लेख

बच्चों का आदर्श: मलाला यूसुफ़ज़ई (लेखिका- डा. नाज़परवीन / ईएमएस)

11/07/2020


’एक बच्चा, एक शिक्षक, एक किताब और एक पेन पूरी दुनिया को बदलने की ताकत रखते हैं’।
’मलाला यूसुफ़ज़ई’
लड़कियों के लिए अनिवार्य शिक्षा, बालविवाह का विरोध करने वाली छोटी सी बच्ची विश्व शान्ति की हिमायती बनी। महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलाने की प्रबल दावेदार मलाला यूसुफ़ज़ई आज वैश्विक परिदृश्य में आधी आबादी का आदर्श है। जिस उम्र में बच्चें अपनी कल्पना की दुनिया के घरौंदे बनाते हैं। मलाला अपनी सरजमीं में शिक्षा के पौधे रोपित कर रही थी। वो भी उस तालिबानी खौफ़ के नाक के नीचें जहां लड़कियों को उंची आवाज में बोलने की भी इज़ाजत नहीं थी। अहिंसा के विचारों से प्रेरित मलाला अपने नन्हें हाथों से बच्चों को कलम थमाने की मुहीम में लगी थी। जिसके चलते उसे और उसके परिवार को स्वात घाटी छोडकर पेशावर में आकर बसना पडा। मलाला न केवल मुस्लिम समाज का चमकता चांद बनकर उभरी, अपितु दुनिया की आधी आबादी के लिए एक मिशाल बनी।
नन्ही बहादुर मलाला को कई अंतरराष्ट्रीय बाल शान्ति पुरस्कार, पाकिस्तान का राष्टृीय युवा शान्ति पुरस्कार, यूरोपीय यूनियन का प्रतिष्ठित शैखरोव मानवाधिकार पुरस्कार, मैक्सिको का समानता पुरस्कार, संयुक्त राष्टृ का 2013 मानवाधिकार सम्मान दिया गया। वर्ष 2014 में शान्ति का सर्वोच्च सम्मान नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली सबसे कम उम्र की विजेता बनी। नोबेल पुरस्कार लेते समय अपनी स्पीच में मलाला ने अपने पिता को घन्यवाद दिया और कहा कि उन्होंने मेरी उड़ान को रोकने की कोशिश नहीं की। मेरे पंखों को काटा नहीं मुझे उड़ने दिया.....।
अकसर समाज में महिलाऐं दबाव-तनाव, डर या खौफ के कारण जीवन जीने के तरीके में बदलाव कर देतीं हैं। छोटी-मोटी समस्याओं में उलझकर अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ देती हैं। चंद लोगों की छींटा कसीं से अपने सपनों को जीना छोड़ देती हैं। ऐसी समाज व्यवस्था में मलाला यूसुफ़जई एक नज़ीर पेश करती हैं। जिसने तालिबान जैसे खूंखार आतंकवादी संगठन के आगे भी अपने हौसले बुलन्द रखे। अपना सपना नहीं छोडा। कभी हार नहीं मानी। वही तालिबान जिसने विश्व के चैधरी अमेरिका पर हमला कर दुनिया को अपनी नीतियों में बदलाव करने के लिए मजबूर कर दिया था। जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी मलाला का कहना था, कि ’मै शिक्षा प्राप्त करूंगी चाहे घर में, स्कूल में या कहीं और..।
मलाला युसुफ़जई का जन्म 12 जुलाई 1997 को पाकिस्तान के खै़बर-पख्तूनख़्वा प्रान्त के स्वात जिले में जियाउददीन युसुफ़जई और तोर पेकई के घर हुआ। समाज चिन्तक जियाउददीन शिक्षा के प्रति बेहद संवेदनशील थे। इसलिए बचपन से ही कददरपंथियों की विचारधारा से लड़नें के लिए अपनी बेटी को कलम थमा बैठे। जो तालिबान को हरगिज बर्दाश्त नहीं था। इसलिए मलाला को महिलाओं की शिक्षा की मांग करने के कारण तालिबान के आतंकवादियों की गोली का शिकार बनना पडा। इस छोटी सी बच्ची ने बड़ी बहादुरी से सामना किया। इनकी बहादुरी के कारण ही संयुक्त राष्टृ ने मलाला के 16 वे जन्मदिन के अवसर पर 12 जुलाई को मलाला दिवस मनाने की घोषणा की।
मलाला के पिता स्वयं एक समाजसेवी रहे हैं और आज भी सेवा में लगे हुए हैं। जिससे मलाला को बचपन से शिक्षा और समाजसेवा से जुड़ाव बना रहा। मलाला ने बालपन से ही कई संस्थाओं के साथ सक्रिय भागीदारी करना शुरू कर दिया था। यह उसकी लाइफस्टाइल बन चुका था। जिसके कारण आतंकवादियों की टाॅप लिस्ट में शामिल हो गयी। मलाला ने अपने विचारों को बचपन से आकार देना शुरू कर दिया था। उसने अपने एक बदले हुए नाम ’गुल मकई’ के माध्यम से बीबीसी के लिए ब्लाॅक लिखा। जिसमें स्वात के तालिबानियों के कारनामों का जिक्र किया। यह पहला मौका था जब मलाला दुनिया की नज़र में आयी। उनके पिता ने दुनिया के सामने अपनी बेटी की पहचान उजागर की।
मलाला की बहादुरी से प्रभावित होकर एक पुरस्कार वितरण समारोह में दक्षिण अफ्रीका के नोबेल पुरस्कार विजेता डेसमंड टूटू ने कहा था, कि ’ मलाला ने अपने तथा अन्य लड़कियों के लिए खडे़ होने की हिम्मत दिखाई है और दुनिया को यह बताने के लिए कि लड़कियों को भी स्कूल जाने का अधिकार है, राष्टृीय एवं अंतराष्टृीय मीडिया का इस्तेमाल किया है।’
सन् 2007 से 2009 तक स्वात घाटी के लिए वह मुश्किल दौर था। जब तालिबान ने उसपर कब्जा कर रखा था, जिससे लडकियों का स्कूल जाना बंद हो गया था। मलाला जब कक्षा 8वीं में पढ़ती थी। उसने लडकियों के स्कूल में रोक लगाने का विरोध किया। केवल 11 वर्ष की आयु में अपने पिता के संरक्षण में नेशनल प्रेस के सामने मलाला ने तालिबान के खिलाफ अपना भाषण दिया जिसका शीर्षक था- ’हाउ डेयर द तालिबान टेक अवे माय बेसिक राइट टू एजूकेशन’। तालिबान के खूंखार आतंकवादियों के नज़रों में मलाला खटकने लगी। इस छोटी सी बच्ची का आतंकियों पर खौफ ऐसा कि 9 अक्टूबर 2012 को आतंकवादियों ने मलाला पर हमला कर दिया। आतंकवादियों ने मलाला के सिर पर गोली मारी। जिससे मलाला गम्भीर रूप से घायल हो गयी। मलाला को इलाज के लिए ब्रिटेन लाया गया। ब्रिटेन के क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल में इसका इलाज हुआ।
इस नन्हीं सी बच्ची के लिए दुनियाभर से दुआओं के हाथ उठे। उस वक्त शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति रहा हो जिसने मलाला की सलामती की दुआ न की हो। मलाला की जान बच गई। दुनियाभर में मलाला की बहादुरी की चर्चाऐं हुई। मलाला के हौसले उन खूंखार आतंकवादियों की गोलियां कमजोर नहीं कर पाए। उसने अपनी हौसले की उड़ान जारी रखी।
नःसंदेह कलम देर सवेर ही सही बन्दूक से ज्यादा शक्तिशाली साबित हो ही जाती है। दुनिया के शान्तिदूतों ने यह साबित किया है कि हिंसा किसी समस्या का हल नहीं बन सकती। अहिंसा से विश्व विजय किया जा सकता है। हिंसा से किसी का दिल भी नहीं जीता जा सकता। मलाला का मानना है कि बंदूक में कोई शक्ति नहीं। वह कहती है कि डर से शाक्तिशाली वह स्वयं है। मलाला वैश्विक समस्या का हल शिक्षा में ढूंढती हैं। बच्चों के अधिकारों की उनकी यह जंग आज भी जारी है........।
11जुलाई/ईएमएस