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(विचार-मंथन) मोदी के संकटमोचक थे जेटली (लेखक-सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

25/08/2019

भाजपा के वरिष्ठ नेता और मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वित्त मंत्री का कार्यभार संभालने वाले अरुण जेटली अब हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने शनिवार को दोपहर दिल्ली एम्स में 12 बजकर सात मिनट पर आखिरी सांस ली। जेटली एम्स में पिछले कई दिनों से भर्ती थे। विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम उनका इलाज कर रही थी। 66 साल के जेटली को सांस लेने में दिक्कत और बेचैनी की शिकायत के बाद नौ अगस्त को एम्स लाया गया था। एम्स ने 10 अगस्त के बाद से जेटली के स्वास्थ्य पर कोई बुलेटिन जारी नहीं किया था। जेटली ने खराब स्वास्थ्य के चलते 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था।
पेशे से वकील जेटली ने मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान अहम जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने वित्त के साथ कुछ समय के लिए रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी निभाई। वह कई मौकों पर सरकार के संकटमोचक भी बने। इस साल मई में उन्हें इलाज के लिए एम्स में भर्ती कराया गया था। बाद में उन्हें छुट्टी दे दी गई थी। पिछले साल 14 मई को उनका एम्स में गुर्दे का प्रत्यारोपण हुआ था। जेटली पिछले साल अप्रैल से वित्त मंत्रालय नहीं जा रहे थे। हालांकि वह 23 अगस्त, 2018 को दोबारा अपने मंत्रालय पहुंचे थे। उनकी गैर मौजूदगी में तत्कालीन रेल मंत्री पीयूष गोलय को वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।
पुरुषस्य भाग्यम दैवो न जानामि। भारतीय सनातन धर्म परंपरा की पुरानी धारणा है। पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली पर सटीक बैठती है। श्रीराम कालेज से कामर्स स्नातक रहे अरुण जेटली कभी चार्टर्ड अकाउंटेंट बनना चाहते थे। उन्होंने परीक्षा भी दी थी, लेकिन कहते हैं उनके भाग्य में कुछ और लिखा था। छात्र नेता से हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के प्रतिष्ठित वकील बने अरुण जेटली को 2014-2019 तक मोदी सरकार की कैबिनेट का ताकतवर मंत्री बनना था। मंत्री ही नहीं केंद्र सरकार का संकट मोचक भी बनना था। अरुण जेटली का पूरा नाम अरुण महाराज किशन जेटली है। 66 साल के अरुण जेटली की छात्र जीवन से ही राजनीति में रुचि रही और 1973 के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर कालेज के विद्यार्थी जेटली ने श्रीराम कालेज से बीकाम में दाखिला लिया। बीकॉम करने के बाद वह दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी में प्रवेश लिया और 1977 में लॉ ग्रेजुएट की डिग्री पाने से पहले अरुण जेटली ने राजनीति में भी काफी कुछ हासिल कर लिया था, वह अखिल भारतीय विद्याथी परिषद से भी जुड़े थे।
जेटली 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए और 1975-77 के दौरान वह देश में लगे आपात काल के दौरान प्रीवेंशन और आफ डिटेंशन का सामना करने वाले भी बने। जेल से रिहा हुए तो जनसंघ के सक्रिय सदस्य बने। राजनरायण और जय प्रकाश नारायण के शुरू किए आंदोलन में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले बने। जयप्रकाश जी द्वारा बनाई गई नेशन कमेटी फॉर स्टूडेंट के संयोजक भी बनाए गए। लेकिन इसके बाद अरुण जेटली ने अपना ध्यान प्रोफेशनल कॉरियर बनाने में लगाया। 80 के दशक में अरुण जेटली ने देश के विभिन्न हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में बतौर वकील अपनी पहचान बनाई। जनवरी 1990 में वह दिल्ली हाईकोर्ट के नामित वरिष्ठ अधिवक्ता बने। 1989 में तत्कालीन वीपी सिंह की सरकार ने जेटली को देश का एडिशनल सॉलीसीटर जनरल बनाया। वकालत के कॉरियर में जेटली शरद यादव (तब जनता दल), लालकृष्ण आडवाणी (भाजपा), माधव राव सिंधिया (कांग्रेस) के वकील रहे। तमाम नामी कंपनियों के वकील रहे और अपनी जगह बनाई। वकालत के करियर को धार देने के बाद अरुण जेटली ने फिर राजनीति की तरफ समय देना शुरू किया। 1991 में वह भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल हुए। 1999 में अरुण जेटली को पार्टी ने राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया। लोकसभा चुनाव के बाद देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए के बैनर तले भाजपा सत्ता में आई। अटल जी के नेतृत्व वाली इस सरकार में अरुण जेटली को सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) मिला। वह विनिवेश राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी बने। बाद में, जेटली को विधि एवं न्याय मंत्रालय में मंत्री बनाया गया और नवंबर 2000 में तत्कालीन कानून मंत्री राम जेठमलानी के त्यागपत्र देने के बाद जेटली को केंद्रीय कानून मंत्री की जिम्मेदारी मिली। 2002 में जेटली फिर भाजपा के संगठन में चले गए 2003 में फिर वाजपेयी मंत्रिमंडल में शामिल हुए। इस बार उन्हें वाणिज्य मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया।
कहा जाता 2013 में वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में सशक्त तरीके से लाने वाले प्रमुख रणनीतिकारों में थे। पर्दे के पीछे रहकर जेटली ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए केंद्रीय राजनीति में तमाम मोहरे फिट करते रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद जेटली ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई। 2014-19 तक केंद्र सरकार के संकट मोचक बने रहे। अरुण जेटली का स्वास्थ्य 2014 से उन्हें धोखा देता रहा। अनियंत्रित डायबिटीज से निजात पाने के लिए सितंबर 2014 में गैस्ट्रिक बाईपास सर्जरी कराई। इसके कुछ समय बाद मई 2018 में जेटली को किडनी की बिमारी से परेशान होकर किडनी ट्रांसप्लांट के दौर से गुजरे। 2019 के जनवरी महीने में उन्हें एक और गंभीर बिमारी ने घेर लिया। वह साफ्ट टिश्यू कैंसर की गिरफ्त में आ गए। स्वास्थ्य वजहों के चलते जेटली ने 2019 में दोबारा सत्ता में आने पर मोदी सरकार की कैबिनेट में न जाने की इच्छा जताई। पिछली 9 अगस्त से वे एम्स के गहन चिकित्सा कक्ष में गंभीर अवस्था में भर्ती थे और अंतत: जिंदगी की जंग हार गए।
सिद्धार्थ शंकर / 25अगस्त