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(विचार-मंथन) हाईकोर्ट के अधिकारों को कम कर रही है सुप्रीम कोर्ट? (लेखक-सनत जैन / ईएमएस)

13/02/2020


सुप्रीम कोर्ट क्या हाईकोर्ट के अधिकारों को कम कर रही है? ऐसी चर्चाएं आम आदमी और विधि विशेषज्ञों में होने लगी है। विधि विशेषज्ञों का मानना है, कि सुप्रीम कोर्ट को सामान्य स्थिति में किसी मामले को सीधे सुनने का अधिकार नहीं है। किसी विषम परिस्थिति में ही सुप्रीम कोर्ट अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए, किसी प्रकरण पर सुनवाई कर सकता है। पिछले वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों की हाई कोर्ट में समान मामलों के जो प्रकरण लंबित थे। उन्हें अपने पास बुला कर हाईकोर्ट की शक्तियों को अप्रत्यक्ष रूप से कम करने का प्रयास किया है। कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सीधे सुनवाई करके हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र मैं हस्तक्षेप करने का काम किया है। इसको लेकर हाईकोर्ट के न्यायाधीशों में भी बेचैनी देखने को मिल रही है। कोई भी न्यायधीश खुलकर अपनी बात नहीं कह पा रहा है। बातचीत के दौरान विधि विशेषज्ञ और हाईकोर्ट के जज यह स्वीकार करते हैं, कि हाई कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर ही सुप्रीम कोर्ट को अपील में सुनना चाहिए। जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट सीधे मामले की सुनवाई करने लगा है। उससे कई राज्यों के याचिकाकर्ताओं की स्थिति और वास्तविकताओं पर विचार हुए बिना सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है। इससे न्यायपालिका की छवि धूमिल हो रही है।
पिछले वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न राज्यों की हाईकोर्ट में दर्ज याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में बुलाकर उनकी एक साथ सुनवाई की। कई अन्य मामले भी इसी तरह के सामने आए हैं। जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट ने मामले सुनवाई के लिए भेजने को कहा। जिसके कारण हाईकोर्ट में उन मामलों में विचार नहीं हो सका। हाल ही में केंद्र सरकार ने सीएए (नागरिक संशोधन अधिनियम) वाले कानून को लेकर जो चुनौतियां दी गई थी। 370 को लेकर जो चुनौतियां हाई कोर्ट में दी गई थी। उन सब मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में करने की बात कहकर सारी याचिकाओं को अपने पास बुला लिया। इस तरह के मामले में विभिन्न हाईकोर्ट में यदि सुनवाई होती, गुण-दोष के आधार पर विभिन्न हाई कोर्ट के न्यायाधीश सुनवाई के पश्चात जो निर्णय पास करते। यदि उसमें कोई गलतियां होती, तो सुप्रीम कोर्ट ज्यादा अच्छे तरीके से उस पर विचार कर सकती थी। यह भी कहा जा रहा है, सीधे सुनवाई होने से आम आदमी के मौलिक अधिकारों का भी हनन हो रहा है। न्याय प्रक्रिया में यदि अधीनस्थ कोर्ट से निर्णय में कोई त्रुटि होती। उससे बड़ी अदालत उस गलती को दुरुस्त करती। इससे आम आदमी के साथ न्याय होता। जब सुप्रीम कोर्ट ही सीधे फैसला देगी, ऐसी स्थिति में केवल उन्हीं लोगों को न्याय मिल सकेगा जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकते हैं। मंहगे वकीलों की मंहगी फीस अदा कर सकते है। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट जब इस तरह से किसी मामले की सारी याचिकाओं को प्रशासकीय आदेश के तहत अपने पास बुला लेता है। इससे हाईकोर्ट में पदस्थ न्यायाधीशों के अधिकारों का हनन भी होता है। विधि जगत में चर्चाओं के अनुसार हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के पद पर नियुक्त होते हैं। वहीं हाईकोर्ट के न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश बनने और वरिष्ठता क्रम पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के भरोसे होते हैं। जिस तरह की स्थिति वर्तमान में देखने को मिल रही है। कॉलेजियम पर जिस तरह के प्रश्न चिन्ह लगाए जा रहे हैं। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाओं को अपने पास बुला कर सुनवाई करना हाईकोर्ट के अधिकारों का हनन करने जैसा है। पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका के फैसलों को लेकर जो प्रतिक्रिया आम आदमी के बीच होने लगी है, वह चिंता का विषय है। कुछ विशेष मामलों में जिसमें देश के करोड़ों नागरिकों के अधिकारों और मौलिक अधिकारों पर असर होता है। ऐसे मामलों में यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीधे सुनवाई की जाती है। उससे आम आदमियों में निराशा है। यह भी देखने में आ रहा है, कि पिछले वर्षों में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट आदेश देने के स्थान पर सलाह देने का काम करके, प्रकरणों का निपटारा अथवा सुनवाई निलंबित कर देते हैं। ऐसी स्थिति में आम आदमी को न्याय नहीं मिल पाता है। याचिकाकर्ता कार्यपालिका की प्रताड़ना का शिकार होता रहता है। पिछले वर्षों में न्यायपालिका द्वारा अधिकांश मामलों में सरकारी पक्ष को संरक्षण देता हैं। यह भी आम आदमियों के साथ अन्याय है। कार्यपालिका और विधायका के खिलाफ नागरिकों को न्याय मिलने की उम्मीद केवल न्यायपालिका से ही होती है। यदि न्यायपालिका सरकारी पक्ष को विशेष तरजीह देती है, तो यह आम आदमी के साथ एक किस्म की प्रताड़ना है। सरकार और उनके वकील लगातार मामले को आगे बढ़ाते रहते हैं। आरक्षण, प्रमोशन जैसे मामले कई-कई वर्षों तक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित बने रहते हैं। जिन लोगों ने याचिका लगाई होती हैं, वह सेवानिवृत्त हो चुके होते हैं। कई की मृत्यु हो जाती है। लेकिन उन्हें न्याय समय पर नहीं मिल पाता है। जिसके कारण आम नागरिकों में न्यायपालिका पर विश्वास दिनों-दिन कम होता जा रहा है। कई मामलों में तो न्यायपालिका का यह व्यवहार याचिकाकर्ता के साथ एक तरह से अन्याय करने के समान होता है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों और अधिकारों की सुरक्षा का दायित्व न्यायपालिका का है। जब आम आदमी का न्याय व्यवस्था पर विश्वास कम होगा या खत्म होगा। यह स्थिति न्यायपालिका के लिए भी बेहतर नहीं होगी। सबसे आश्चर्य का विषय यह है, कि पूर्व न्यायाधीश भी अब वर्तमान न्यायाधीशों के फैसलों और नियुक्तियों पर खुलकर अपनी राय व्यक्त करने लगे हैं। निश्चित रूप से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ वर्तमान न्यायाधीशों की तुलना में आम आदमी के बीच उनकी विश्वसनीयता ज्यादा है। ऐसी स्थिति में जब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश कोई बात कहते हैं, तो आम जनता में इस की बड़ी प्रतिक्रिया होती है। सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह हाईकोर्ट में पदस्थ न्यायाधीशों के अधिकारों को बनाए रखें। नागरिक भी अपने अधिकारों का उपयोग अपने अपने राज्य की हाई कोर्ट में कर सके। गुण-दोष के आधार पर जब तक सुनवाई पूरी नहीं होती है। तब तक मामलों की सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट को बचना चाहिए। प्रशासकीय प्रक्रिया में संविधान के अनुच्छेद 32 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट सीधे मामले को सुन सकती है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है। यदि विभिन्न राज्यों की हाईकोर्ट में किसी एक ही कानून को लेकर यदि कोई चुनौती दी जाती है। तो उस मामले को सुप्रीम कोर्ट सीधे अपने पास बुला कर, उन्हें सुनवाई करने से रोक दे। ऐसा करने से जहां हाईकोर्ट न्यायाधीशों के अधिकारों का हनन हो रहा होता है। वहीं आम आदमी के मौलिक अधिकार भी कहीं ना कहीं प्रभावित हो रहे हैं। इसका भी ध्यान रखना सुप्रीम कोर्ट के लिए जरूरी है।
गोविन्द/13फरवरी/ईएमएस