लेख

चोरी और सीनाजोरी (लेखक- वीरेन्द्र सिंह परिहार / ईएमएस)

12/02/2019

3 फरवरी को पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता में जो कुछ भी हुआ, उसे स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। देशवासियों को यह कल्पना ही नहीं रही होगी, कि कोई राज्य सरकार इस तरह पेश आ सकती है मानो वह भारत का हिस्सा न होकर कोई स्वतंत्र इकाई हो। जिस तरह से कलकत्ता में पुलिस आयुक्त से पूछताछ करने आई सीबीआई की टीम के साथ पश्चिम बंगाल की पुलिस ने व्यवहार किया। यानी कि सीबीआई की टीम को पूछताछ करने से रोका ही नहीं, उनसे धक्का-मुक्की भी की और एक तरह से उन्हें हिरासत में लिया- वह लोगों को स्तब्ध कर देने वाला था। बिडम्बना यह कि ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे‘ की तर्ज पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने सीबीआई और प्रधानमंत्री को दोषी ठहराते हुए उन्हें संविधान विरोधी और लोकतंत्र विरोधी कहते हुए धरने पर बैठ गई। यह बात तो अपनी जगह पर है, मोदी विरोधी कई नेताओं ने इस अवसर पर उन्हें बढ़-चढ़कर समर्थन दिखाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी थे। तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल और चन्द्रबाबू नायडू जैसे कुछ नेता तो ममता के प्रति अपना समर्थन जताने के लिए कलकत्ता भी पहुंच गए।
इस संबंध में ममता बनर्जी का कहना था कि कलकत्ता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के निवास पर सीबीआई की जो टीम जा रही थी, उसके पास न्यायालय का वारंट नहीं था। जबकि सच्चाई यह है कि यह जांच सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर ही की जा रही थी और सीबीआई राजीव कुमार के पास पूछताछ के लिए गई थी, जिसमें कम-से-कम किसी वारंट की आवश्यकता नहीं थी। सर्वोच्च न्यायालय ने न सिर्फ शारदा स्कैम और रोजवैली स्कैम को लेकर सीबीआई जांच का आदेश दिया था, अपितु पश्चिम बंगाल पुलिस को इसमें समुचित सहयोग के लिए भी निर्देशित किया था। लेकिन सहयोग करना तो दूर ममता की पुलिस इसमें तरह-तरह से बाधा खड़ी करने लगी। एक तरह से देखा जाए तो यह सारा मामला बिहार के चारा घोटाले जैसा दिखाई पड़ रहा है, जिसमें मुख्यमंत्री रहते हुए बिहार के तात्कालिन मुख्यमंत्री लालू यादव ने चारा घोटाले की जांच के लिए पुलिस टीम गठित की थी। जिसे बाद में पटना उच्च न्यायालय ने घोटाले को ढ़कने का प्रयास मानते हुए सीबीआई जांच का आदेश दिया था। बाद के घटना-क्रम से तो सभी परिचित होंगे। लोगों का कहना है कि शारदा-नारदा और रोजवैली के घोटालों को लीपापोती करने के लिए ममता बनर्जी द्वारा राजीव कुमार की अध्यक्षता में एस.आई.टी गठित की थी, पर सही दिशा में जांच न चलने और लीपापोती के प्रयास को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त घोटालों की जांच जिसमें लाखों लोग प्रभावित थे-सीबीआई को सौंप दिया। यह तक कहा जाता है कि राजीव कुमार ने सही दिशा में जांच करने के बजाय साक्ष्य मिटाने का काम किया। उन्होंने अपने मोबाइल से कई नम्बर और उनका विवरण डिलीट कर दिया। यह बात अलग है कि डिलीट करने के पूर्व सीबीआई ने उपरोक्त सब कुछ अपनी जानकारी में ले लिया। आरोप यह भी है कि राजीव कुमार ने एक पेन ड्राइव और लाल डायरी जिसमें अभियुक्तों के नाम और विवरण थे उसे भी जांच के लिए सीबीआई को नहीं सौंपा। जबकि सीबीआई को जांच मिलने के पश्चात्् नियमानुसार सभी दस्तावेज और जानकारी उसे सौंप दिया जाना चाहिए था। सीबीआई इसी संबंध में राजीव कुमार से पूछतांछ करने के लिए तीन बार नोटिस भेज चुकी थी, पर वह बार-बार बहाने बनाकर सीबीआई के समक्ष उपस्थित नहीं हो रहे थे। तब मजबूर होकर सीबीआई को पूछताछ करने उनके घर जाना पड़ा, जिसका अंजाम सभी देख ही चुके हैं। यह बात अलग है कि ‘बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी‘ की तर्ज पर राजीव कुमार सीबीआई पूछताछ से बच नहीं पाए, क्योंकि सीबीआई की अर्जी पर सर्वोच्च न्यायालय उन्हें सीबीआई से पूछताछ करने के लिए उपलब्ध होने को कहा और शिलांग में उनसे पूछताछ हो ही रही है। अब ममता इसे भी अपनी नैतिक जीत बता रही हैं। वस्तुत: यह ममता की नैतिक जीत नहीं, राजीव कुमार प्रकरण के बहाने वह पूरी तरह बेनकाब हो गई हैं। इस घटना के चलते जनमानस में यह गंभीर आशंका व्याप्त हो गई है कि उपरोक्त घोटालों में कहीं-न-कहीं ममता की भी संलिप्तता है तभी तो वह राजीव कुमार के पक्ष में सारी मर्यादाएं और सीमाए तोड़कर खड़ी हो गई हैं।
लोगों के जहन में यह भी होगा कि 15 दिसंबर 2016 को सीबीआई ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रमुख सचिव राजेन्द्र कुमार के कार्यालय में घोटाले के ही सिलसिले में जब छापा डालने गई तो केजरीवाल ने कैसा कोहराम मचाया था। ऐसा हंगामा खड़ा किया गया कि जैसे यह मुख्यमंत्री के कार्यालय में छापा डाला गया हो। ज्ञातव्य है कि मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव का कार्यालय मुख्यमंत्री कार्यालय परिसर में ही होता है। गनीमत है कि दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के अधीन है वरना केजरीवाल भी ममता सरीखे ही कुछ कर गुजरने से न चूकते। केजरीवाल द्वारा यह भी कहा गया कि उनके प्रमुख सचिव के यहां छापा डालने से पूर्व उनसे पूछा क्यों नहीं गया? ठीक वैसे ही जैसे ममता ने अभी कहा कि बगैर सूचना के सीबीआई कैसे चली आई? यह बात अलग है कि इस संबंध में सीबीआई ने कलकत्ता पुलिस को सूचित तो किया ही था और उनसे सहयोग भी मांगा था। लोगों की याददाश्त में वर्ष 1997 की वह घटना भी होगी जब चारा घोटाले में संलिप्तता के चलते सीबीआई ने बिहार के डीजीपी से लालू यादव की गिरतारी के लिए सहयोग मांगा था, पर डीजीपी ने ऐसा कोई सहयोग देने से इंकार कर दिया था। परिणामत: इस मामले में फौज तक से सीबीआई द्वारा सहयोग लेने की चर्चाए सामने आई थीं।
उपरोक्त घटनाओं से क्या निष्कर्ष निकलता है? वह यही कि आजादी के बाद ऐसी कार्य संस्कृति विकसित की गई। खास तौर पर श्रीमती इंदिरा गांधी के 70 के दशक से कि अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति न होकर सत्तारूढ़ राजनेताओं के प्रति हो। फलत: पूरे देश में सत्तारूढ़ लोगों और अधिकारियों का एक गठजोड़ बन गया, जिसने देश को जमकर लूटा और जरूरत पड़ने पर दोनों एक दूसरे को पूरी ताकत से बचाने का उपक्रम करते हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण राजीव कुमार का प्रकरण है। आखिर में राजीव कुमार ने जब एसआईटी चीफ के हैसियत से ममता और उनके दल को लोगों को बचाया तो ममता भी उनके बचाव में पूरी शर्मों-हया खोकर क्यों न उतरें। इसी नेता-अधिकारी गठजोड़ का परिणाम है कि पश्चिम बंगाल में पूरी तरह जंगल राज कायम है। भाजपा नेताओं की सभाओं और रैलियों में व्यवधान डाला जा रहा है तो भाजपा कार्यकताओं, समथर्को को खुले आम प्रताड़ित ही नहीं किया जा रहा, उनकी हत्याएं भी की जा रही हैं।
लाख टके की बात है कि क्या किसी जांच ऐजेन्सी को यदि उस प्रदेश का मुख्यमंत्री न चाहे तो जांच करने का अधिकार नहीं है। इसके फिर कई अर्थ निकलते हैं। एक तो यह कि सीबीआई, ईडी, सीबीडीटी और एनआईए जैसी संस्थाओं का औचित्य ही क्या है? दूसरी बड़ी बात यह कि कोई प्रदेश क्या मुख्यमंत्रियों का जागीर है? या वह भारतीय संविधान के तहत कार्य करने को बाध्य है। तीसरी बड़ी बात यह कही जाती है कि मोदी और अमित शाह बदले की भावना से यह कर रहे हैं। बिडम्बना यह कि रार्बट वाड्रा के विरूद्ध ईडी की जांच को लेकर भी यही कहा जा रहा है। कार्ति चिदंबरम्् के प्रकरण में भी यही कहा गया। पर बड़ी बात यह कि सच्चे व्यक्ति को पूछताछ से क्या डरना? बावजूद इसके यदि किसी को लगता है कि जांच एजेन्सिया उन्हें नाजायत ढंग से फंसा रही है तो अदालत के दरवाजे खुले ही हैं। पर अंतिम सच यही है कि मोदी के दौर में जब देश को लूटनेवालों को जवाबदेह होना पड़ रहा है तब उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि सत्ता परिवर्तन ही उनके बचने का एकमेव माध्यम है। कुल मिलाकर ऐसी घटनाएं चोरी और सीनाजोरी का नायाब नमूना है।
12फरवरी/ईएमएस