लेख

अमानवीयता की पराकाष्ठा (लेखक--डॉक्टर अरविन्द जैन)

06/12/2018

आदमी का मनुष्य बनना बहुत कठिन हैं और मनुष्य से मानव बनना और भी कठिन हैं। पर मानव से दानव बनना और भी सरल हैं ,जैसे साक्षर का विपरीत राक्षस होता हैं।कभी कभी जो वर्तमान में घटनाएं घटित हो रही हैं वे विपरीत दिशाओं की हैं ,एक जगह मानवीय मूल्यों की बात की जाती हैं तो दूसरी तरफ दानवीय कृत्य /अमानवीय घटनाएं इतनी अधिक मात्रा में हो रही हैं की मानवीयता को घुटन होने लगी हैं।पापोँ का प्रचलन बहुत अधिक हैं जैसे हिंसा ,झूठ चोरी कुशील परिग्रह और इसके साथ क्रोध मान ,माया और लोभ।पूरा जीवन चक्र इन्ही घटनाओं से चल रहा हैं।वैसे ये नयी विषय वस्तुएं नहीं हैं।ये अनादिकाल से चल रहा हैं और चलेगा ,ये सब बातें व्यक्तिगत के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय होती हैं।और जब ये बहुतायत से होती हैं तब अधिक चिंतनीय और सोचनीय होने लगी हैं।
हमारे संचार /सूचना के माध्यम इनसे भरे पड़े रहते हैं और उनके द्वारा जो समाचार दिए जाते हैं उनसे समझ में आता हैं की अब अनैतिकता ,अपराध का कितना अधिक प्रचलन बढ़ गया हैं।लगता नहीं हैं की हम सभ्य समाज में रह रहे/जी रहे हैं या मानसिक दिवालियापन के कारण अमानुष होकर इतिहास के पूर्व, पाषाण काल में रह रहे हैं।जी हाँ जब हम अपने खून /संतान को सुरक्षा नहीं दे सकने में समर्थ हैं या हो चुके तब उनको या उनके परिवार को किस श्रेणी में रखे ?
अभी एक आठवीं की पढ़ने वाली लड़की स्कूल से लौटते समय घर के नजदीक दो दिन एक खाली मकान में भूखी लाँघी छुपी रही।पुलिस और परिवार जन ढूढते रहे।मिलने पर जो परिस्थियाँ ब्यान की गयी वे अत्यंत हैरान करने वाली।बच्ची को न परिवार वाले रखने को तैयार हैं और ननिहाल कहता हैं की वे माँ या बच्ची में से किसी एक को रखने को तैयार हैं ! परिवार में दिन रात की कलह के कारण उस अबोध बालिका किस मानसिक पीड़ा से जूझकर इस प्रकार का कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा।ईश्वर की कृपा से किसी बदनीयती की निगाह नहीं पडी अन्यथा वह न घर की रहती और न घाट की !
पत्नी द्वारा अपने प्रेमी और दोस्त के सहयोग से अपने पति की हत्या करना ,पुत्र/पुत्री द्वारा धन के लालच में माँ बाप को निराश्रित आश्रम में छोड़ आना ,पुत्री द्वारा पिता की मृत्यु के समय न जाना और पडोसी से कहना आप उनकी अंतिम क्रिया की वीडियो भेज देना और और उनकी अस्थियों को कोरियर से भेज देना ,माँ पिता को बंद कोठरी में बंद करके रखना आदि आदि अनेकों घटनाये पढ़ने /देखने मिलती तब लगता है की हम सुशिक्षित समाज में रह रहे हैं या असभ्य समाज में।
इसका कितना मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया हैं और जाता हैं पर फल निर्थक रहते हैं।यह समस्या से अपढ़ के अलावा पढ़े लिखे और उच्च वर्ग ,श्रेष्ठि वर्ग तक अछूता नहीं हैं।विवाद का स्थान सर्वव्यापी हैं चाहे आज विश्व के सबसे धनवान भी इन्ही पीड़ाओं से जूझ रहे हैं.और गरीब के यहाँ होना कोई नयी बात नहीं हैं।
इसका अर्थ यह हुआ की ये समस्याएं व्यक्ति /परिवार प्रधान अधिक होती हैं।आज सहनशक्ति नहीं रही ,अहंवाद का स्थान बहुत हैं। अर्थ को अधिक प्राथमिकता देना इसका एक पहलु यह हैं की किसी का भी समय एक सा नहीं होता हैं।आज कोई जीव गरीब ,निराशा ,हताशा में जी रहा हैं उसका जब पुण्य का उदय होगा तब वह उन सबको परुषार्थ कर उनका हितकारी होगा।किसी भी व्यक्ति को कभी तुच्छ मत समझो। होता यह हैं जब कोई व्यक्ति बीमार ,बेरोजगार हो जाता हैं तब वह परिवार के लिए भारयुक्त हो जाता हैं तब उसे सब तिरस्कार करने लगते हैं।चाहे बेटा हो या बेटी पत्नी हो या भाई नाती हो या पोते।पर उस समय हमें बहुत उदारता की जरुरत रखनी चाहिए।पर उतावली में लिया गया निर्णय बहुत हानिकारक होता हैं।उस बिटिया की मनोदशा एक दिन में नहीं हुई होगी।लगातार प्रतारणा के कारण उसने इतना बड़ा कदम उठाया।इस समय उस बिटिया को बहुत मानसिक सहारा की जरुरत हैं। एक बात हमेशा याद रखना चाहिए जिसने जन्म लिया हैं उसका भरण पोषण करने वाला दूसरा ही होता हैं आप और हम एक निमित्त मात्र हैं।जब आप अपने खून या निकट के साथी नहीं होंगे तब आपका कौन होगा ,इतिहास की हमेशा पुर्नावृत्ति होती हैं।आज दादा दादी या नाना नानी को भार हो गयी कल उनका भी बुढ़ापा में उनको भी आश्रित होना पड़ेगा ,तब जो बोया होगा वही काटना पड़ेगा।
यह संसार क्षणिक और अस्थायी हैं और मानव जीवन में जितना जिसका उपकार करो उतना लाभदायक जबकि अपनी संतानों के प्रति इस प्रकार का भाव कितना चिंतनीय हैं।और अन्य कारणों से जो हत्याएं हो रही हैं उनमे चारित्रिक।नैतिक गिरावट का कारण हैं।आज सेक्स के कारण अधिकता से हत्याएं हो रही हैं।सेक्स अब एक संक्रामक रोग हो गया हैं और इससे अब कोई अछूता नहीं रहा।इसके कारण सब मर्यादा समाप्त हो गयी।धन का कारण ,अधिक संग्रह के कारण भी हिंसाए होती हैं ,संसार में जितने भी कानून बनाये गए हैं वे सब पंचपापों के लिए बनाये गए और हम दिन रात पांच पापोँ की ही घटनाएं देखते हैं।
इनका मात्र बचाव हैं अहिंसा सत्य अचौर्य शील व्रत और अपरिग्रह का पालन करना ,अतः सब पारिवारिक जनो को अपनी संतानों के प्रति प्रेम भाव रखे ,उन्हें संस्कारित करे ,और उन्हें अच्छे वातावरण में पालें जो भविष्य के अभिभावक होंगे ,इस प्रकार संस्कारित परिवार बनेगा जिससे स्वयं ,परिवार, समाज ,देश सुख शांतिदायक बनेगा।
पारिवारिक कलह से घर नरकधाम बन जाता हैं
सब स्वर्ग जैसा सुख चाहते हैं पर स्वर्गवासी नहीं होना चाहते
एक एक इकाई से परिवार बनता हैं
सुखद नीव से ही सुखद भवन बनेगा
किसी को कष्ट न हो और न दो
जीवन इतना आपाधापी का हो गया हैं
उस पर ये बुराइयां पाल लो
तो भविष्य कितना दुखद होगा
सोचो समझो गौर करो और जीवन सुखद बनाओ
डॉक्टर अरविन्द जैन/06दिसंबर2018