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(भोपाल विधानसभा चुनाव - 2018 विशेष) भोपाल में कमल की शान बनाये रखने की चुनौती

22/10/2018

भोपाल (ईएमएस)। तालों में ताल भोपाल ताल, इसका पानी भी मौसम की बेरुखी के साथ काम ज्यादा होता रहता है कुछ ऐसा ही सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के साथ भी हर चुनाव में होता रहता है। सात विधानसभा सीट वाले भोपाल जिले में फ़िलहाल छह सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा है एक उत्तर सीट पर कांग्रेस विधायक लम्बे समय से कब्ज़ा बनाये हुए हैं उनका तोड़ भाजपा अभी तक नहीं खोज पायी है। इस चुनाव में भाजपा की पूरी कोशिश होगी कि सातों सीटों पर वो जीत का परचम फहराए।
बैरसिया :
प्रदेश की बैरसिया विधानसभा सीट भोपाल जिले में आती है। यहां पर कुल 2 लाख 14 हजार 135 मतदाता हैं। यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। वर्तमान में इस सीट पर बीजेपी का कब्जा है।बीजेपी के विष्णु खत्री यहां के विधायक हैं। यह सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है। बीते तीन चुनावों में यहां पर बीजेपी ने जीत हासिल की है। विधानसभा के अस्तित्व में आने के बाद से सिर्फ दो बार ही कांग्रेस यहां पर का जीत स्वाद चख पाई है। कांग्रेस को ये दो जीत साल 1957 और 1998 में मिली।यहां पर 50 हजार से अधिक गुर्जर समाज के वोटर हैं। इसके अलावा अनुसूचित जाति की संख्या भी अच्छी खासी है। 2013 के चुनाव में विष्णु खत्री ने कांग्रेस के महेश रत्नाकर को 29 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था। वहीं 2008 के चुनाव में भी इस सीट पर बीजेपी ने जीत हासिल की और ब्राह्मण रत्नाकर ने कांग्रेस के हीरालाल को 23 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था।राजधानी भोपाल से यह इलाका ज्यादा दूर नहीं इसके बावजूद यह क्षेत्र विकास के मामले में पिछड़ा हुआ है। इसके अलावा इस इलाके में शिक्षा की भी समस्या है। यहां के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते हैं। यहां के अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी होने के कारण मरीजों को इलाज नहीं मिल पाता है। इसके अलावा यहां पर बेरोजगारी की भी समस्या है। यहां के युवा रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाने को मजबूर हैं।
भोपाल उत्तर :
देश की भोपाल उत्तर विधानसभा सीट भोपाल जिले के अंतर्गत आनी वाली 7 सीटों में से एक है। यह सीट कांग्रेस का गढ़ है। भोपाल उत्तर मुस्लिम बाहुल्य इलाका है। इस सीट पर कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी को कम जीत मिली है।मुस्लिम बाहुल्य इलाका होने के नाते यहां से हर दल मुस्लिम प्रत्याशी को ही चुनाव में उतारता है। यह सीट किसी जमाने में कम्युनिस्टों का गढ़ हुआ करती थी। 1957, 1962, 1967 और 1972 में यह भोपाल सीट हुआ करती थी।भोपाल उत्तर सीट 1977 में असतित्व में आई। 1977 में पहली बार इस सीट पर चुनाव हुआ और जनता पार्टी के हामिद कुर जीते। इस सीट पर 4 बार सीपीआई के शाकिर अली ने जीत हासिल की।इसके बाद 1980 में कांग्रेस के रसूल अहमद चुनाव जीते। वह 1985 का चुनाव भी जीते। 1990 में हुए चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 1990 में निर्दलीय उम्मीदवार आरिफ अकील को जीत मिली। इस सीट पर बीजेपी का खाता साल 1993 में खुला।1998 से लेकर 2013 तक आरिफ अकील विधायक रहे। आरिफ अकील बीजेपी और मोदी लहर में भी चुनाव जीते। आरिफ अकील दिग्विजय सिंह सरकार में गैस राहत मंत्री भी रहे चुके हैं।2013 के चुनाव में कांग्रेस के आरिफ अकील ने बीजेपी के आरिफ बैग को 6 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। आरिफ अकील को जहां 73070 वोट मिले थे तो वहीं आरिफ बैग को 66406 वोट मिले थे।2008 के चुनाव में भी कांग्रेस के आरिफ अकील को जीत मिली थी। उन्होंने बीजेपी के आलोक शर्मा को हराया था। आरिफ अकील को 58267 वोट मिले थे, तो वहीं आलोक शर्मा को 54241 वोट मिले थे।इस इलाके की जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। यह इलाका भोपाल का सबसे पिछड़े इलाके में से एक है। विकास के मामले में भी ये क्षेत्र पिछड़ा हुआ है।
नरेला :
प्रदेश की नरेला विधानसभा सीट भोपाल जिले के अंतर्गत आती है। यह सीट साल 2008 में अस्तित्व में आई। वर्तमान में इस सीट पर बीजेपी का कब्जा है। बीजेपी के विश्वास सारंग यहां के विधायक हैं।उन्होंने 2013 के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार सुनील सूद को 26 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था। सारंग शिवराज सरकार में राज्यमंत्री हैं। इससे पहले 2008 के चुनाव में भी यहां पर बीजेपी को ही जीत मिली थी।तब भी विश्वास सारंग ने कांग्रेस की ही सुनील सूद को हराया था। हालांकि इस बार उन्होंने सुनील सूद को कम वोटों से हराया था। सारंग को 57075 वोट मिले थे तो वहीं सुनील सूद को 53802 वोट मिले थे।
दावा किया जा रहा है नरेला में सारंग ने विकास के कई काम किए हैं। उन्होंने यहां पर कई फ्लाईओवर बनवाए हैं। बता दें कि सारंग खुद सिविल इंजीनियर हैं। इस बार इस सीट पर आम आदमी पार्टी ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है। 'आप' ने रिहान जाफरी को टिकट दिया है।ऐसे में इस बार बीजेपी का मुकाबला सिर्फ कांग्रेस से ही नहीं आम आदमी पार्टी से भी है। इस इलाके में ब्राह्मण, मुस्लिम, कायस्थ वोटर्स की संख्या अच्छी खासी है। यही लोग चुनाव में किसी भी उम्मीदवार की जीत में अहम भूमिका निभाते हैं।
भोपाल दक्षिण पश्चिम:
राजधानी भोपाल की दक्षिण पश्चिम सीट मध्यप्रदेश का वो विधानसभा क्षेत्र रहा है जो हाईप्रोफाइल सीटों में से एक है। शिवराज कैबिनेट में कद्दावर मंत्री उमाशंकर गुप्ता बीते 15 सालों से यहां चुनाव जीत रहे हैं। इस सीट पर अधिकांश समय बीजेपी का ही कब्जा रहा है। परिसीमन से पहले 1998 में कांग्रेस के पीसी शर्मा ने यहां कांग्रेस का झंडा लहराया था लेकिन उसके बाद से सीट पर कमल ही खिला है। जनता ने उमाशंकर गुप्ता पर भरोसा जताया लेकिन हमेशा महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री रहने के बाद भी गुप्ता ने क्षेत्र के विकास की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। भोपाल की दक्षिण पश्चिम सीट में पानी, झुग्गी बस्तियां और बढ़ता क्राइम एक बड़ी समस्या बन चुका है। राजधानी भोपाल में आने वाली इस विधानसभा के मांडवा बस्ती में रहने वाले लोगों की ये हालात हैकि आज भी उन्हें पानी जैसी मूलभूत समस्या के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है।गुप्ता के लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतने के कारण इस सीट को लेकर यह परसेप्शन बन गया है। लेकिन, सरकार के बड़े साहबों की अधिकता वाला यह क्षेत्र कभी भी अपना मूड बदल सकता है। दक्षिण पश्चिम विधानसभा सीट परिसीमन से पहले दक्षिण पश्चिम सीट एशिया की सबसे बड़ी विधानसभा सीट थी। परिसीमन के बाद दक्षिण पश्चिम सीट को तीन हिस्सों में बांटा गया। यहां सबसे बड़ा एरिया स्लम बस्तियों का है, जहां रहने वाले लोग ही चुनाव में प्रत्याशियों की जीत-हार का फैसला करते हैं। इस सीट पर जाति समीकरण भी बेहद दिलचस्प है।
2 लाख 85 हजार मतदाता वाली भोपाल दक्षिण पश्चिम विधानसभा में चार इमली और 74 बंगले जैसे इलाके आते हैं। ये वो इलाके हैं जहां सरकार के सबसे बड़े अफसर यानी आईएएस औऱ आईपीएस रहते हैं। इनके अलावा विधानसभा क्षेत्र का अधिकांश मतदाता झुग्गी बस्ती औऱ कर्मचारी वर्गों का है। सीट पर जाति समीकरण की बात करें तो इलाके में 25 से 30 हजार कायस्थ, 35 हजार ब्राह्मण और 30 हजार के करीब मुस्लिम आबादी हैं। 2013 के चुनाव में उमाशंकर गुप्ता भाजपा ने कांग्रेस के संजीव सक्सेना को 18198 वोटों से मात दी थी वहीँ 2008 के चुनाव में भी उमाशंकर गुप्ता ने बसपा से चुनाव लडे संजीव सक्सेना को 26002 वोटों से हराया था।
गोविंदपुरा विधानसभा :
भोपाल जिले में आने वाली इस सीट का जब भी नाम लिया जाता है तो एक ही चेहरा सामने आता है। वे है 88 साल के बाबूलाल गौर, जो पिछले 44 सालों से गोविंदपुरा विधानसभा सीट से विधायक हैं। प्रदेश में मुख्यमंत्री बदले लेकिन 1974 के बाद से गोविंदपुरा का विधायक नहीं बदला। बावजूद इसके विकास के मामले में गोविंदपुरा का नंबर भोपाल की सभी शहरी विधानसभा क्षेत्र में आखिरी पायदान पर आता है। आलम ये है कि आज भी यहां सड़क, स्वास्थ्य, बिजली और पानी जैसे मुद्दों पर ही चुनाव लड़े जाते हैं। गौर पर भरोसा ऐसा कि तीन-चार बार नहीं बल्कि एक ही सीट से लगातार 10 बार विधायक बनाकर अनूठा रिकॉर्ड बना दिया। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस यहां बाबूलाल के सामने आज तक कोई ऐसा मजबूत उम्मीदवार खड़ा नहीं कर पाई, जो उन्हें चुनौती दे सके।
गोविंदपुरा के सियासी इतिहास की बात की जाए तो बाबूलाल गौर यहां पहली बार 1974 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे थे और तीर-कमान चुनाव चिन्ह से चुनाव लड़कर पहली बार में ही जीत हासिल की। इसके बाद 1998 के चुनाव में बाबूलाल गौर ने कांग्रेस के करनैल सिंह को हराया। 2003 में उन्होंने कांग्रेस के शिवकुमार उरमलिया को शिकस्त दी। वहीं 2008 के चुनाव में बाबूलाल गौर ने कांग्रेस की विभा पटेल को हराकर विधानसभा पहुंचे। 2013 में गौर फिर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े। इस बार उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी गोविंद गोयल को हराया। इस चुनाव में बीजेपी को जहां 1 लाख 16 हजार 586 वोट मिले। वहीं कांग्रेस महज 45 हजार 942 वोट ले सकी। जीत का अंतर 70 हजार 644 रहा।
हुजूर विधानसभा :
राजधानी भोपाल की हुजूर विधानसभा सीट। यह सीट बीजेपी का अभेद्य किला है। परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर बीजेपी का ही कब्जा है और रामेश्वर शर्मा यहां से विधायक हैं। हुजूर विधानसभा सीट सबसे बिखरे इलाकों में से एक रही है और 45 किलोमीटर के दायरे में फैले इस विधानसभा क्षेत्र को मुख्य रुप से तीन हिस्सों में बांटा गया है और तीनों ही इलाकों की अलग-अलग समस्याएं हैं। 3 लाख से ज्यादा मतदाता वाली इस विधानसभा में सबसे बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाके में आता है, जिसमें 50 से ज्यादा पंचायतें शामिल हैं। इन पंचायतों में रहने वाले किसानों की सबसे बड़ी समस्या कैचमेंट की है। किसानों की जमीन कैचमेंट में आने की वजह से वो नाराज हैं। वहीं फसलों के उचित दाम नहीं मिलने और भावांतर के नाम पर हो रहे धोखे को लेकर भी नाराजगी है।
हुजूर में अगर अब तक बीजेपी अजेय बनी हई है तो इसकी बहुत बड़ी वजह यहां कांग्रेस का कमजोर होना भी है।
हुजूर के सियासी इतिहास की बात की जाए तो कभी ये इलाका गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। 1967 में अस्तित्व में आई गोविंदपुरा सीट से पहली बार कांग्रेस नेता के एन प्रधान विधायक चुने गए। इसके बाद 1972 में जनता ने कांग्रेस प्रत्याशी मोहन लाल अस्थाना को अपना विधायक चुना। लेकिन समय के साथ सीट से कांग्रेस की जमीन खिसकने लगी। 1977 में जनता पार्टी के लक्ष्मी नारायण शर्मा और 1980 में बीजेपी के बाबूलाल गौर ने यहां से चुनाव जीता। 1980 के बाद इस सीट पर लगातार बाबूलाल गौर चुनाव जीतते आ रहे हैं। हालांकि 2008 में परिसीमन के बाद गोविंदपुरा सीट को बांट कर हुजूर विधानसभा सीट बनाई गई। और इस बार बीजेपी के टिकट पर जीतेंद्र दागा यहां से चुनाव जीते। इसके बाद 2013 में रामेश्वर शर्मा को बीजेपी ने टिकट दिया और उन्होंने कांग्रेस के राजेंद्र मंडलोई को 59 हजार से अधिक वोटों से शिकस्त दी।
भोपाल मध्य :
राजधानी भोपाल की मध्य विधानसभा सीट। यहाँ पर पिछले चुनाव में भाजपा के सुरेंद्र नाथ सिंह ने चुनाव जीता था उन्होंने कांग्रेस के आरिफ मसूद को 6981 वोटों से हराया था इससपहले २००८ चुनाव भाजपा के ध्रुवनारायण सिंह जीते थे लेकिन शैला मसूद हत्याकांड में उनका नाम आने के बाद भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया था। उन्होंने कांग्रेस के नासिर इस्लाम को 2519 मतों से शिकस्त दी थी। इस सीट पर जीत का प्रतिशत बेहद काम रहा है यहाँ कांग्रेस ने भाजपा को हमेशा कड़ी टक्कर दी है इस बार कांग्रेस अच्छा चेहरा उतारती है तो भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है।