लेख

काँग्रेसः कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया.....? (लेखक- ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस)

11/07/2019

आज से करीब पचास साल पहले स्व. देवानंद अभिनीत एक फिल्म आई थी, कालापानी। इस फिल्म में एक बहुत ही लोकप्रिय गीत था, ‘‘कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो फिर हर बात पे रोना आया...’’, किस स्थिति-परिस्थिति में यह गाना फिल्म की कहानी के अनुरूप फिलमाया गया था, वह अलग बात है, किंतु आज यह पूरा गाना देश की मरणासन्न सबसे वरिष्ठ पार्टी कांग्रेस पर पूरी तरह अवतरित हो रहा है, आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल जी की स्थिति ठीक कालापानी के देवानंद जी जैसी ही हो रही है और राहुल जी भी वही गीत गुनगुनाने को मजबूर है।
वास्तव में कांग्रेस की नसीबी और बदनसीबी का एक सौ तीस साल पुराना इतिहास मानव जीवन की इन्हीं दो स्थितियों के बीच सिमट कर रह गया है। आजादी की लड़ाई जिस कांग्रेस के तिरंगें के छत्रछात्रा में लड़ी गई और फिरंगियां को यह देश छोड़कर भागने को मजबूर होना पड़ा आज वहीं तिरंगा और उसकी छत्रछाया में पली कांग्रेस अपनी आजादी को लेकर संघर्ष करने को मजबूर है। यद्यपि इसमें दोषी कोई और नहीं इसी पार्टी के पूर्वज रहे है, जिन्होंने इस पार्टी को एक परिवार विशेष तक ही सीमित रखा, किंतु पूर्वजों के साथ वे अधिक दोषी है, जिन्होंने पूर्वजों को मनमानी करने की पूरी छूट दी, अब चाहे इसे लगातार सत्ता में रहने के अहंकार को दोषी माना जाए या उस समय की स्थिति-परिस्थिति को? यह एक अलग बात है, किंतु इंदिरा जी के जाने के बाद इस पार्टी की जो फिसलन शुरू हुई थी, वह आज भी तेज गति से जारी है और पार्टी रसातल की ओर अभिमुख है, अब तो कोई चमत्कार या देवीय अवतार ही इसे बचा सकता है, फिर पार्टी की इस दुरावस्था का कारण यह भी है कि इंदिरा-राजीव के बाद जब पार्टी सोनिया के हाथों में पहुंची और उन्होंने डेढ़ दशक तक पार्टी को सहेज कर रखा, वह पार्टी बाद में पुत्र प्रेम व ममत्व के कारण ऐसे हाथों में सौंप दी गई, जो राजनीति का अनुभवहीन और बचकानी हरकतों वाला शख्स रहा, यद्यपि इसके बाद बुजुर्गों ने पार्टी से कन्नी काट ली किन्तु युवाओं ने अपनी उम्मीद कायम रखी, सोनिया जी की यह सबसे बड़ी भूल थी, वे भी बुजुर्गों को तवज्जोह देने के मामले में भाजपा के रास्ते पर चली प्रणव मुखर्जी तथा उनके समकक्ष अन्य बुजुर्गों को उपेक्षित रखा और अपनी बेटी प्रियंका का भी सहयोग उस समय लिया, जब पार्टी का रसातल में जाना तय माना जा रहा था।
यदि हम कांग्रेस की इस स्थिति की तुलना भाजपा से करें, तो भाजपा भी एक समय काफी संकट में थी, जब उसके केवल दो सदस्य संसद में थे और पार्टी बाहर भी काफी बदहवास और परेशान थी, किंतु उसी के नेताओं की सूझबूझ और दूरदृष्टि ने उसे आज की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया, यद्यपि इस काम को करने वाले बुजुर्ग और उपेक्षित है, किंतु पूरी पार्टी उस शख्स के साथ है जो पार्टी के राष्ट्रीय पटल पर पांच साल पहले ‘नवागत’ व संसद का अनुभवहीन होने के बावजूद वह अपने बल पर राजनीति के क्षितिज पर छाया हुआ है। वैसे जहां तक मोदी का सवाल उन्होंने स्थिति-परिस्थितियों से सीख लेकर सब कुछ सीखा और पार्टी में ‘दारासिंह’ की स्थिति में आ गए, किंतु इसके ठीक विपरित कांग्रेस के नौसीखिया अध्यक्ष संसद में मोदी से गले मिलकर ‘आँख मारते’ रहे और पार्टी रसातल में जाती रही। अब जब कांग्रेस के हरे-भरे खेत को स्वार्थी चिड़ियाओं द्वारा चुग लिया गया तब अब इसका मालिक ‘रणछोड़दास’ बन अपना सिर घुन रहा है, पर इससे होता क्या है? और खेत को चुग जाने वाली चिड़ियाएँ दिखावे मात्र के लिए पार्टी की मौत पर घर आकर संवेदना व्यक्त करने वालों की भूमिका में है, आज की पार्टी की यही दुःखद स्थिति है।
कांग्रेस की इस दुःखद स्थिति का केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा पूरा राजनीतिक लाभ उठाने की तैयारी में है, और कांग्रेसशासित गिने-चुने राज्यों से भी कांग्रेस ने अभी भी कोई ठोस व सार्थक कदम नही उठाया तो हर कांग्रेसशासित राज्य में कर्नाटक की पुनरावृत्ति होगी और भाजपा के ‘‘चक्रवर्ती सम्राट’’ बनने का सपना पूरा होगा, इसलिए कांग्रेस को अंतिम चरण की लड़ाई के पहले खुद की सैन्य ताकत को मजबूत करने का करिश्मा करके दिखाना होगा।
11जुलाई/ईएमएस