लेख

पाँच सौ गुना तक महंगी बिक रहीं दवाएं (लेखक-अजित वर्मा/ईएमएस)

09/10/2019

आम आदमी के लिये सबसे जरूरी दवाओं की कीमतों को लेकर हमेशा से विवाद की स्थिति बनी रही है। अब यह बात सामने आयी है कि अस्पताल मालिक डॉक्टरों और केमिस्ट के दबाव में आकर दवा निर्माता दवा के पैकेट पर 500 फीसदी तक बढ़ा मनमाना दाम प्रिंट कर रहे हैं सभी दवा की कीमत पर 30 फीसदी का मार्जिन कैप लगने से दवा और मेडिकल उपकरणों की कीमतें 90 फीसदी तक कम हो जाएंगी, जिससे निर्माताओं के दवाओं की बिक्री के दाम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। गैर अधिसूचित दवाओं पर रिटेलर की खरीद की कीमत से 500 फीसदी तक से ज्यादा दाम ग्राहकों से वसूला जा रहा है। अभी हाल ही में प्रमुख कंपनियों के 1107 दवाइयों की स्टडी की गयी है, जिसका औसत एमआरपी रिटेलर की दवाओं की खरीद की कीमत से 500 फीसदी ज्यादा है। वहीं दूसरी ओर यह स्थिति भी है कि ब्रांडेड और जैनेरिक दवा के क्वालिटी में कोई अंतर नहीं है।
डॉक्टरों पर बड़े-बड़े या कैपिटल अक्षरों में जेनेरिक दवाएं लिखने की कोई बाध्यता नहीं है। वहीं अब तो अधिकांश डॉक्टरों ने खुद की दवाईयें की दूकानें भी खोल ली हैं। इसलिए अधिकांश डॉक्टर न पढ़े जाने वाली भाषा में ब्रांडेड दवाइयां लिख रहे हैं मरीजों को डॉक्टरों के पास बनी केमिस्ट की दुकानों से वह दवाएं मनमाने दामों पर खरीदनी पड़ती है।
दवा में ‘ब्रांड’ के नाम पर लूट का काला कारोबार- बीमारी से ज्यादा आम आदमी ‘महंगी दवाओं’ के बोझ से दब रहा है सरकार, निजी दवा कंपनियों के मनमर्जी के दाम वसूलने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने में पूर्णत: असफल साबित हुई है वहीं जन औषधालय, आम मरीज की पहुंच से दूर हैं और प्राइवेट दवा कपंनियों की तादाद बढ़ती जा रही है।
ब्रांडिंग के खेल में जेनरिक दवाओं के महत्व को दबाया जा रहा है। जीवनदाता सफेदपोश डॉक्टरों का ‘कमिशन’ कई गुना बढ़ गया है प्राइवेट दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव की घुसपैठ सरकारी अस्पतालों के अंदर खाने तक हो गई है और लूट का कारोबार चरम पर है। अब तो दवा कंपनियां डॉक्टरों को तरह-तरह के प्रलोभन भी देती हैं। कई कंपनियां तो ज्यादा दवाईयां खपाने वाले डॉक्टरों को अब विदेशों की सैर भी करवाती हैं। यह विडम्बना ही है कि डॉक्टरों और दवा के कारोबार को लेकर कोई गंभीर प्रयास होते नजर नहीं आ रहे हैं।
09अक्टूबर/ईएमएस