लेख

(विचार-मंथन) आखिर समाधान कब (लेखक-सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

18/01/2021

कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से आंदोलन कर रहे किसानों की मांग जायज है या नहींं इस पर बात करने से ज्यादा जरूरी, समाधान निकालना है। अब तक 10 दौर की बातचीत हो चुकी है और अगले दौर की वार्ता कल यानी बुधवार को होनी है। यह वार्ता आगे का भविष्य तय करेगी। साथ ही यह भी बताएगी कि अब आंदोलन किस करवट बैठने वाला है। वार्ता से पहले कृषि मंत्री और किसान नेताओं के बीच बयानों का दौर भी तेज है। केंद्र सरकार कह रही है कि कानून रद्द करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प किसान बताएं, तो किसान कह रहे हैं कि उनका एक ही विकल्प है-कानून रद्द किया जाए। यह दोनों बयान यह बताने के लिए काफी हैं कि दोनों पक्ष किस तरह से अड़े हुए हैं औैर अपनी बात को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके हैं। इस सूरत में एक ही 100 वार्ता हो जाए, हल निकलने वाला नहीं हैै। उम्मीद सरकार से ही करनी होगी कि वह थोड़ा झुके और किसी भी तरह आंदोलन खत्म कराए क्योंकि आंदेालन अब न सिर्फ भारत बल्कि विदेशों में भी भारत की साख का सवाल बनता जा रहा है।
सरकार के रवैये से नाराज होकर कुछ किसान तो खुदकुशी जैसा आत्मघाती कदम तक उठा चुके हैं। इन घटनाओं से साफ है कि अगर सरकार ने जल्द ही कोई उचित समाधान नहीं निकाला तो आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ेंगे। किसान संगठन अपने इस रुख पर कायम हैं कि जब तक सरकार कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेती, तब तक आंदोलन खत्म नहीं होगा। सरकार भी साफ कर चुकी है कि कृषि कानूनों की वापसी नहीं होगी। छठे दौर की बातचीत के बाद सरकार ने दावा किया था कि किसानों की दो मांगें मान ली गई हैं और बाकी पर भी जल्द ही सहमति हो जाएगी। पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी शक्ल देने और कृषि कानूनों को वापस लेने के जिन असल मुद्दों पर किसान आंदोलित हैं, उनके समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल होती नहीं दिख रही। सरकार बार-बार किसानों को यह भरोसा देने में लगी है कि एमएसपी किसी भी सूरत में खत्म नहीं किया जाएगा और इसके लिए वह लिखित रूप में भी देने को भी तैयार है। टकराव का यही बड़ा बिंदु है। देशभर से आएलाखों किसानों ने जिस तैयारी के साथ दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाला हुआ है, उससे तो लगता नहीं है कि किसान खाली हाथ लौटेंगे। पिछले दो दिन की बारिश में किसानों के तंबुओं में पानी तक भर गया, खाने-पीने के सामान से लेकर बिस्तर तक भीग गए। इसमें कोई संदेह नहीं कि कड़ाके की ठंड से किसानों की मुश्किलें तो बढ़ रही हैं, लेकिन साथ ही जोश और जज्बा भी जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे भी आंदोलनकारियों के हौसले बुलंद हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट ने कानून के अमल पर रोक लगाने के साथ चार सदस्यीय कमेटी बनाई थी। हालांकि, बाद में एक सदस्य ने खुद को अलग कर लिया। अब बाकी बचे तीन लोगों की कमेटी किसानों की समस्याओं और कानूनों को लेकर उत्पन्न आशंकाओं को सुनेगी और फिर अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। अदालत ने किसान संगठनों से साफ-साफ कहा है कि गतिरोध दूर करने के लिए उन्हें भी कमेटी के समक्ष आना ही होगा। बिना उनके सहयोग के किसी भी तरह के हल की कोई गुंजाइश नहीं बनेगी। किसान संगठनों को यह बात गंभीरता से समझने की जरूरत है। सरकार और किसान संगठन अगर पहले ही अडिय़ल रुख छोड़ कर कोई उचित और तार्किक समाधान निकलने का प्रयास करते तो गतिरोध इतना नहीं खिंचता। लेकिन किसान कानूनों की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जामा पहनाने की मांग पर अड़े रहे और सरकार किसी भी सूरत में इन्हें वापस नहीं लेने की बात दोहराती रही।
18जनवरी/ईएमएस