लेख

खुदा रब्बुल आलमीन है! (लेखक/ईएमएस - डा0 जगदीश गांधी)

03/05/2021

(‘माह-ए-रमजान‘ के अवसर पर विशेष लेख)
(रब्बुल आलमीन के मायने सारी सृष्टि को बनाने वाला परम पिता परमात्मा एक ही है)
इन दिनों रमजान का महीना चल रहा है। इस महीने में अल्लाह अपनी रहमत के दरवाजे खोल देता है और रोजेदारों की दुआ को कुबूल करता है। मनुष्य जिस मात्रा में अल्ला की राह में स्वेच्छापूर्वक दुःख झेलता है उसी मात्रा मंे उसे अल्ला का आशीर्वाद प्राप्त होता है। रमजान का महीना रहमतों, बरकतों, नेकियों और नियामतों का है। इस दौरान बंदगी करने वाले हर शख्स की ख्वाहिश अल्लाह पूरी करता है। रमजान का पवित्र अवसर समूची मानव जाति को प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश भी देता है। मौजूदा हालात में रमजान का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। यह पवित्र महीना सारी मानव जाति को प्रेरणा देता है कि कोरोना संक्रमण से अपना व दूसरों बचाव करते हुए अल्लाह, खुदा, गाॅड, ईश्वर, वाहे गुरू की इबादत, पूजा, प्रार्थना, प्रेयर करें ताकि देश सहित सारे विश्व को इस गंभीर वैश्विक महामारी से मुक्ति मिले।
इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक नवां महीना रमजान का होता है। इसमें सभी मुस्लिम समुदाय के लोग एक महीना रोजा रखते हैं। इन दिनों रमजान का पवित्र महीना चल रहा है। मुस्लिम समुदाय में रमजान को इसलिए भी खास माना जाता है क्योंकि इसी दौरान इस्लामिक पैगम्बर मोहम्मद के सामने कुरान की पहली झलक पेश की गई थी। लिहाजा रमजान को कुरान के जश्न का भी मौका माना जाता है। खुद को खुदा की राह में समर्पित कर देने का प्रतीक पवित्र महीना ‘माह-ए-रमजान’।
यह महीना हमदर्दी का है। इस महीने में हर रोजेदार को भूखे की भूख और प्यासे की प्यास का एहसास होता है। रोजे से आदमी में इंसानियत के प्रति हमदर्दी का जज्बा पैदा होता है। इस महीने में नेकी, हमदर्दी, सहयोग और भाईचारे का एहसास होता है। इस्लाम में रोजा को ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करना माना गया है। रोजे के दौरान रोजेदार पूरे दिन बिना कुछ खाए पिए रहते हैं। हर दिन सुबह सूरज उगने से पहले थोड़ा खाना खाया जाता है। इसे सेहरी कहते हैं, जबकि शाम ढलने पर रोजेदार जो खाना खाते हैं उसे इफ्तार कहते हैं।
पैगम्बर मोहम्मद ने उन बर्बर कबीलों के सामाजिक अन्याय के प्रति जिहाद करके समाज को उनसे मुक्त कराया। तथापि मानव जाति में भाईचारे की भावना विकसित करके आध्यात्मिक साम्राज्य स्थापित किया। मोहम्मद साहब का एक ही पैगाम था पैगामे भाईचारा। मोहम्मद साहब ने मक्का में जो लोग खुदा को नहीं मानते थे उनके लिए उन्होंने कहा कि वे खुदा के बन्दे नहीं हैं अर्थात वे काफिर हैं। इसी प्रकार जेहाद का मतलब अपने अंदर के शैतान को मारना है। वास्तव में मनुष्य जिस मात्रा मंे अल्ला की राह में स्वेच्छापूर्वक दुःख झेलता है उसी मात्रा मंे उसे अल्ला का प्रेम व आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मोहम्मद साहब ने अनेक कष्ट उठाकर बताया कि खुदा के वास्ते एक-दूसरे के साथ दोस्ती से रहो। आपस में लड़ना खुदा की तालीम के खिलाफ है। मोहम्मद साहब की शिक्षायें किसी एक धर्म-जाति के लिए नहीं वरन् सारी मानव जाति के लिए है। मोहम्मद साहब की बात को मानकर जो भी भाईचारे की राह पर चलेगा उसका भला होगा। मोहम्मद साहब ने अपनी शिक्षाओं द्वारा विश्व बन्धुत्व का सन्देश सारी मानव जाति को दिया।
मोहम्मद साहब की पवित्र आत्मा में अल्लाह (परमात्मा) के दिव्य साम्राज्य से कुरान की आयतें 23 वर्षों तक एक-एक करके नाजिल हुई। कुरान में लिखा है कि खुदा रब्बुल आलमीन है। आलमीन के मायने सारी सृष्टि को बनाने वाला अल्लाह एक ही है। अर्थात खुदा सारी सृष्टि को बनाने वाला है तथा इस संसार के सभी इन्सान एक खुदा के बन्दे और भाई-भाई हैं। इसलिए हमें भी मोहम्मद साहब की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए। परमात्मा ने मोहम्मद साहब के द्वारा ‘कुरान’ के माध्यम से मानव जाति को ‘भाईचारे’ का सन्देश दिया है। पवित्र कुरान में वैसे तो हजारों शिक्षायंे हैं किन्तु सभी मुख्य रूप से भाईचारे पर आधारित है। मोहम्मद साहब ने जो उपदेश दिये वे ‘हदीस’ में संगृहित हैं।
मानव सभ्यता का मानव जाति के पास जो इतिहास उपलब्ध है उसके अनुसार लगभग 7500 वर्ष पूर्व राम ने अपने जीवन द्वारा मर्यादा, लगभग 5000 वर्ष पूर्व कृष्ण ने गीता द्वारा न्याय, लगभग 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध ने त्रिपटक द्वारा सम्यक ज्ञान (समता), लगभग 2000 वर्ष पूर्व ईशु ने बाइबिल द्वारा करूणा, लगभग 1400 वर्ष पूर्व मोहम्मद ने कुरान द्वारा भाईचारा, लगभग 500 वर्ष पूर्व नानक ने गुरू ग्रन्थ साहिब द्वारा त्याग तथा लगभग 200 वर्ष पूर्व बहाउल्लाह ने किताबे अकदस के द्वारा हृदय की एकता की मुख्य शिक्षायें दी हैं।
ईश्वर एक है, धर्म एक है तथा सारी मानव जाति एक है। हम सभी परमात्मा की आत्मा के पुत्र-पुत्री हंै। इस नाते से सारी मानव जाति हमारा कुटुम्ब है। विश्व के लोग अज्ञानतावश आपस में धर्म के नाम पर आपस में लड़ते हैं। हमें उन्हें विश्व एकता की डोर से बाँधकर एक करना है। हमें बच्चों को बाल्यावस्था से ही यह संकल्प कराना चाहिए कि एक दिन दुनियाँ एक करूँगा, धरती स्वर्ग बनाऊँगा। विश्व शान्ति का सपना एक दिन सच करके दिखलाऊँगा। परमात्मा की ओर से अवतरित पवित्र पुस्तकों गीता, त्रिपटक, बाइबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे अकदस आदि का ज्ञान सारी मानव जाति के लिए हंै। यदि बच्चे बाल्यावस्था से ही पवित्र पुस्तकों में दी गई मुख्य शिक्षाओं को ग्रहण कर लें तो वे टोटल क्वालिटी पर्सन बन जायेंगे। इस नयी सदी में विश्व में एकता तथा शान्ति लाने के लिए टोटल क्वालिटी पर्सन (पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति) की आवश्यकता है।
ईएमएस/03मई2021