लेख

(विचार मंथन) केजरीवाल की चुनौती (लेखक-सिद्वार्थ शंकर/ईएमएस)

14/02/2020


दिल्ली की जनता ने एक बार फिर से सत्ता आम आदमी पार्टी यानी "आप" को सौंप कर उसके कामकाज और उपलब्धियों पर मुहर लगा दी है। "आप" को इस बार भी साठ से ज्यादा सीटें मिली हैं। पिछली बार 67 सीटें थीं। अहम यह है कि पार्टी लगातार जोरदार बहुमत और लोगों का भरोसा लेकर तीसरी बार सत्ता में आई है। यह इस बात का प्रमाण है कि इस सरकार ने पिछले पांच साल में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली-पानी जैसी बुनियादी जरूरतों से जुड़े जो काम किए, वे जनता को रास आए। इसके अलावा, दिल्ली परिवहन निगम की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा जैसे कदमों ने भी चमत्कार दिखाया। बिजली-पानी के बिलों में कटौती से लोग खुश हैं ही। आम आदमी पार्टी की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आठ महीने पहले हुए लोकसभा में उसे दिल्ली की सभी सातों सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा था। तभी से इस तरह के कयास शुरू हो गए थे कि इस बार पार्टी को पहले जैसी जीत मिलना आसान नहीं होगा और दिल्ली की सत्ता में बदलाव हो सकता है। लेकिन "आप" के कामों ने इस तरह के सारे गणित और आकलनों को गलत साबित कर डाला।
दिल्ली का यह चुनाव मुख्य रूप से आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच था। लेकिन लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीतने वाली भाजपा की उम्मीदें दिल्ली में सरकार बनाने को लेकर एक बार फिर ध्वस्त हो गईं। जाहिर है, भाजपा के लिए इससे ज्यादा निराशाजनक क्षण नहीं होगा। महाराष्ट्र, झारखंड का सदमा पहले से ही था। दिल्ली की सत्ता के लिए इस बार भी भाजपा ने जिस तरह से ताकत झोंकी, घर-घर पार्टी कार्यकर्ताओं ने पहुंच बनाई, प्रचार-प्रसार के लिए आईटी सेल से लेकर चुनावी सभाओं तक में भाजपा ने आम आदमी पार्टी को पीछे छोड़ दिया था। इससे यह संकेत देने की कोशिश की गई कि भाजपा के साथ पूरा सत्ता तंत्र है, ऐसे में उसे इस बार हराना आसान नहीं होगा। लेकिन नतीजों ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों, विश्लेषकों, रणनीतिकारों के सारे आकलन गलत साबित कर डाले। इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, पार्टी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित कई दिग्गजों की सभाएं भी मतदाताओं का मन क्यों नहीं बदल पाईं? आखिर क्यों नहीं लोगों ने भाजपा या कांग्रेस को चुना?
हालांकि दिल्ली विधानसभा का चुनाव ऐसे माहौल में हुआ है जब देश में नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी जैसे मुद्दों पर आंदोलन हो रहे हैं। दिल्ली के शाहीनबाग में दो महीने से धरना जारी है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया की हिंसक घटनाओं, 'टुकड़े-टुकड़े गैंगÓ जैसे दुष्प्रचार से भी मतदाता विचलित हुए। रही-सही कसर चुनावी भाषणों में मुसलिम समुदाय को लेकर उगले गए जहर ने पूरी कर दी। इससे दिल्ली की जनता में गलत और नकारात्मक संदेश ही गया। जहां तक सवाल है कांग्रेस का, तो देश में सबसे ज्यादा राज करने वाली इस पार्टी ने भी लोगों को हताश ही किया। भले चार राज्यों में कांग्रेस की सरकार हो, पर दिल्ली की जनता का उससे मोहभंग हो चुका है। दिल्ली विधानसभा में इस बार भी मजबूत विपक्ष का अभाव रहेगा। आम आदमी पार्टी की सरकार के पास बहुमत भले हो, लेकिन उसकी मुश्किलें कम नहीं होने वाली। केंद्र और उपराज्यपाल के साथ जिस तरह का टकराव देखने को मिलता रहा है और कई बार सरकार लाचार स्थिति में आ जाती है, उससे कामकाज प्रभावित होता है। ऐसे में केंद्र के साथ तालमेल बना कर चलना अरविंद केजरीवाल के लिए बड़ी चुनौती होगी।
अरविंद केजरीवाल एक ऐसा नाम है जो अन्ना आंदोलन से निकला हुआ चेहरा है। जो एक आप पार्टी का गठन करके दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 लडऩे की घोषणा करते है। उस समय तक न तो भाजपा और न ही दिल्ली की सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी को उम्मीद रही होगी कि एक दिन यह केजरीवाल नामक व्यक्ति राजनीति में ऐसा छाप छोड़ेगा कि कई दिग्गजों का होश उड़ा देगा। खैर, फिर 5 साल बाद अरविंद केजरीवाल का जादू लोगों के सर चढ़कर बोला है तो उसमें कई वजहें है- जैसे एक जमाने में रोटी, कपड़ा, मकान का लोगों के जीवन में प्रधानता रही, तो आज उसकी जगह बिजली, पानी और परिवहन व्यवस्था ने ले ली है तो कहना गलत नहीं होगा। कारण आज तेजी से बढ़ रहे मध्यमवर्गीय के पास रोटी, कपड़ा तथा मकान की वैसी समस्या नहीं रही जो 30 साल पहले तक रही। अब इसी मध्यमवर्गीय लोगों के पास बिजली महंगी होने, पानी की समस्या, और परिवहन व्यवस्था एक चुनौती बनती गई है। इसी पर अरविंद केजरीवाल ने सधी चाल चली तो विपक्षी पार्टियों के पास विरोध करने के लिए मुद्दे का लगातार अभाव होता गया। जिसका सीधा-सीधा फायदा उठाने में केजरीवाल 20 साबित हुए है।
अब जबकि अरविंद केजरीवाल सत्ता में आ ही गए हंै तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी, यह बहुत महत्वपूर्ण है। हालांकि अरविंद केजरीवाल को जिस तरह से दिल्ली वालों ने अपना बेटा मानते हुए सत्ता की चाबी थमाई है उससे उनसे अपेक्षाएं भी बढ़ गई है। अरविंद केजरीवाल को फिर से जनता की वहीं अपेक्षा बिजली,पानी और परिवहन व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करना होगा। उन्हें अपने उस वायदे को पूरे करने होंगे कि बिजली-पानी और महिलाओं के मुफ्त बस यात्रा को अगले 5 साल तक जारी रखना होगा। जैसा कि भाजपा ने जनता को यह समझाने की नाकाम कोशिश की यह जितनी भी योजनाएं है उसे अरविंद केजरीवाल अगले मार्च तक ही लागू करेगी।
दूसरा केजरीवाल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रहेगी कि दिल्ली के बिगड़ते माहौल को सोहार्दपूर्ण वातावरण में तब्दील करना। खास करके शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन अब खत्म होंगे या नहीं, यह बहुत बड़ा सवाल होगा। अब दिल्ली वालों के जेहन में यह भी सवाल रहेगा कि केजरीवाल बुजुर्गों और युवाओं के लिये रियायत की कब घोषणा करते है। साथ ही प्रदूषण-दिल्ली की बहुत बड़ी समस्या है जिसको हल करना केजरीवाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगी। इसके अलावा यमुना सफाई की उनकी महात्वाकांक्षी योजना पर वे कैसे आगे बढ़ेंगे यह देखना दिलचस्प होगा।
सिद्वार्थ शंकर/ईएमएस/14 फरवरी2020