लेख

एक अवसरवादी सुझाव ‘आत्मनिर्भरता’ की सीमा युद्ध उपकरणों तक बढ़ाएँ....! (लेखक- ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस)

30/06/2020


हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी जी ने जो हमारे देश को हर दृृष्टि से ‘आत्मनिर्भर’ बनाने का जो संकल्प लिया है, वह हर दृष्टि से स्तुत्य व वंदनीय है, यह सही है कि हमारी आजादी की उम्र 73 साल की हो गई है और इस उम्र में हमारे परिवार के बुजुर्ग आत्मनिर्भरता के लिए उसी तरह तड़पते है, जैसे आज भारत को हर दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी तड़प रहे है और इसमें कोई आशंका भी नहीं कि मोदी जी इस संकल्प को जल्द ही मूर्तरूप दे भी देंगे। मोदी जी ने यह संकल्प चाहे चीन के साथ मौजूदा वाणिज्यिक सम्बंधों को लेकर लिया हो, किंतु पूरा देश मोदी जी के इस संकल्प को लेकर काफी खुश और उत्साही है, अब इस संकल्प की सीमा को लेकर मेरा एक विनम्र सुझाव था कि इस आत्मनिर्भरता का मंत्र सीमा में हमारे युद्ध उपकरणों को भी शामिल कर लिया जाना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत ने अब तक इस दिशा में भी अनेक कीर्तिमान स्थापित किए है और करते भी रहेंगे, किंतु यदि इस मुद्दें को भी प्रधानमंत्री जी की संकल्प सीमा में शामिल कर लेते है, तो हमें युद्ध के आधुनिकतम उपकरणों के लिए भी अन्य देशों का मुंह नहीं ताकना पडे़गा। हमारे देश के कुल बजट का बीस से तीस प्रतिशत भाग या कभी-कभी पचास प्रतिशत भाग तक हम आधुनिकतम युद्ध अस्त्र-शस्त्रों की खरीदी पर खर्च करते है, यदि हम पिछले पांच सालों में इस कार्य पर पचास लाख करोड़ से भी ज्यादा खर्च कर चुके है और विदेशों की जेबें भर चुके है, तो हम विश्व के महान शक्तिवान देशों से अपने सम्बंधों का फायदा उठाकर वहां की आयुध निर्माण तकनीक को हमारे देश में क्यों नहीं लाते, यदि हमने यह लक्ष्य पार कर लिया तो हमें किसी भी देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और ठीक समय पर हम स्वयं द्वारा निर्मित आयुधों का उपयोग कर पाएगें और यदि इस कार्य में हम ‘सरप्लस’ ही जाते है तो अन्य छोटे-मोटे देशों को हम ये आयुध बैच भी सकते है।
.....और इस पुनीत कार्य के लिए फिलहाल मौजूदा समय ही सर्वश्रेष्ठ है। आज हमारे दो महाशक्तिशाली देशों अमेरिका और सोवियत रूस दोनों से ही मधुर सम्बंध है, साथ ही उत्तर कोरिया जैसे युद्ध उपकरणों के प्रमुख निर्माता देश से भी अच्छे सम्बंध है, तो फिर हम अपने इन सम्बंधों को भुनाने के प्रयास क्यों न करें? इन देशों से समझौतों के माध्यम से आयुध निर्माण की तकनीक हम प्राप्त कर सकते है और हम महज एक बार इस हेतु बड़ा बजट तैयार कर हमारे देश में इन आयुधों के निर्माण संयंत्र स्थापित कर सकते है, चूंकि यह एक साहसिक नेतृत्व ही फैसला ले सकता है, इसीलिए मोदी जी से यह अपेक्षा है।
.....फिर यह भी तो अच्छा नही लगता कि अतीत में ‘विश्वगुरू’ के पद पर विराजित देश अपनी छोटी-छोटी आवश्यक्ताओं के लिए अन्य देशों के सामने झोली फैलाये। जैसे कि हमारे प्रतिरक्षा मंत्री ने अपनी मास्कों यात्रा के दौरान आयुधों के लिए रूस के उप-प्रधानमंत्री से अनुनय-विनय किया और उन्हें महज आश्वासन ही मिल पाया। अरे, आज जब उत्तर कोरिया जैसा छोटा सा तानाशाही सरकार वाला देश आयुध निर्माण का शहंशाह बना हुआ है तो हमारे स्वर्णिम अतीत वाला हमारा देश इस दिशा में कीर्तिमान स्थापित क्यों नहीं कर सकता? हमारे पौराणिक ग्रन्थ युद्ध कला व आयुध निर्माण तकनीक से परिपूरित है, हमारे देवताओं द्वारा भेंट किए जाने वाले ब्रम्ह्मस्त्र आदि भी तो यहीं बने होंगे, या अभिमंत्रित हुए होंगे, मेरा तो सुझाव है कि सरकार को आयुष की तरह ही आयुध विभाग भी शुरू कर देना चाहिए, जिसमें युद्धास्त्रों के निर्माण की तकनीकों व पौराणिक मंत्रों पर शौध की जा सके और हमारे देश में अतीत की तरह ही फिर से अमोध अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण शुरू हो सके।
.....चूंकि अब धीरे-धीरे हर दृष्टि से कठिन दौर आने वाला है, इसके संकेत भी मिलना शुरू हो गए है, इसलिए अब यह जरूरी हो गया है कि हमारे अस्तित्व के लिए हम हर क्षेत्र में वे सब प्रयास शुरू कर दे जिससे हम हमारे अस्तित्व को बनाए रख सकें और चूंकि इसमें ‘आत्मरक्षा’ भी एक महत्वपूर्ण बिन्दु है, इसलिए अब हमें अपनी ‘आत्मनिर्भरता’ की सीमा में ‘आयुध निर्माण’ को भी शामिल करना पड़ेगा।
30जून/ईएमएस