लेख

(गाँधी और संघ) संघ.... एक अनबूझ पहेली.....? (लेखक - ओमप्रकाश मेहता/ईएमएस)

08/10/2019

इस बार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की डेढ़ सौवीं जयंती पर बापू से ज्यादा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को याद किया गया। आज के सत्तारूढ़ दल के सबसे अधिक चहेते नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल ने केन्द्रीय गृहमंत्री रहते बापू की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया था, क्योंकि बापू के हत्यारे नाथूराम गोड़से ने कथित रूप से अपने आपको संघ का स्वयं सेवक बताया था। उसी संघ ने अपने सहयोगी सत्तारूढ़ संगठन भारतीय जनता पार्टी के साथ महात्मा गांधी की डेढ़ सौवीं जयन्ती का जश्न धूमधाम से मनाया था, दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि संघ भी गांधी पर राजनीति करने में पीछे नहीं रहा। वैसे 94 वर्षीय संघ का मात्र छः साल बाद शताब्दी वर्ष आने वाला है, संघ का जन्म 1925 में हुआ था और यदि 2024 के आम चुनाव में मोदी जी तीसरी बाद प्रधानमंत्री बन जाते है तो फिर संघ की सौवीं जयन्ती धूमधाम से मनेगी ही, किंतु इस चैरानवें वर्षीय वृद्ध संघ आज भी हर किसी के लिए अनबूझ पहेली ही बना हुआ है। स्वयं सरसंघ चालक डाॅ. मोहन भागवत जी ने ही संघ को अनबूझ पहेली बताने का खंडन करते हुए कहा कि ‘‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को आज तक कोई भी पूरी तरह से समझ नहीं पाया है ऐसा दावा करने वाले गलत है’’ अर्थात् डाॅ. मोहन भागवत को यह पता है कि संघ को अनबूझ पहेली उनके अपनों द्वारा ही माना जा रहा है? शायद इसकी वजह यह है कि देश पर राज कर रही संघ के नेतृत्व पर कभी विश्वास करने वाली पार्टी के सर्वे सर्वा ही संघ को कोई अहमियत नहीं देतें। अभी अभी ताजा उदाहरण एनआरसी का ही है संघ प्रमुख का सार्वजनिक व्यक्तव्य था कि किसी भी हिन्दू घुसपैठिये को भारत से बाहर नहीं किया जाएगा, जबकि भाजपा के सर्वोच्च नेता और गृहमंत्री अमित शाह कह रहे थे कि ‘‘घुसपैठिये तो घुसपैठिया है फिर वह चाहे किसी भी संप्रदाय का हो इसलिए किसी भी घुसपैठिये को भारत में नहीं रहने दिया जाएगा, सभी को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा’’, बाद में जब संघ व प्रधानमंत्री का दबाव पड़ा तब अमित भाई ने अपना कथन बदला और सिर्फ मुस्लिम घुसपैठियों को देश से बाहर करने की बात कही।
संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत ने गांधी जयंती पर ही यह भी कहा कि ‘‘महात्मा गांधी भी संघ व उसके स्वयं सेवकों के प्रशंसक थे।’’ अब 1948 में संघ और तत्कालीन कांग्रेस शासकों व पूज्य महात्मा गांधी के आपसी रिश्ते कैसे थे, इसकी गवाही देने वाला तो आज देश में कोई बचा नहीं है, बापू के हत्यारे नाथूराम गोड़से ने भी अ पनी बहुचर्चित पुस्तक में इस रहस्य को उद्घाटित नहीं किया, फिर भी यदि संघ के मौजूदा प्रमुख का यह तर्क मान भी लिया जाए तो सवाल यह पैदा होता है कि संघ के समर्पित स्वयं सेवक नाथूराम गोड़से ने अपने संगठन के प्रशंसक की हत्या क्यों की? और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध क्यों लगाया था? इन्हीं सब कारणों से संघ को अबूझ पहेली का दर्जा दिया गया है, कभी संघ को लेकर आज की कांग्रेस अध्यक्ष आशंकित रहती है और बगैर सरकार या भाजपा का नाम लिया कहती है कि ‘‘कुछ लोग चाहते है कि संघ भारत का प्रतीक बन जाए’’ अर्थात् कभी संघ को प्रतिबंधित करने वाला दल ही आज संघ से भयभीत नजर आ रहा है। यही नहीं कांग्रेस प्रमुख ने तो गांधी दर्शन को भी संघ की श्रेणी में रखकर उसे भी अनबूझ पहेली बता दिया। साथ ही वे यह कहने में भी नहीं चूंकि कि अकेली कांग्रेस पार्टी ही है जो गांधी के बताए रास्ते पर चल रही है, क्या कांग्रेस का यह चलन गांधी व उनके सिद्धांतों को विवादित प्रश्नों के घेरे में खड़ा नहीं करता?
इस प्रकार पूज्य राष्ट्रपिता की डेढ़ सौवीं जयंती पर गांधी जी के सिद्धांतों व उनके बताए मार्ग पर चलने की शपथ लेने के स्थान पर गांधी के घोषित व अद्योषित अनुयायियों ने ‘‘समग्र गांधी’’ के सामने ही प्रश्न चिन्ह खड़ाकर दिया और हमेशा की तरह ही इस पावन दिवस पर भी राजनीतिक नाटकों का मंचन किया गया। जिनमें गांधी के अपने और पराये सभी शामिल रहे।
जहां तक संघ का सवाल है, उसूलों के मामले में आज उसकी बराबरी में कोई संगठन नहीं है, अनुशासन, समर्पण और संगठन के मामलों में वह बेजोड़ है, वह अपने आपमें लाजवाब है, किंतु जब वह अपने उसूलों से हटकर राजनीति की राह पर चलने की कौशिश करता है तो उसके कदम लड़खड़ा जाते है और वह फिर ‘‘अनबूझ पहेली’’ बन जाता है।
ईएमएस/08 अक्टूबर2019