टी को इस तरह की हार का सामना करना पड़ा है, जिससे सीधा संदेश मिलता है कि ट्रंप सरकार से लोग खफा हैं और उन्हें अनेक मोर्चों पर फेल बता रहे हैं। जहां तक सदन में बर्चस्व की बात है तो कहना गलत नहीं होगा कि इसके जरिए अमेरिका में सत्ता का संतुलन स्थापित किया जा सकेगा, क्योंकि अब डेमोक्रेट्स इस स्थिति में पहुंच चुके हैं कि वो ऐसे किसी कानून को रोक सकते हैं, जिससे देश या नागरिकों को लाभ की जगह नुक्सान होता हो। इसलिए भी मध्यावधि चुनाव परिणामों को राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ जनमत संग्रह बताने में हर्ज महसूस नहीं किया जा रहा है। बकौल डेमोक्रटिक पार्टी की प्रवक्ता नेनसी पलोसी, 'प्रतिनिधि सभा में बहुमत के ज़रिए अब डेमोक्रटिक पार्टी अमेरिकी संविधान के तहत ट्रंप प्रशासन पर क़ानूनी रोक लगा सकेगी। इसी के साथ पार्टी और बेहतर तरीके से आम लोगों के हित में काम कर सकेगी।' यही नहीं नेनसी तो यहां तक कह जाती हैं कि अब नए क़ानून बनाए जाएंगे और पार्टी स्वास्थ्य, शिक्षा, और अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में बढ़-चढ़कर काम कर सकेगी। इसी के साथ सभी को साथ लेकर चलने की बात भी वो करती दिखती हैं, जिसकी कि कमी ट्रंप प्रशासन में देखने को मिलती रही है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रपति ट्रंप के फैसलों से आहत लोगों ने लगातार आंदोलन और प्रदर्शन कर अपनी आवाज को बुलंद रखा है। जगह-जगह उनके फैसलों का विरोध हुआ है, बावजूद इसके दोनों सदनों में पूर्ण बहुमत होने का लाभ उठाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने अभी तक वही किया है जो उनकी मर्जी में आया। पिछले दो साल में सीनेट और प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत हासिल होने का बेजा लाभ ट्रंप प्रशासन ने उठाया, जिसका खामियाजा पार्टी को मध्यावधि चुनाव में उठाना पड़ा है। यही वजह थी कि ट्रंप प्रशासन आसानी से कई क़ानून और नीतियां मंज़ूर कराने में कामयाब रहा था, लेकिन अब ऐसा कर पाना ट्रंप प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित होने वाला है। यही नहीं यदि प्रतिनिधि सभा ने अपने अधिकारों को लेकर सख्ती दिखाई तो डेमोक्रेटिक पार्टी ट्रंप प्रशासन की हर उस नीति की गहन छानबीन कर सकती है, जिसके कारण देश और नागरिकों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। ट्रंप की नीतियों और पूर्व सरकार की नीतियों का आंकलन करते हुए बेहतर नीतियों को लागू करने की सिफारिशें हों तो भी हैरान होने की आवश्यकता नहीं होगी। यदि यह सब सही है तो फिर इसमें शक नहीं कि ट्रंप के निजी व्यापार और वित्तीय मामलो की जांच भी डेमोक्रेटिक पार्टी करवा सकती है। कुल मिलाकर अब ट्रंप अपने विवादित फैसलों और रूस के साथ कथित संबंधों को लेकर नप भी सकते हैं, क्योंकि सत्ता का संतुलन बनाने के साथ ही डेमोक्रेट्स अपने प्रभाव को दिखाने की कोशिश भी करेंगे। प्रतिनिधि सभा में ट्रंप पर दबाव बनाने में कामयाब होने के साथ डेमोक्रेट्स को आगामी 2020 के आम चुनाव को भी साधने की रणनीति के तहत काम करना होगा, वर्ना नतीजे उन्हें एक बार फिर कहीं का नहीं छोड़ेंगे।

09नवंबर/ईएमएस