लेख

(राष्ट्रीय हथकरघा दिवस) कोरोना की मार से लाचार हथकरघा कुटीर उद्योग (लेखक- मजीद खां पठान/ ईएमएस)

07/08/2020

भारतीय अर्थव्यवस्था में हथकरघा के माध्यम से अपना बहुमूल्य योगदान प्रदत्त करते बुनकर एवं हथकरघा को भारतीय परिवेश में कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। बुनकरों के आम जनजीवन सहित दिलो-दिमाग में हथकरघा का वही स्थान है जिस प्रकार भारतीय किसान के लिए खेती किसानी। हथकरघा बुनकर के लिए ही नहीं अपितु उसके संपूर्ण परिवार के लिए भरण-पोषण का साधन भी है। किसान यदि अन्नदाता है तो बुनकर वस्त्रदाता है, दोनों का ही महत्व मानव जीवन में अमूल्य है। संपूर्ण मानव समाज के पेट की आग को शांत करने के लिए दो रोटी आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है ठीक इसी प्रकार मानव जीवन में अंग ढकने के लिए वस्त्र आवश्यक है। एक ओर जहां किसान कृर्षि के माध्यम से जन सामान्य के लिए दो जून की रोटी हेतु अन्न पैदा कर उपलब्ध कराता है। ठीक इसी प्रकार बुनकर हथकरघा के माध्यम से आमजन का अंग ढकने के लिए विभिन्न प्रकार के वस्त्र निर्मित करता है। यही नहीं दोनों क्षेत्र का भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान शामिल है जिसे किसी भी स्तर दरकिनार नहीं किया जा सकता है।
भारत का दिल मध्य प्रदेश स्थित ऐतिहासिक एवं पर्यटन नगर चन्देरी यूं तो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। देश प्रदेश ही नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चंदेरी का नाम पर्यटन क्षेत्र में आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। एक हजार साल से निरंतर आबाद वर्तमान नगर एक ओर जहां ऐतिहासिक किला, महल, मंदिर- मस्जिद कुंआ- बावड़ी आदि के लिए जाना पहचाना जाता है। तो दूसरी ओर उससे भी अधिक स्थानीय हुनरमंद बुनकर पीढ़ी-दर- पीढ़ी प्राप्त अनुभव के आधार पर हथकरघा के माध्यम से निर्मित कलात्मक दिलकश सतरंगी रेशमी धागों से गुथी चंदेरी साड़ियों एवं अन्य ड्रेस मटेरियल के लिए जाना पहचाना जाता है।
यह सब आज-कल की दास्तां ना होकर सदियों पूर्व से हथकरघा से जुड़े पक्के गठजोड़ की कहानी हैं। हथकरघा और चंदेरी का चोली दामन का यह साथ पिछले छैं-सात सौ वर्षों से निरंतर जीवित अवस्था में आज तक जारी है। इस स्तर पर विश्वास भी व्यक्त किया जाता है कि सदियों पूर्व से स्थापित यह अटूट रिश्ता आगे भी सदियों तक बदस्तूर जारी रहेगा। इस सुख दु:ख भरी दुनिया में आगे आप भी नहीं होंगे तो हम भी नहीं होंगे बावजूद इसके हथकरघा का अनेक सफलताओं-असफलताओं से भरा-पूरा यह सफर यूं ही चलता रहेगा।
14-15वीं में नगर में आया हथकरघा अपने संपूर्ण सफल जीवन यात्रा अपने गौरवमयी विभिन्न आयामों का मिश्रण पूर्ण कामयाब फलसफा का बखान वखूबी सप्रमाण सहित करता है। हाथकरघा दर्शाता है कि उसने चंदेरी पर राज कर रहे विभिन्न राजवंशों की सफल-असफल नीतियों का किस प्रकार पालन किया है। वह यह भी बताता है कि उसने किस काल खंड में किस प्रकार की मुसीबतों का सामना किया है लेकिन जीवन यात्रा को विराम कभी नहीं दिया है। देखें आज कोरोना काल में हथकरघा पर चारों ओर से मुसीबतों का पहाड़ टूटा हुआ है फिर भी वह रो-गा कर अपने दिन जैसे तैसे व्यतीत कर रहा है।
यदि हाथकरघा और बुनकरों के हाथों के कमाल की बात की जावे तो दूर तक जाती है। एक तो यहां का खानादानी बुनकर कही पर भी प्रशिक्षण प्राप्त नहीं करता बल्कि उल्टे देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर अन्य बुनकरों को प्रशिक्षण देने का कार्य काम करता है। दूसरे उसे यह पैत्रिक गुण उसके पारिवारिक वरिष्ठजन से बाल्यकाल से ही प्राप्त होने लगता है यानी बुनाई के सारी की सारी प्रक्रियाएं वह बखूबी अपने ही परिवार में देखता, समझता करता रहता है जिसके बलबूते पर वह आगे आने वाले समय में हथकरघा के माध्यम से प्रदर्शित करता है।
याद रखना होगा कि स्थानीय बुनकर एक नहीं कई पीढ़ियों से हथकरघा से संबंध स्थापित किए हुए हैं जो वंशानुगत होकर आगे बढ़ता रहता है। घर का संपूर्ण वातावरण हाथकरघा के इर्द-गिर्द घूमता है। बालक बालिकाएं माता-पिता के साथ रहकर इस हुनर को स्वयमेव ग्रहण कर लेते हैं। आप होशियार बुनकर को किसी भी तरह की जटिल से जटिल डिजाइन पेश करेंगे बुनकर उसे बखूबी खूबसूरती के साथ हाथकरघा के माध्यम से बुनाई कर साड़ी अथवा अन्य कपड़ा पर उकेर देगा। चाहे वह डिजाइन फूल पत्ती, बेल बूटे हो अथवा पशु पक्षी या स्मारक आदि हो। साड़ी पर उकेरी गई *मेहंदी लगे हाथ* यहां की मशहूर डिजाइन है। यही नहीं विशेषता यह होगी कि जब तक कपड़ा रहेगा तब तक डिजाइन रहेगी यानी डिजाइन कपड़ा निर्माण के साथ ही प्रक्रिया में आगे बढ़ती है जो डिजाइन एवं कपड़ा को मजबूती प्रदान करती है।
यह वही हाथकरघा है जो अपने हुनर के दम पर एक बार नहीं कई बार प्रदेश देश स्तर पर ही नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा बिखेर कर सम्मान प्राप्त करने का अधिकारी बना है। एक नहीं अनेक प्रतियोगिताओं में यहां के बुनकर हाथकरघा के सहारे अपने श्रेष्ठतम प्रदर्शन के बल पर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर भारत के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। एक नहीं अनेक बुनकर अपनी बुनाई कार्यकुशलता के कारण प्रदेश स्तर पर स्थापित संत कबीर पुरस्कार प्राप्त कर चंदेरी के मान सम्मान को आगे बढ़ा चुके हैं।
यह वही हाथकरघा है जिसके माध्यम से नगर के बुनकर 1992 ईस्वी में गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर मध्य प्रदेश राज्य की ओर से राजपथ दिल्ली में निकलने वाली झांकी में जीवंत प्रदर्शन कर वाहवाही लूट चुके हैं। यह वही हथकरघा है जिसके कारण यूनेस्को जैसी विश्व स्तरीय संस्था *संयुक्त राष्ट्र टेक्सटाइलस विकास संस्था* का आगमन चन्देरी के आंगन में हुआ था फल स्वरुप चंदेरी साड़ी को विधिवत *जी.आई. टैग* जारी हुआ है। यह भी हाथकरघा की उन्नति का एक उल्लेखनीय आयाम है कि नगर में *हेण्डलूम पार्क* का उदय हुआ। यही नहीं आज हाथकरघा एवं बुनकरों की मेहनत के फल स्वरुप चंदेरी साड़ियां विश्व स्तरीय संस्था *यूनेस्को क्रिएटिव सीटी* अंतर्गत टेक्सटाइलस श्रेणी में शासन द्वारा प्रस्तावित होकर प्रक्रियाधीन, विचारणीय है।
परंपरागत पेशेवर बुनकरों के हाथों का कमाल है कि 2010 ईस्वी दिल्ली में आयोजित *कांमनवैल्थ खेल* में विजेता खिलाड़ियों के गले में डाला जाने वाला स्कार्फ चन्देरी हथकरघा की ही देन थी। यदि 2004 ईस्वी में चन्देरी हस्तशिल्प कला ने भारत के बाहर विदेशों में जैसे शारजहां में आयोजित प्रतिष्ठित *रमादान उत्सव* में अपनी छाप छोड़ी है तो उसके पीछे सफलता की कहानी दर्ज कराने वाला यही हाथकरघा ही है जिसके माध्यम से यह सब संभव हुआ है। यह सब हाथकरघा की जादूगरी है कि आज भी उस पुरानी कहावत चंदेरी और ढाका की मलमल अंगूठी में से निकल जाती है के विपरीत स्थानीय बुनकर हथकरघा पर निर्मित दुपट्टा को अंगूठी में से निकालने का हुनर जिंदा रख समय-समय पर उसका प्रदर्शन भी करते रहते हैं। यह बुनकरों एवं हथकरघा का मिलाजुला प्रतिफल है कि 1 मई 2019 ईस्वी को महामहिम राज्यपाल मध्यप्रदेश शासन आनंदीबेन पटेल का चन्देरी आगमन बुनकरों के निवास पर जाकर उनसे हाथकरघा चंदेरी साड़ियों की बारीकियों को समझना बुनकरों की सुखद स्मृतियों में अंकित है।
सब कुछ मिलाकर कहना यह है कि हाथकरघा इस नगर की जीवित चलायमान जीवन रेखा होकर आन बान शान और पहचान है। नगर की अधिकतर आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस हाथकरघा से जुड़ी हुई है। हाथकरघा पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनुभव प्राप्त बुनकरों द्वारा निर्मित की जा रही सुंदर रंग-बिरंगी साड़ियों को प्रत्यक्ष रुप से देखना और हाथकरघा से निकलती हुई *खट-खट* की मीठी मीठी आवाज को सुनना एक अलग ही अनुभव है।
चंदेरी पर्यटन और चंदेरी साड़ियां एक दूसरे के पूरक हैं। वगैर हथकरघा और चंदेरी साड़ी के चंदेरी पर्यटन की कहानी आधी अधूरी समान है। चंदेरी पर्यटन को बढ़ावा देने में हथकरघा और उस पर नरम गरम नाजुक हाथों से सतरंगी धागों के ताना-बाना में लिपटी चंदेरी साड़ियों के अमूल्य योगदान को किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार से पृथक नहीं किया जा सकता है। चंदेरी पर्यटन में हाथकरघा एक अहम किरदार है अतएव उसका संरक्षण संवर्धन हेतु कृत संकल्पित होना शासन के साथ साथ हम सब का भी नैतिक दायित्व है।
*7 अगस्त 2020 राष्ट्रीय हथकरघा दिवस* के शुभ अवसर पर नगर के उन तमाम हुनरमंद बुनकरों को सलाम जो आज भी समय-समय पर आई और गई आसमानी सुल्तानी मार से बचते बचाते हुए पुश्तैनी हथकरघा हस्तशिल्प कला से मुंह नहीं मोड़ कर अपने बुजुर्गों से प्राप्त हुनर को जीवित रखकर चंदेरी के मान सम्मान की खुशबू सारी दुनिया के कोने कोने में बिखेर रहे हैं। जग जाहिर है कि आजकल कोरोना की मार से सारी दुनिया में त्राहि-त्राहि मची हुई है देश की अर्थव्यवस्था चौपट होने की कगार पर है सारे उद्योग धंधे आवागमन के साधन बंद है। ऐसी विषम परिस्थितियों में हथकरघा और चंदेरी साड़ियां भी कोरोना की जबरदस्त मार से बिलख- बिलख कर रोते हुए अपनी आप बीती सुना रही हैं। आज नगर में एक नहीं अनेक हाथकरघा कोरोना की अदृश्य मार से बंद पड़े हैं थोड़े बहुत जो चलायमान है वह भी सुबह-शाम की रोटी हेतु कठिन संघर्षमय स्थिति से गुजर रहे हैं। हथकरघा कार्य करना चाहता है लेकिन उसे कार्य नहीं मिल रहा है, कार्य देने वाले भी मजबूर हैं क्योंकि हथकरघा से उत्पादित चंदेरी साड़ियां क्रय विक्रय को तरस रही हैं।
इस प्रकार हाथकरघा आज असहाय, बेबस लाचारी के दिन व्यतीत कर रहा है। अच्छा भला हाथकरघा पुनः अच्छे दिनों की ओर कब लौटेगा व्यक्त करने की स्थिति में ना होकर एक बार फिर कोरोना के सताए हुए हाथकरघा के जज्बे को सलाम करते हैं कि विपरीत निर्मित परिस्थिति उपरांत वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बरकरार रखे हुए हैं। याद रखना होगा कि 2009 ईस्वी में जब सिने अभिनेता आमिर खान एवं अभिनेत्री करीना कपूर चंदेरी आकर बुनकर के घर गए थे हथकरघा एवं चंदेरी साड़ियों की बारीकियों को समझा था तब बुनकरों के हाथों की जुदाई कारीगरी को देखकर आमिर खान ने कहा था कि-
*देश के लोग हमें कलाकार बोलते हैं लेकिन हम आपको कलाकार कहते हैं।*
ईएमएस/ 07 अगस्त 2020