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प्रजातंत्र के संवेदनशील प्रहरी की पहचान बनाई प्रजापति ने (लेखक -सौरभ "अंकित जैन")

11/09/2019

(12 सितम्बर 2019- जन्मदिन पर विशेष)
मध्यप्रदेश की गरिमापूर्ण विधायी परम्परा के संवाहक और संरक्षक एन.पी. प्रजापति मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष है। तो इसके पीछे, संसदीय प्रक्रियाओं और संवैधानिक बारीकियों के मर्मज्ञ होने की उनकी ललक और उसमें पारंगता हासिल करना। सदन के सर्वोच्च पद पर पक्ष और प्रतिपक्ष से परे जाकर सदन में जिस निष्पक्षता की जरुरत होती है, वही होता है अध्यक्ष। अध्यक्ष, जिसके संकेत भर से बोलता हुआ सदस्य चुप हो जाता है और चुपचाप बैठा सदस्य बोलने लगता है। अध्यक्ष, जो सदन की शक्ति, सर्वोच्चता और अस्मिता का प्रतीक होता है। उसके बारे में सभी का यह विश्वास होता है कि वह सबका है, और सबके लिये है। ऐसे गौरवशाली, मानपूर्ण पद पर श्री प्रजापति की प्रतिष्ठा, संसदीय नेतृत्व की अद्भूत क्षमता राजनीतिक शुचिता के प्रहरी के रुप में पहचान बनाई है। 8 माह की अल्पावधि में ही उनकी सजग संसदीय प्रहरी की पहचान बनी है।
12 सितम्बर, 1958 को जन्मे श्री नर्मदा प्रसाद प्रजापति की प्रारंभिक शिक्षा इंदौर के प्रख्यात डेली कॉलेज में हुई। वर्ष 1980-81 में इंदौर विश्वविद्यालय के खेल प्रतिनिधि के रुप में महासभा के सदस्य निर्वाचित हुए। वर्ष 1982 में वे इंदौर विश्वविद्यालय की हॉकी टीम के कप्तान तथा वर्ष 1983 में भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के जिला अध्यक्ष बने। श्री प्रजापति वर्ष 1985 में आठवीं विधानसभा के लिए गोटेगांव विधानसभा क्षेत्र में प्रथम बार निर्वाचित हुए। अपने ही कार्यकाल में उन्होंने प्रखर और जागरुक विधायक के रुप में अपनी विशिष्ठ पहचान बनाई। इसी पहचान का ही परिणाम था, कि वे वर्ष 1983 में दसवीं विधानसभा में पुन: चुनकर आये, उन्हें राज्यमंत्री, ऊर्जा (स्वतंत्र प्रभार) का उत्तरदायित्व सौंपा गया। अपने उत्तरदायित्व के दक्षतापूर्ण निवर्हन के परिणाम स्वरुप वे विधानसभा द्वारा उत्कृष्ट मंत्री के रुप में पुरस्कृत किये गये। वर्ष 1996-97 में श्री राजीव गांधी सदभावना पुरुस्कार से भी वे सम्मानित किये गये। वर्ष 2008 में श्री प्रजापति तेरहवीं विधानसभा के लिए तीसरी बार निर्वाचित हुए। उत्तरदायी कर्मवीर जनप्रतिनिधि के रुप में जनसमस्याओं को उजागर करने तथा उनका निराकरण करने में सदैव अग्रणी रहे। उनके संसदीय आचरण, स्वच्छ छवि और निर्मल व्यवहार एवं स्पष्ट कथन का ही नतीजा था कि वर्ष 2018 में, जब 15 वर्षों के अंतराल के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रदेश की सत्ता संभाली, तो शीर्षस्थ नेतृत्व ने उनकी प्रतिभा को विधानसभा अध्यक्ष के गरिमामय पद के अनुकूल माना। अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के रुप में उनका निर्वाचन उच्च संसदीय प्रतिमानों के अनुरुप तो था ही, इसमें उनके व्यक्तित्व का भी बड़ा योगदान रहा। मध्यप्रदेश की 15वीं विधानसभा की आरंभिक अध्यक्षीय कार्यावधि भली-भांति इंगित करती है, कि सदन संचालन का उनका अपना एक विशिष्ट तरीका है, जिसकी किसी पूर्ववर्ती से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। वे यह भली-भांति जानते हैं कि वर्तमान विधानसभा में संख्याबल की दृष्टि से मजबूत प्रतिपक्ष है। इसलिए वे सदन को एक पक्षीय होने से बचने प्रतिपक्ष को भरपूर अवसर दिया हैं। कई बार जनापेक्षाओं के सरोकार से वे स्वयं विधायकों के प्रश्नों के उत्तर को और अधिक स्पष्ट् करने के लिए विषयानुकूल हस्तक्षेप करते हुए सदन की गरिमा को बढ़ावा देने का कार्य करते हैं। एक तरफ जहां सदन में यदा-कदा उपस्थित होने वाले अप्रिय क्षणों या वाद-विवाद को अपनी संसदीय प्रतिभा, चुटीली और विनोदपूर्ण शैली से सहज करने में सफल हुए हैं। समाज और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर उनका दृष्टिकोण सदैव सटीक और स्पष्ट् होता है। अब तक वे अध्यक्षीय कार्यकाल में वे आसंदी पर सर्वाधिक समय उपस्थित रहे हैं। वे मानते हैं कि अध्यक्ष को निष्पक्ष होने के साथ निष्पक्ष दिखना भी चाहिए। वे विधानसभा में पहली बार निर्वाचित होकर आये विधायकों, महिला सदस्यों को सदन में सार्वजनिक मुद्दे उठाने एवं विभिन्न मसलों की बहस में भाग लेने और बोलने के लिए प्रोत्साहित किया हैं। नव-निर्वाचित विधायकों को वरिष्ठ सदस्यों के संवाद ध्यानपूर्वक सुनने, समझने और मूल विषयों पर बिना भूमिका के सकारात्मक पक्ष रखने की सीख भी दी है। अध्यक्ष के रुप में उन्होंने सदस्यों के आचार-व्यवहार में मर्यादा, संयम, नियम-प्रक्रियाओं का ज्ञान और उत्तरदायित्व की भावना का ज्ञान भी कराया। सदस्यों को कब, क्या, कैसे, किन मुद्दों पर बोलना है, और कब चुप रहना है। इसका भी समय-समय पर मार्गदर्शन दिया। प्रबोधन कार्यक्रम की अमिट छाप सदस्यों के संसदीय कार्य-व्यवहार में विगत सत्र में देखने को मिली।
सदन संचालन में श्री प्रजापति की मुखरता, समभाव ने उन्हें पक्ष और प्रतिपक्ष का विश्वास अर्जित किया है। उनकी व्यवस्था को सरकार और प्रतिपक्ष, दोनों ने स्वीकार किया हैं। प्रभावी और विलक्षण व्यक्तित्व के साथ उनका संसदीय और विधायी ज्ञान ने विधानसभा अध्यक्ष के रुप में उन्हें वह ऊंचाई दी है, जिसकी इस पद पर आसीन व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है। संसदीय आचरण और अनुशासन का पालन भी उनकी प्राथमिकता में रहता है। अपनी उत्तरदायी भूमिका पर वह न केवल खरे उतरते है, बल्कि अपनी सदाशयता, उदारता और निपुणता से स्वयं को और विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका की विशिष्ठ पहचान बनाई है।
सदन के सदस्यों की विधायी गतिविधियों, उपलब्धियों, मंत्रियों के कार्य-व्यवहार, चर्चा की स्तरीयता, मंत्रियों को विधायकों के प्रश्नों की बेहतर जानकारी देने, सदस्यों में लोकहित की पीड़ा का निष्पक्ष आंकलन तथा विश्लेषण श्री प्रजापति ने विधानसभा के विगत सत्रों में अध्यक्ष के रुप में दोनों पक्षों को ध्यान में रखते हुए सजगता के साथ किया है।
प्रजापति ने विधानसभा अध्यक्ष के रुप में अपने आप को केवल सदन संचालन तक ही सीमित नहीं रखा है। उन्होंने विधानसभा में नई कार्य संस्कृति बनाने का काम भी किया है। उन्होंने सत्रोपरांत विधानसभा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के उत्साहवर्द्धन हेतु अनौपचारिक मुलाकात की नवीन परम्परा विकसित की है। विधानसभा में मंत्रियों द्वारा दिए गए, लंबित आश्वासनों को उन्होंने जहां तत्परता से निराकृत कराया। अब 30 दिवस में आश्वासन निराकृत किए जाने की नई व्यवस्था सुनिश्चत की है। विधानसभा की अब तक की कार्यवाहियों का डिजिटलाइजेशन किया जाना भी अद्वितीय उपलब्धि है। पक्ष-प्रतिपक्ष के सदस्यों को अपनी बात कहने का पूरा मौका देने के पक्षधर श्री प्रजापति ने प्रश्नकाल की गरिमा बढ़ाने का काम किया है। उनका पूरा प्रयास रहता है कि प्रश्नकाल के निर्धारित समय में प्रतिदिन 25 प्रश्नों को आवश्यक रुप से लिया जाये। वे स्वयं प्रश्नों, स्थगन और ध्यानाकर्षण प्रस्तावों के चयन पर नजर रखते हुए प्रयास करते हैं, कि विधानसभा अपने उद्देश्य पूर्ति में बेहतर योगदान हो। विधानसभा के समृद्ध पुस्तकालय के अधिकाधिक उपयोग हेतु सदस्यों को प्रेरित किया हैं। विधायकों की विविध विषयों में अध्ययन की प्रवृत्ति बढ़े। विधानसभा में बहस के स्तर की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए उन्होंने शोध और अनुसंधान शाखा के बेहतर प्रबंधन को प्राथमिकता दी है। उनका प्रयास है कि विधानसभा के प्रत्येक सदस्य के चाहने पर उन्हें प्रत्येक मुद्दे और विषयों पर भरपूर संदर्भ सामग्री अध्ययन के लिए उपलब्ध हो। आवास, चिकित्सा या अन्य बुनियादी आवश्यकताओं में वर्तमान सदस्य हों या पूर्व सदस्य, उन्हें बेहतर सुविधायें उपलब्ध कराने का प्रयास किया है।
श्री प्रजापति का चिंतन गहन-गंभीर और दूरदर्शिता से परिपूर्ण है। उन्होंने अपने गहरे अनुभवों से यह धारणा मजबूत की है कि अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश की राजनीति में नैतिक मूल्य सशक्त हैं। एक कुशल राजनेता और विधानसभा अध्यक्ष का यह आत्मविश्वास आश्वस्त करता है, कि संसदीय परम्पराओं का पालन करने में अग्रणी रहेगा।
मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष पद पर कर्मठ राजनीतिज्ञ, राजनीतिक शुचिता के प्रतीक और शोषित व पीड़ित मानवता को समर्पित व्यक्तित्व को हासिल हुआ है। उनके 61वें जन्मदिवस के अवसर पर कामना है, कि वह शतायु हों।
ईएमएस/12 सितम्बर 2019