लेख

(विचार मंथन) राजनीति में अपराधीकरण (लेखक-ईएमएस/सिद्वार्थ शंकर)

22/07/2021

राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर सरकार को आईना दिखाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि-हमें नहीं लगता कि अपराधियों को चुनाव लडऩे से रोकने के लिए विधायिका कुछ कदम उठाएगी। अपराधियों को राजनीति में प्रवेश करने और चुनाव के लिए खड़े होने से रोकने के लिए विधायिका के कुछ भी करने की संभावना नहीं है। जस्टिस आरएफ नरीमन और बीआर गवई की पीठ उन राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली एक अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी जो 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास को घोषित करने और प्रचारित करने में विफल रहे। कोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों ने शीर्ष अदालत के 13 फरवरी, 2020 के आदेश की अवहेलना की, जिसमें पार्टियों के लिए अपने उम्मीदवारों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य कर दिया था।
राजनीति में अपराधीकरण रोकने की बातें चाहे कितनी की जाएं, मगर सच यह है कि आज कोई भी पार्टी इसे बची नहीं है। हमारे सभी राजनीतिक दलों ने ऐसी न जाने कितनी शख्सियतों से संबंध मजबूत किए हैं, जिन पर हत्या से लेकर बलात्कार तक के गंभीर मामले दर्ज हैं। हिंदुस्तान की सियासत आज जिस ढर्रे पर चल रही है वह भ्रष्टाचार और अपराध से लबालब है। चुनाव में बढ़ता धनबल, बाहुबल और अपराधीकरण लोकतंत्र को अंदर ही अंदर खा रहा है। जब कानून के निर्माता और रखवाले ही अपराध में सने होंगे तो उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि लोकतंत्र को स्वस्थ रख सकेंगे! पहले तो बिहार और उत्तर प्रदेश को ही आपराधिक राजनीति का गढ़ कहा जाता था लेकिन पिछले दो-तीन दशकों से सभी राज्यों में ऐसी प्रवृत्ति के नेताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। आज नेताओं का उद्देश्य चुनाव जीत कर देश सेवा करना नहीं बल्कि सत्ता हासिल कर हुकूमत करना है।
अब तो ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल स्वयं इस दलदल से नहीं उबरना चाहते तभी तो अधिकतर पार्टियों ने सितंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का विरोध किया था जिसमें कहा गया था कि यदि अदालत विधायिका के किसी सदस्य को दो साल या उससे अधिक की सजा सुनाती है, तो वह अपनी सदस्यता बरकरार नहीं रख सकता। इसी फैसले को बेअसर करने के लिए तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा संसद में विधेयक लाया गया था जो पास नहीं हो सका।
नेताओं और अपराधियों की दिनोंदिन बढ़ती सांठगांठ चिंतित करने वाली है। वैसे सितंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाताओं को नापसंदगी का हक देकर एक ठोस पहल की थी। हालांकि चुनाव सुधार के लिए तारकुंडे समिति, गोस्वामी समिति, वोहरा कमेटी जैसी अनेक समितियों ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी हैं लेकिन निजी हितों के कारण किसी भी दल ने इन्हें लागू करने की जहमत नहीं उठाई। आज जरूरत व्यापक चुनाव सुधार की है जिससे राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को रोका जा सके। इसके लिए पार्टियों को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी।
सिद्वार्थ शंकर, 22 जुलाई, 2021 (ईएमएस)