लेख

क्या भाजपा की दूसरी पीढ़ी भी नाराज है, मोदी से......? (लेखक- ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस)

12/06/2019

भारत के दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दल देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और प्रमुख प्रतिपक्षी दल कांग्रेस अपने अन्र्तद्वन्द से उभर नहीं पा रहे है, देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी जहां अपने हार के सदमें और अंदरूनी टूट से परेशान है, वहीं देश पर राज कर रही भारतीय जनता पार्टी सरकार पर गुजरातियों के वर्चस्व को लेकर परेशान है। पार्टी की पहली पीढ़ी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवानी और डाॅ. मुरली मनोहर जोशी के बाद अब पार्टी की मौजूदा दूसरी पीढ़ी के सदस्य अपनी उपेक्षा से अच्छे-खासे परेशान है, इसी कारण जहां अरूण जेटली तथा सुषमा स्वराज जैसे दूसरी पीढ़ी के नेताओं ने स्वयं सरकार व पार्टी से दूरियां बना ली और स्वयं मंत्री पद की दौड़ से स्वास्थ्य का बहाना कर बाहर हो गए, वहीं मोदी द्वारा हाल में उठाए कुछ अहम् कदमों से भी ये दूसरी पीढ़ी के शीर्ष नेता नाराज बताये जा रहे है। इनकी नाराजी का मुख्य कारण मोदी द्वारा अपने अभिन्न अमित शाह को आवश्यकता से अधिक तवज्जोह देना भी है। यद्यपि इन नेताओं ने अभी खुलकर अपनी नाराजी उजागर नहीं की है, किंतु हाल ही में मोदी द्वारा गठित आठ केबिनेट समितियों में से सिर्फ दो कमेटी में राजनाथ सिंह को शामिल करना और उनके इस्तीफे की कथित धमकी के बाद उन्हें चार केबिनेट समितियों में नामजद करना दूसरी पीढ़ी की नाराजी का सबसे अहम् ताजा उदाहरण है। जबकि मोदी जी ने सभी आठ केबिनेट कमेटियों में श्री अमित शाह को नामजद किया, साथ ही वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन को आठ में से सात कमेटियों का सदस्य मनोनीत किया गया, यहां इसका सीधा अर्थ यह समझा जा रहा है कि प्रतिरक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की वरिष्ठता को दर-किनार करने की कोशिश की गई।
भाजपा की इस दूसरी पीढ़ी को वरिष्ठ नेत्री सुषमा स्वराज की उपेक्षा कर सुषमा जी के अधीनस्थ पूर्व विदेश सचिव सुब्रमण्यम जयशंकर को विदेश मंत्री जैसा अहम् पद सौंपना भी रास नहीं आया, क्योंकि भारतीय राजनीति में यह एक नया प्रयोग है, जिसका सृजन प्रधानमंत्री मोदी ने किया है।
जहां तक राजनाथ सिंह जी का सवाल है, वे भाजपा के वरिष्ठतम नेता है, जो उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व सम्भाल चुके है। 2014 में भाजपा ने जीत का कीर्तिमान राजनाथ सिंह जी के नेतृत्व में ही बनाया था, बाद में मोदी ने अपने अनन्य भक्त व मित्र अमित शाह जी को भाजपाध्यक्ष का पदभार सौंपा था और राजनाथ सिंह जी को तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री परिषद में दूसरा स्थान सौंपा था और राजनाथ सिंह ने भी अपनी जी-जान लगाकर ईमानदारी से अपने दायित्व का निर्वहन किया।
.....किंतु 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणामों के बाद जो भाजपा को कीर्तिमानी विजय प्राप्त हुई, और देश की आर्थिक, बैरोजगारी, किसान दुर्दशा और देश की आंतरिक व बाहरी असुरक्षा को लेकर खुसर-पुसर होने लगी तब मोदी जी ने ‘एक से भले दो’ की तर्ज पर अपने परम् प्रिय शिष्य अमित शाह को अपनी बराबरी के रूतबे पर लाकर खड़ा कर दिया और उनका अघोषित रूतबा प्रधानमंत्री के समकक्ष ही स्थापित कर दिया, वैसे यह अंदरूनी तैयारी लोकसभा चुनाव के पहले से ही चल रही थी और उसी तैयारी के तहत् गुजरात की गांधी नगर सीट से अड़वानी जी की टिकट काट कर अमित शाह को वहां से प्रत्याशी घोषित किया गया और चुनाव परिणामों के बाद वरियता को नजर अंदाज कर उन्हें सरकार में प्रधानमंत्री के बाद दूसरा स्थान दे दिया गया। जबकि स्वयं मोदी भी अपनी केबिनेट के वरिष्ठ सदस्यों से काफी कनिष्ठ राजनेता है।
अब चाहे मोदी जी अमित शाह को अहम् जिम्मेदारियां सौंप कर अपने आपको हल्का महसूस कर रहे हो, किंतु अब यह भी साफ है कि अमित शाह की ‘अग्निपरीक्षा’ का समय शुरू हो गया है। उन्हें गृहमंत्री के रूप में वह सब करना है, जो राजनाथ जी पर नहीं कर पाने के आरोप लगाए गए थे। कुल मिलाकर अब मोदी जी भी अमित शाह को ‘‘कार्यकारी प्रधानमंत्री’’ की जिम्मेदारी सौंप कर बिना किसी चिंता के अपनी विदेश यात्राओं में व्यस्त रह सकते है, अब अमित शाह ‘‘साम, दाम, दण्ड, भेद’’ की नीति अपनाकर ‘‘कार्यकारी’’ की भूमिका को सफल बनाने का प्रयास करेंगे तथा पार्टी की भी अहम् जिम्मेदारी अपने ही पास रखकर संघ-विहिप जैसे नाराज अनुषांगिक संगठनों को प्रसन्न करने का प्रयास करंेगे, फिर वह चाहे कश्मीर से धारा-370 व 35ए हटाने का मामला हो या कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का?
इस प्रकार मोदी-शाह को दूसरी पीढ़ी की नाराजी की चिंता नहीं उन्हें सिर्फ देश की चिंता है।
12जून/ईएमएस