लेख

(विचार-मंथन) सांप्रदायिक सौहार्द्र बनाने के लिए भी हो राजनीति (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

07/12/2018


यह तो आम बात हो चली है कि वोट बैंक पर कब्जा करने के लिए सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न कर लोगों को आपस में भिड़वाने और लड़वाने का काम कुछ राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता बहुतायत में करते हैं। इसलिए आए दिन सांप्रदायिक दंगे-फसाद की खबरें भी आती रहती हैं। भीड़ द्वारा निहत्थों की जान लेना इसका एक छोटा रुप कहा जा सकता है, जिसे लेकर बुलंदशहर में जो कुछ हुआ उसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कानून व्यवस्था दुरुस्त करने की भी मांग उठ रही है। बावजूद इसके राजनीति करने वाले अपने बयानों और प्रयासों से बाज आते नहीं दिख रहे हैं। इस माहौल में एक खबर और सामने आ रही है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के बाद राज्य को बुरी तरह मथने वाली भाजपा की सारी तैयारियां धरी की धरी रह गई हैं। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की, कूचबिहार से प्रस्तावित ‘रथ यात्रा’ को अनुमति देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि इससे सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। इस बात को कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी माना और उसी के तहत अपना फैसला सुनाया जिसके बाद कहा जाने लगा कि भाजपा की रथ यात्रा वाली सारी तैयारियां अब बेकार साबित हो गई हैं। इससे तिलमिलाए पश्चिम बंगाल भाजपा के उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजूमदार हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ खंड न्यायापीठ में याचिका दायर करने और फैसले पर सुनवाई करने की बात कहकर पार्टीजनों को बताने का प्रयास कर रहे हैं कि अभी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है। बहरहाल यह न्यायिक प्रक्रिया के तहत किया जाने वाला कार्य ही है, इसलिए इस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं, लेकिन जब भाजपा नेता यह कहते हैं कि भारतीय संविधान के तहत किसी भी शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन की अनुमति है, इसी आधार पर वो न्याय के हकदार भी हैं। इस पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता कह सकते हैं कि अपने स्वयं के आंदोलन और प्रदर्शनों के लिए तो उन्हें संविधान की याद आ जाती है, लेकिन जब न्यायालय कोई अहम फैसला सुनाता है और उस पर अमल की बात होती है तो फिर इनकी संविधान के प्रति आस्था कहां चली जाती है। लोग सीधे दिल्ली की केजरीवाल सरकार का उदाहरण देते हैं और रही सही कसर मंदिर-मस्जिद मामला पूर्ण करता दिख जाता है। दरअसल इस समय मंदिर निर्माण को लेकर देशभर में जिस तरह का माहौल भाजपा और उसके अनुवांशिक संगठनों ने बनाने की कोशिश की है उससे यही संदेश जाता है कि वो मनमर्जी करने के लिए अदालत और संविधान को भी भुला देंगे। इसे लेकर अल्पसंख्यक वर्ग में तो तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं और सीधे तौर पर कहा जा रहा है कि जिन्हें अदालत और संविधान का भी सम्मान करना नहीं आया वो आखिर खुद अपने लिए इनके उपयोग की बातें कैसे कर रहे हैं। बहरहाल यहां बात पश्चिम बंगाल से जुड़ी हुई है, जिसे मथने की तैयारी में भाजपा उन मामलों को लगातार उठाती चली आ रही है जिससे जनता का ध्यान वो पूरी तरह से अपनी ओर खींच सके। दूसरी तरफ राज्य सरकार फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ा रही है, क्योंकि वह जानती है कि यदि उसका एक भी कदम गलत साबित हुआ तो फिर उसका संभलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा। इसलिए कलकत्ता उच्च न्यायालय को राज्य सरकार के महाधिवक्ता ने जानकारी दी थी कि कूचबिहार के पुलिस अधीक्षक ने भाजपा अध्यक्ष की प्रस्तावित रथ यात्रा को अनुमति देने से इंकार कर दिया। राज्य सरकार की मानें तो इस यात्रा से सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। पुलिस को सूचना मिली है कि यात्रा होने पर सांप्रदायिक शक्तियों को उकसाने वालों को अवसर मिल जाएगा और उपद्रवी तत्व सक्रिय हो जाएंगे, जिससे शांति-व्यवस्था भंग हो सकती है। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पश्चिम बंगाल में पार्टी की ‘लोकतंत्र बचाओ रैली’ आयोजित करने के कार्यक्रम को लेकर चल रहे हैं, जिसमें तीन ‘रथ यात्राएं’ प्रस्तावित हैं। इस स्थिति में कूचबिहार में अन्य राज्यों से भी लोग आएंगे और भाजपा के शीर्ष नेता भी यहां एकजुटता दिखाने जोशीले अंदाज में दिखेंगे। इस स्थिति को देखते हुए ही प्रशासनिक स्तर पर निर्णय ले लिया गया, जबकि भाजपा ने न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती की पीठ को यह बताने की भरसक कोशिश की कि पार्टी शांतिपूर्ण यात्रा करना चाहती है, उससे किसी प्रकार की कोई अशांति नहीं होगी। इस प्रकार भाजपा ने अपनी तीनों रैलियों के लिए राज्य सरकार को अनुमति देने की मांग को लेकर अदालत पहुंची और कहा जा रहा है कि आगे भी वह लगातार ऐसे प्रयास करती रहेगी। इस स्थिति में अदालत ने भी भाजपा से सीधा सवाल कर दिया कि यदि कोई अप्रिय घटना घटित होती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इसके जवाब में भाजपा के वकील तो यही कहते दिखे कि पार्टी एक शांतिपूर्ण रैली आयोजित करेगी लेकिन कानून और व्यवस्था को बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। कुल मिलाकर यदि रैली सफल रही तो भाजपा की जय-जयकार और यदि कोई अप्रिय घटना घटित होती है तो उसके लिए राज्य सरकार को सूली पर लटकाने का इंतजाम तो पूरा कर ही लिया जाएगा। ऐसे में राज्य सरकार नहीं चाहेगी कि भाजपा इस प्रकार की कोई भी यात्रा करने में सफल रहे जिससे माहौल खराब हो या फिर उसका मजबूत किला ध्वस्त हो जाए। इसलिए अब जहां भाजपा के लोग संविधान और न्यायपालिका की दुहाई देते नजर आ रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ सांप्रदायिक सौहार्द्र बनाए रखने की चुनौती का हवाला देती पश्चिम बंगाल की सरकार और प्रशासन एकमत हो कह रहे हैं कि उनके क्षेत्र में इस तरह का कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाए जिससे आपसी भाईचारा और सौहार्द्र को नुक्सान होता हो। बहरहाल देखने वाली बात यह है कि जैसे-जैसे चुनाव करीब आते हैं वैसे-वैसे राजनीतिक पार्टियां और अधिकांश नेता वो सब करने को तैयार हो जाते हैं, जिससे उनका मतप्रतिशत बढ़ सकता है। इसके लिए तयशुदा अपराधियों और सांप्रदायिक ताकतों का उपयोग करने से भी गुरेज नहीं किया जाता है। यही वजह है कि चुनाव के दौरान समाज में गैर कानूनी कार्य करने वाले भी खूब सक्रिय हो जाते हैं, जिसका हर्जाना आमजन को ही उठाना पड़ता है। बात साफ है कि जब सांप्रदायिक आग फैलती है तो ज्यादातर सामान्य एवं मध्यमवर्गीय परिवारों को ही परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसलिए कहना पड़ता है कि राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को चाहिए कि वो चुनाव के समय सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए भी कार्य करें न कि वोट बैंक को हथियाने की खातिर सब कुछ दांव पर लगाने की जिद पर अड़े रहें। मुमकिन है कि अनेकता में एकता के लिए राजनीतिज्ञ कम से कम यह तो कर ही सकते हैं।
07दिसम्बर/ईएमएस