क्षेत्रीय

अभी भी बिक रहा बचपन

19/03/2020


अशोकनगर (ईएमएस)। प्रदेश समेत देश में भले ही मासूम बच्चों को बालश्रम से रोकने के लिए कड़े कानून, शिक्षा का अधिकार व अन्य योजनाएं लागू की जा रही हैं, लेकिन इन सब प्रयासों का जमीनी धरातल पर असर कम ही दिखाई दे रहा है।
अभी भी बचपन सरेआम बिक रहा है। मासूम बच्चों का बचपन कहीं होटलों पर तो कहीं कबाड़ा बीनते और ढाबों पर खप रहा हैं। स्थिति यह है कि कानून के नाम पर सिफ ऑपचारिकता पूरी की जा रही है। श्रम विभाग के आंकड़ों पर नजर डाले तो परिणाम काफी निराशाजनक सामने आ रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि श्रम विभाग ही मात्र ऐसा विभाग है जिसे शहर में कहीं भी बाल श्रमिक नजर नहीं आते। चाय की होटलों पर, ढाबों पर यही नहीं कपड़ों की दुकानें और सारूमों तक मासूमों के बचपन के साथ खुलेआम खिलबाड़ हो रहा है। बिडम्रा तो यह है कि बड़े प्रतिष्ठानों के संचालक महज 100 रुपया से भी कम रुपये देकर मासूमों से सुबह से देर रात काम कराते हैं। इसे मासूम बच्चों की मजबूरी कहें या उनकी लाचारी कि वे पढऩे लिखने के दौर में मजदूरी कर रहे हैं। आभावों में जिन्दगी जीकर उनका बचपन श्रम की सूली पर चढ़ गया है। लिहाजा इन मासूमों का बचपन बचाने के लिए कानून बना, लागू हुआ लेकिन अमल कितना हुआ यह श्रम विभाग भी बताने को तैयार नहीं। ऐसे में बच्चों का बचपन बर्वाद होता न विभाग के अधिकारियों को नजर आता है और न ही जिला प्रशासन को यही कारण है कि अब भी मासूम बचपन खुलेआम बिक रहा है। लेकिन किसी को कोई सरोकार नहीं है।
कानून बने लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं:
वर्तमान में कई मासूम बच्चे कच्ची उम्र में ही दो वक्त की रोटी के जुगाड़ के लिए मेहनत-मजदूरी करते नजर आ रहे हैं। लाख कोशिश के बावजूद बाल मजदूरी पर प्रभावी तौर पर प्रतिबंध लगाने में प्रशासन सफल नहीं हो पाया है। कई मामलों में पारिवारिक मजबूरी इन मासूमों को कम उम्र में ही मेहनत-मजदूरी करने को मजबूर कर देती है। टैक्सी स्टैण्ड, बस स्टॉप तथा रेलवे फाटक के समीप अक्सर कम उम्र के बच्चे चाय बेचते नजर आते हैं। शिक्षा से वंचित इन मासूमों का भविष्य पानी के मोल बिकता नजर आ रहा है। अभिभावकों की मौन स्वीकृति व विभागीय अधिकारियों की अल्प इच्छाशक्ति के कारण इन मासूमों का भविष्य प्रभावित हो रहा है।
पल-पल पिस रहा बचपन:
ऐसा नहीं कि ये बच्चे केवल चाय बेचने तक ही सीमित है। कई जगहों पर ये गैराज, ढाबों, रेस्टोरेंट व कई जगह तो भवन निर्माण जैसे जोखिम भरे काम में लगे नजर आ जाते हैं। कानून का खुला उल्लंघन होते देख कर भी सरकारी कारिंदे जान कर भी अनजान बने हुए हैं।
ईएमएस/ चन्द्रबली सिंह/ 19 मार्च 2020