लेख

(विचार-मंथन) मनोज को जिम्मेदारी (लेखक-सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

07/08/2020

संविधान के अनुच्छेद 370 के जरिए जम्मू-कश्मीर को दिया गया विशेष दर्जा समाप्त करने के ऐतिहासिक फैसले को एक साल पूरा हो गया है। विभिन्न वजहों से देश में यह धारणा बनी हुई थी कि अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया गया तो इस राज्य का भारत में रहना कठिन हो जाएगा। लेकिन बीते एक साल का तजुर्बा बताता है कि इस बीच न तो जम्मू-कश्मीर के अंदर कोई बड़ी उथल-पुथल हुई और न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह कोई बड़ा मुद्दा बना। फिर भी इस फैसले के नफा-नुकसान के आकलन के लिए एक वर्ष का समय पर्याप्त नहीं है। अनुच्छेद 370 का खात्मा बीजेपी की उन वैचारिक प्रस्थापनाओं में था, जिसके प्रति प्रतिबद्धता को उसके अस्तित्व से जोड़कर देखा जाता रहा है। ऐसे में उसके पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन जाने के बाद इस वादे को जमीनी शक्ल दिया जाना स्वाभाविक था। इस बीच कश्मीर का मुद्दा ठीक एक साल बाद फिर चर्चा में आ गया। सरकार ने उपराज्यपाल को बदल दिया और केंद्र सरकार में रेल राज्यमंत्री रहे मनोज सिन्हा को कश्मीर भेजा है। उन्हें उप राज्यपाल बनाने के पीछे की बड़ी वजह सरकार और प्रशासन की आम अवाम तक पहुंच बनाना मानी जा रही है। सियासी व्यक्ति को एलजी के रूप में कमान सौंपकर केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक संवाद भी शुरू करने के प्रयास में है। इसे कश्मीर में एक साल से बंद तमाम राजनीतिक गतिविधियों को बहाल करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि मुर्मू के कार्यकाल में संवाद की कमी के चलते प्रशासन आम लोगों तक पहुंच नहीं बना रहा था। इस बाबत मिले फीडबैक के आधार पर ही केंद्र सरकार ने राजनीतिक व्यक्ति को एक बार फिर प्रदेश की बागडोर सौंपने का फैसला लिया है। सूत्र बताते हैं कि केंद्र सरकार के पास तमाम माध्यमों से यह लगातार फीडबैक पहुंच रहा था कि राज्य प्रशासन आम लोगों की मुश्किलें हल नहीं कर पा रहा है। लोग अधिकारियों से नहीं मिल पा रहे हैं। अफसर उनकी बातों को तवज्जो नहीं दे रहे हैं। अब भी लोग अपनी मुश्किलें लेकर नेताओं खासकर पूर्व मंत्री और पूर्व विधायकों के पास पहुंच रहे हैं। इन नुमाइंदों की ओर से दरबार तक लगाया जा रहा है। मनोज सिन्हा को लोगों को साथ लेकर चलने में महारत है। छात्र राजनीति से लेकर सांसद बनने के सफर तक उन्होंने लोगों को साथ लिया। वे हर वक्त लोगों के बीच रहकर कार्य करते रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वास पात्र माने जाने वाले सिन्हा की नियुक्ति इन्हीं सब खूबियों की वजह से की गई बताई जा रही है। नए उपराज्यपाल के समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती जम्मू-कश्मीर की अवाम खासकर कश्मीरियों को अपनाना तथा उन तक पहुंच बनाना होगी। घाटी में राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सुरक्षा मुहैया कराना तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रखने के लिए सुरक्षित माहौल बनाना भी चुनौती होगी। इसके साथ ही प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करना, विकास कार्यों को गति देना, भ्रष्टाचार को खत्म करना, बेरोजगारी की समस्या का प्रभावी हल निकालने में भी कौशल दिखानी होगी।
07अगस्त/ईएमएस