लेख

अर्पिता मुखर्जी : मैय्या मौ नहीं माखन खायें! (लेखक- विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन / ईएमएस)

06/08/2022

कभी कभी छोटे बच्चे के मुंह से कोई झूठ भोलेपन से बोली जाती हैं तब बरबस हंसी आ जाती हैं। कारण वह देखकर समझकर झूठ बोल रहा हैं। यह बात उस समय की हैं जब हमारे यहाँ छोटे घर होते थे और परिवार जनो की संख्या असीमित रहती थी। उस समय भी बड़े भाई से कोई पूछता छोटा भाई कहाँ गया तो वे कहते थे मुझे नहीं मालूम ,कहीं खेलने गया होगा। जैसे किसी जिले के मुखिया से पूछो महोदय उक्त घटना हो गयी तो वे कहते हैं ,देखता ,सम्बंधित से पूछता हूँ ,कारण जिला भी बहुत बड़ा होता हैं और जब एक घर की जानकारी नहीं रहती तब जिले की जानकारी पाने के लिए इतने विभागीय अमला लगा रहता हैं कारण इतने सारे विभागों से जानकारी इकठ्ठा करना कठिन और दुरूह कार्य हैं। ऐसे ही प्रदेश के मुखिया भी बहुत सी बातें से अनभिज्ञ रहते हैं उनको भी उनके सहायक सहयोग करते हैं।
कभी कभी साहित्यकारों को कोई सन्दर्भ ढूढ़ने बहुत समय लगता हैं कारण साहित्य अपरम्पार होता हैं। पर गुप्तचरी एक ऐसी विधा हैं जो किसी के पेट से क्या कहीं भी छुपा हुआ धन ,अपराधी हो उनसे बच नहीं सकता कारण गुप्तचरी राजा की तीसरी आँख होती हैं। वैसे राजा या बलशाली की मित्रता और शत्रुता नुकसानदायी होती हैं।
पश्चिम बंगाल के मंत्री का इ डी द्वारा छापा मारे जाने पर उनकी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी द्वारा यह कहा जाना की मुझे नहीं मालूम हैं कि मेरे घर में क्या होता रहा और कौन ने क्या किया ?बात बहुत सीमा तक ग्राह नहीं हैं। कारण कोई भी उनके दरवाजा को लांघ कर भीतर नहीं जा सकेगा। और उनको पता भी न चल पाए !कारण एक दिन का मामला नहीं हैं वर्षों का मामला हैं। और मंत्री से उनकी अंतरंगता बिना कुछ नहीं हो सकता। और अर्पिता इतनी नादान और भोली नहीं हैं कि मैय्या मौ नहीं माखन खायो। उनका बंगला राष्ट्रपति भवन तो नहीं होगा की कौन क्या कर रहा हैं।
वैसे हर अपराधी हमेशा यही कहता हैं की मैं इससे बहुत अनजान हूँ ,मैंने अपराध नहीं किया। हां यही क्षण मुसीबत बनता हैं कारण यदि आप स्वेच्क्षा से अपनी गलती मानकर उसको स्वीकार कर लो तो बहुत हद तक बचत हो जाती हैं। खुफ़िआ तंत्र पुख्ता सबूत के आधार पर कार्यवाही करता हैं और उसके बाद वह नहीं छोड़ता।
हर आदमी हो दो रोटी पेट के लिए चाहिए पर पेटी के लिए असीमित /अमर्यादित ऐसा क्यों ?मानव लोभ के वश अंतहीन तृष्णा के कारण मौत के मुंह में समा जाता हैं। सीमा रखो। और इतना सब रूपया -पैसा सोना- चांदी घर- बंगला का संग्रह कर भी लो वह भी किसके लिए ?बाल्मीकि से कोई शिक्षा नहीं लेता ,आज किसी के पाप में कोई भी भागीदारी /हिस्सेदारी नहीं बांटता /निभाता इस समय स्वयं
अपराधी और स्वयं जेल जाओ ,सजा काटो। सीमित भोजन हानिकारक नहीं होता।
अन्याय से धन कमाने की अपेक्षा दरिद्री रहना अच्छा ,जिस प्रकार दुबला मनुष्य मोटे होने के लिए शरीर में शोथ (सूजन चढ़ा ले उससे दुबला अच्छा।
क्यों इतनी लोभ की जरुरत हैं पर लोभ पाप का बाप बखाना ,इसी लोभ के कारण आज सजा भोग रहे हैं। पानी का धन पानी में और नाक कटी बेईमानी में।
सुख में सब साथी तो दुःख में भी मंत्री साथी हैं पर मुश्किल यह हैं की दोनों को अलग अलग रहना होगा।
ईएमएस / 06 अगस्त 22