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क्राईस्टचर्च: नफरत से निकला प्रेम व सद्भाव का संदेश (लेखक- तनवीर जाफरी/ईएमएस)

26/03/2019

न्यूज़ीलैंड के क्राईस्टचर्च में पिछले दिनों दो मस्जिदों पर दक्षिणपंथी मानसिकता रखने वाले एक ही व्यक्ति द्वारा 50 मुसलमानों की बेरहमी से हत्या कर दी गई। ईसाई समुदाय के इस हमलावर का नाम ब्रेन्टन टेरेन्ट था जो आस्ट्रेलियाई नागरिक बताया जा रहा है। निश्चित रूप से इस 28 वर्षीय युवा अतिवादी ने मुस्लिम समुदाय के प्रति अपनी नफरत की भावना को हिंसक रूप में व्यक्त करने के लिए इतना बड़ा सामूहिक हत्याकांड रचा था। गौरतलब है कि न्यूज़ीलैंड विश्व के उन गिने-चुने शांतिप्रिय देशों में एक है जहां से इस प्रकार की धर्म-जाति तथा समुदाय आधारित हिंसा की खबरें नहीं सुनाई देतीं। यही वजह थी कि इस अतिवादी हमले के बाद न केवल न्यूज़ीलैंड बल्कि पूरा विश्व स्तब्ध रह गया। परंतु इस पूरे घटनाक्रम में सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि इस घटना के बाद न केवल न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री, वहां की सरकार बल्कि न्यूज़ीलैंड के आम लोगों का उदारवादी तथा सद्भावूपर्ण चेहरा भी उभर कर सामने आया। न्यूज़ीलैंड के लोगों ने इस घटना के बाद जिस तरह का बर्ताव स्थानीय मुस्लिम समाज के साथ किया वह नि:संदेह पूरे विश्व के लिए सबक लेने योग्य है।
आमतौर पर यही देखा जाता रहा है कि किसी राज्य अथवा देश में इस प्रकार की धर्म व संप्रदाय आधारित हिंसा के बाद स्थानीय प्रशासन व सत्ता केंद्रों को ही ऐसी घटना को न रोक पाने का दोषी माना जाता है। परंतु न्यूज़ीलैंड में क्राइस्टचर्च की मस्जिदों में हुए गोलीकांड के बाद प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए देश में बंदूकों की खुली बिक्री पर रोक लगाई तथा सभी प्रकार के सेमी ऑटोमेटिक हथियारों को प्रतिबंधित किए जाने की घोषणा की। इतना ही नहीं उन्होंने इस घटना के फौरन बाद टी वी के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित करते हुए न केवल इस घटना की घोर भत्र्सना की बल्कि पूरे देश के मुस्लिम समुदाय को भविष्य में ऐसी घटना न होने देने व उनकी पूरी सुरक्षा का भरोसा दिलाया। यही स्थिति लगभग पूरे न्यूज़ीलैंड में देखने को मिली। क्राईस्टचर्च की घटना के बाद न्यूज़ीलेंड का आम ईसाई समाज अपने-अपने क्षेत्र में बसने वाले मुसलमानों के घर व उनके प्रतिष्ठानों में जाकर मिला, उन्हें सौहाद्र्र का प्रतीक पुष्प भेंट किया तथा उनके साथ पूरे प्रेम व सद्भाव के साथ मिल-जुल कर रहने का आश्वासन दिया। पूरे न्यूज़ीलैंड में मस्जिदों व मुस्लिम संस्थाओं की सुरक्षा कड़ी कर दी गई। देश में एकजुटता दिखाने हेतु विभिन्न सथानों पर मानव श्रंृखला बनाई गई।
क्राईस्टचर्च की घटना के सप्ताह बाद के शुक्रवार को घटना की साक्षी रही अलनूर मस्जिद के समीप हैडले पार्क में जब गोलीकांड में मारे गए लोगों की स्मृति में शोकसभा का आयोजन किया गया वह भी न्यूज़ीलैंड के इतिहास का एक यादगार क्षण था। इस अवसर पर होने वाली शोकसभा का न्यूज़ीलैंड के राष्ट्रीय टेलीविज़न व रेडिया पर सीधा प्रसारण किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत अज़ान के साथ हुई। इस कार्यक्रम में ईसाई समाज के हज़ारों लोग, महिलाएं व बच्चे भी स्थानीय मुसलमानों के प्रति अपना सहयोग व सद्भाव प्रदर्शित करने हेतु इक्ठा हुए। शोकसभा के सम्मान में अधिकांश लोगों ने अपने सिरों को स्कार्फ से ढका हुआ था। स्वयं प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्र्न भी इस सभा में पीडि़त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने हेतु न्यूज़ीलैंडवासियों के साथ मौजूद रहीं। उन्होंने इस शोकसभा में बड़े ही आत्मविश्वास के साथ मुस्लिम समाज को आश्वस्त किया कि 'हम सब एक हैं और इस समय पूरा न्यूज़ीलैंड आपके प्रति संवेदना व्यक्त कर रहा है'। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कुरान शरीफ की आयतों का जि़क्र करते हुए कहा कि-'जब शरीर के किसी हिस्से को तकलीफ होती है तो पूरे शरीर को ही दर्द का एहसास होता है'। उन्होंने हमले के पीडि़तों हेतु एक राष्ट्रीय स्मारक सेवा की योजना बनाने की भी घोषणा की। प्रधानमंत्री की इस सभा में शिरकत तथा सिर पर स्कार्फ डालकर उनका शोकग्रस्त होकर सभा में ज़मीन पर बैठना न्यूज़ीलैंड के मुसलमानों को विश्वास दिलाने के लिए तथा उनके मन से किसी प्रकार के भय को भगाने के लिए पर्याप्त था। इस शोकसभा के दौरान नमाज़ पढ़ाने वाले मस्जिद के इमाम ने भी अपने संबोधन में जिस प्रकार न्यूज़ीलैंड के लोगों, वहां की सरकार तथा खासतौर पर वहां की प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा किया वह दृश्य भी देखने योग्य था। पूरी की पूरी शोकसभा मृतक मुसलमानों के प्रति शोक व्यक्त करने के बजाए प्रधानमंत्री व स्थानीय समाज का धन्यवाद करने तथा उनके द्वारा सद्भाव व सहयोग दिखाए जाने का आभार व्यक्त करने पर केंद्रित हो गई।
अलनूर मस्जिद के इमाम ने अपने लाईव प्रसारित हो रहे संबोधन में कहा कि 'एक बंदूक़धारी ने लाखों लोगों के दिल तोड़ दिए। परंतु आज मैं उसी जगह से देख रहा हूं और मुझे चारों ओर प्यार और करूणा दिखाई दे रही है। हमारा दिल टृटा है लेकिन हम नहीं टूटे। हम जीवित हैं हम साथ हैं, हमें कोई बांट नहीं सके इसके लिए हम दृढ़ हैं'। इसके पश्चात इमाम ने अपने संबोधन में सथानीय समाज, प्रधानमंत्री तथा पूरे देशवासियों के लिए बार-बार धन्यवाद किए जाने की झड़ी सी लगा दी। गोया कहा जा सकता है 50 लोगों के मारे जाने के अवसर पर बुलाई गई शोकसभा स्थानीय लोगों के व्यवहार के कारण धन्यवाद, सद्भाव, प्रेम तथा हौसले की सभा के रूप में परिवर्तित हो गई। यही वजह थी कि न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री तथा स्थानीय लोगों के व्यवहार की चर्चा पूरी दुनिया के मीडिया द्वारा बार-बार की गई। पूरे विश्व ने यह महसूस किया कि ऐसे वक्त में जबकि संसार सभ्यता के संघर्ष के मुहाने पर खड़ा हुआ है तथा विभाजनकारी ताकतें इस प्रकार के संघर्ष को लगातार हवा देने का काम कर रही हैं ऐसे में न्यूज़ीलैंड की प्रधामंत्री द्वारा पीडि़तों के परिजनों से उनके घर जाकर गले मिलना, उनके गम में शरीक होना, बंदूक़ों के लाईसेंस को प्रतिबंधित करना, मुस्लिम समाज को सुरक्षा का भरोसा दिलाना तथा उनकी मान्यताओं को सम्मान देना इस बात का प्रमाण है कि भले ही संसार के ‎फितनापरस्त नेता व संगठन मानवता के विरुद्ध कितना ही बड़ा षड्यंत्र क्यों न रचें परंतु मानवता का इस पृथ्वी से अंत नहीं होने वाला।
क्राईस्टचर्च की घटना से हमारे देश के लोगों को भी सबक लेने की ज़रूरत है। भारतीय समाज अपने-आप को बड़ा ही धर्मपरायण या मानवता का पक्षधर अथवा वसुधैव कुटुबंकम की परिकल्पना का पैरोकार या विश्व बंधुत्व का पक्षधर बताता है उसी समाज से क्या यह चंद सवाल नहीं पूछे जा सकते कि जब कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से बेघर किया जा रहा था उस समय क्या कश्मीरी समाज ने उन्हें रोकने या उन्हें कश्मीरियत अथवा अपनत्व का विश्वास दिलाने का प्रयास किया था? क्या 1984 के सिख दंगों के समय किसी मानवतावादी समाज ने उस पीडि़त सिख समाज के ज़ख्मों पर मरहम लगाने का साहस दिखाया था? जिस समय गुजरात में सत्ता प्रतिष्ठान के संरक्षण में चल रहे मुस्लिम नरसंहार में पूरे राज्य में लाशें तथा मकान जलते दिखाई दे रहे थे उस समय क्या किसी सहिष्णु समाज या सत्ता के राज्य मुखिया द्वारा स्थानीय पीडि़त समाज के आंसू पोंछने या उनके प्रति हमदर्दी जताने की कोशिश की गई थी? जी नहीं हमारे यहां तो हत्यारों को सम्मानित किए जाने, उन्हें फूलमाला पहनाने, किसी अनपढ़, जाहिल परंतु सांप्रदायिक हत्यारे को फूलमालाएं पहनाकर उसे हीरो बनाने, यहां तक कि नरसंहार की साजि़श रचने वाले को सत्ता के सर्वोच्च पदों तक पहुंचाने का चलन है। शायद यही वजह है कि जब क्राईसटचर्च के हत्यारे पर पूरा न्यूज़ीलैंड थूक रहा था उस समय हमारे ही देश के कुछ अति उत्साही दक्षिणपंथी उसी हत्यारे को हीरो बताने का दु:स्साहस कर रहे थे। पूरे विश्व को क्राईस्टचर्च की घटना तथा उसके बाद की परिस्थितियों से सबक लेने की ज़रूरत है।
ईएमएस/ 26 मार्च 2019