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(लेख) विचारों और जीवनशैली को आधार बनाकर जोड़ें रिश्ते

03/12/2018


- इससे ही रुकेंगे तलाक, बचेंगे परिवार
नीतू जायसवाल, ईएमएस। समाज में परिवार में बिखराव की घटना तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले दिनों देश में ऐसी घटनाएं घटित हुईं, लेकिन कुछ घटनाओं ने देश का ध्यान खींचा है। कानपुर के सिटी एसपी की आत्महत्या। बिहार में कलेक्टर का तलाक देना, बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और लालू प्रसाद यादव के बेटे का 6 महीने में ही तलाक हो जाना। इन घटनाओं ने कई सवालों को जन्म दिया है। इन घटनाओं को कैसे रोके जा सकता है। आलेख में पढि़ए....
बहुत सारी बातें है ऐसी घटनाओं के पीछे गलती किसी एक की नहीं होती। हमारा समाज पितृसत्तात्मक रहा है। लड़कियों को सदैव दोयम दर्जा दिया गया। बहुओं की स्थिति तो और भी बुरी रही है। दहेज के दानव ने कितनी ही बहुओं को जिंदा लील लिया है। मैंने ऐसे कई केस तो पिछले समय मे खुद देखे है। अब लड़कियां पढऩे लगी, नौकरी करने लगी साथ ही परिवार की जिम्मेदारियां भी संभालने लगी हैं, लेकिन फिर भी उसके हिस्से की आजादी उसे पूर्णत: कहाँ मिली? यहां तक की उनके वेतन पर भी उसका अधिकार नहीं रहता। यहां एक बात जरूर है कि इस स्थिति में अब काफी हद तक बदलाव आया है। महिलाओं के लिए बनाए गए कानूनों ने उन्हें थोड़ा साहस तो दिया है परंतु उसके सही उपयोग कम ही लोग कर पाये। दुरुपयोग ज्यादा दिखाई देने लगा है। महिला कानूनों के दुरुपयोग के कई मामले सामने आते हैं, जहां पर पति और ससुराल वालों को प्रताडि़त किया जाने लगा है। वास्तव में जो प्रताडि़त है वो आंसू बहाकर आज भी जी रही हैं और कुछ स्वच्छन्दता की चाह में रोड़ा बनते परिवार पर आरोप लगाए जा रही है। बहुत कुछ है इन सब बातों के पीछे? पारिवारिक संस्कार और समाज की मानसिकता सब बदलनी चाहिए। शादी न तो लड़की की सुंदरता को या मोटे दहेज के पैमाने पर की जाए, न ही लड़कों की मोटी आय देखकर। बच्चों में परिवार के संस्कारों की गहरी छाप होती है। व्यकितत्व पर तो लगभग
समान विचारों और जीवनशैली को आधार बनाकर रिश्ते जोड़े जाने चाहिए। शादी के पहले ही एक-दूसरे के विचारों पर चर्चा होनी चाहिए। लड़के, लड़कियों खुलकर अपना अतीत, वर्तमान, भविष्य पर चर्चा करनी चाहिए, तभी उनका रिश्ता जोड़ा जाना चाहिए। छाछ दिखे तो भी फूंक-फूंककर पीना चाहिए। यद्यपि उसके बाद भी शादी के बाद एक-दूसरे की इच्छाओं का सम्मान करके आपसी समझदारी से रिश्ता निभाया जाना चाहिए। थोड़ा बहुत समझौता दोनों ही ओर से किया जाना चाहिए। लड़की के माता-पिता का अनावश्यक हस्तक्षेप न हो, न ही ससुराल में अत्यधिक दबाव की स्थिति बनाई जाए। बहु को मानसम्मान और प्यार मिलना चाहिए। सारी परिस्थितियों में जरा भी सुधार न दिखे, कुछ भी ठीक न हो रहा हो तो तलाक जैसा कठोर कदम उठाना भी गलत नहीं है। कई बार सिर्फ एक पक्ष ही गलत होता है तब वाकई परिवार की स्थिति विकट हो जाती है। नहीं तो अधिकतर दोनों ही पक्ष थोड़े बहुत गलत होते ही हैं। कोई भी एक नियम सब जगह लागू नहीं होता है। समाज और परिवार के संस्कारों पर ही बहुत कुछ निर्भर है। यह जिम्मेदारी माता-पिता की है कि वे अपने बेटे-बेटियों को संस्कार के ऐसे सांचे में ढालें कि वे रिश्तों की मजबूती को समझें और जीवन में होने वाले विवाद का हल खुद निकालने में सक्षम हों। इसी पहल से ही परिवार बच पाएंगे।
-ईएमएस।