लेख

(पुस्तक चर्चा ) खामोशी की चीखें चर्चाकार ... विवेक रंजन श्रीवास्तव / ईएमएस)

14/01/2022


खामोशी की चीख शीर्षक से ही मेरी एक कविता की कुछ पंक्तियां हैं ...

"खामोशी की चीख के
सन्नाटे से ,
डर लगता है मुझे
मेरे हिस्से के अंधेरों ,
अब और नहीं गुम रहूंगा मैं
छत के सूराख से
रोशनी की सुनहरी किरण
चली आ रही है मुझसे बात करने . "

कवि मन अपने परिवेश व समसामयिक संदर्भो पर स्वयं को अभिव्यक्त करता है यह नितांत स्वाभाविक प्रक्रिया है . हिमालय पर्वत श्रंखलायें सदा से मेरे आकर्षण का केंद्र रही हैं . मुझे सपरिवार दो बार जम्मू काश्मीर के पर्यटन के सुअवसर मिले . बारूद और संगिनो के साये में भी नयनाभिराम काश्मीर का करिश्माई जादू अपने सम्मोहन से किसी को रोक नही सकता .वरिष्ठ कवि पिताजी प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ने वहां से लौटकर लिखा था.. "
लगता यों जगत नियंता खुद है यहाँ प्रकृति में प्राणवान
मिलता नयनो को अनुपम सुख देखो धरती या आसमान
जग की सब उलझन भूल जहाँ मन को मिलता पावन विराम
हे धरती पर अविरत स्वर्ग काश्मीर तुम्हें शत शत प्रणाम "
आतंकी विडम्बना से वहां की जो सामाजिक राजनैतिक दुरूह स्थितियां विगत दशकों में बनी उनसे हम सभी का मन उद्वेलित होता रहा है . किन्तु ऐसा नही है कि काश्मीर की घाटियां पहली बार सेना की आहट सुन रही है , इतिहास बताता है कि सदियों से आक्रांता इन वादियों को खून से रंगते रहे हैं . लिखित स्पष्ट क्रमबद्ध इतिहास के मामले में काश्मीर धनी है, नीलमत पुराण में उल्लेख है कि आज जहां काश्मीर की प्राकृतिक छटा बिखर रही है , कभी वहाँ विशाल झील थी , कालांतर में झील का पानी एक छेद से बह गया और इससुरम्य घाटी का उद्भव हुआ . इस पौराणिक आख्यान से प्रारंभ कर , १२०० वर्ष ईसा पूर्व राजा गोनंद से राजा विजय सिन्हा सन ११२९ ईस्वी तक का चरणबद्ध इतिहास कवि कल्हण ने "राजतरंगिणी " में लिपिबद्ध किया है . १५८८ में काश्मीर पर अकबर का आधिपत्य रहा , १८१४ में राजा रणजीत सिंह ने काश्मीर जीता , यह सारा संक्षिपत इतिहास भी डा संजीव कुमार ने "खामोशी की चीखें" के आमुख में लिखा है , जो पठनीय है . श्री यशपाल निर्मल , डा लालित्य ललित , व डा राजेशकुमार तीनो ही स्वनामधन्य सुस्थापित रचनाकार हैं जिन्होने पुस्तक की भूमिकायें लिखीं है .
पुस्तक में वैचारिक रूप से सशक्त ५२ झकझोर देने वाली अकवितायें काश्मीर के पिछले दो तीन दशको के सामाजिक सरोकारो , जन भावनाओ पर केंद्रित हैं . यद्यपि कविता आदिवासी व कोरोना दो ऐसी कवितायें हैं जिनकी प्रासंगिकता पुस्तक की विषय पृष्ठभूमि से मेल नहीं खाती , उन्हें क्यो रखा गया है यह डा संजीव कुमार ही बता सकेंगे .
डा संजीव कुमार स्त्री स्वर के सशक्त व मुखर हस्ताक्षर हैं. वे काश्मीरी महिलाओ पर हुये आतंकी अत्याचारो के खिलाफ संवेदना से सराबोर एक नही अनेक रचनाये करते दिखते हैं .
उदाहरण स्वरूप ..
लुता चुकी हूं ,
अपना सब कुछ ,
अपना सुहाग ,
अपना बेटा , अपनी बेटी ,
अपना घर ,
पर पता नही कि मौत क्यों नही आई ?
ये वेदना जाति धर्म की साम्प्रदायिक सीमाओ से परे काश्मीरी स्त्री की है . ऐसी ही ढ़ेरो कविताओ को आत्मसात करना हो तो "खामोशी की चीखें" पढ़ियेगा , किताब अमेजन पर भी सुलभ है .
14जनवरी/ ईएमएस