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(विचार-मंथन) ईरान से टकराव की बजाय अमेरिका शिथिल करे प्रतिबंध तो बात बने (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

06/12/2018

वर्तमान समय अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को लेकर एक इतिहास रचने को आतुर नजर आ रहा है। दरअसल ईरान और अमेरिका के बीच पिछले कुछ समय से जो तनातनी चल रही थी अब वह अपने उच्चतम शिखर पर पहुंच गई है। इस टकराव के लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाए इस पर बाद में भी चर्चा हो सकती है, लेकिन यह तय है कि यदि अमेरिका ने और सख्ती दिखाई और जिस तरह की ईरान धमकी दे रहा है यदि वह उसे फलीभूत करने के लिए आगे बढ़ा तो वाकई स्थिति भयावह भी हो सकती है। दरअसल यहां देखना यह होगा कि अमेरिका परमाणु समझौते से हटने के बाद जिस तरह से ईरान पर पाबंदियां लगाता चला आया है उससे वह अब खिन्न हो चुका है और पूरी तरह से आर या पार के मूड में दिख रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका ने सबसे पहले तो खुद को ईरान के साथ हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते से अलग किया। उसके बाद अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए। ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से अलग होने की घोषणा करते हुए तब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि ‘मेरे लिए यह स्पष्ट है कि हम इस समझौते के साथ रहकर ईरान के परमाणु बम को नहीं रोक सकते। ईरान समझौता मूल रूप से दोषपूर्ण है, इसलिए मैं आज ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने की घोषणा कर रहा हूं।’ ट्रंप की इस घोषणा के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाएं भी हुईं और कोशिशें की जाने लगीं कि अमेरिका अपने फैसले पर पुन: विचार करे। बहरहाल जैसा कि होता आया है अमेरिका ने किसी की भी बात को सुनना उचित नहीं समझा और राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अनेक प्रतिबंधों वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दुनिया को संदेश दिया कि यदि अब कोई भी ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखेगा तो उसे भी भुगतान भुगतना पड़ेगा। इसकी जद में भारत जैसे विकासशील देश भी आते हुए दिखे। प्रतिबंधों के चलते भारत समेत अन्य देशों के सामने तेल आयात की सबसे बड़ी समस्या आन खड़ी हुई। इसलिए ईरान और अमेरिका के बीच जो हुआ उसे अंतर्राष्ट्रीय घटना का नाम दिया गया और बताया जा रहा है कि दुनिया की शांति के लिए यह सही नहीं हो रहा है। दरअसल यह ऐसी घटना साबित हुई है जिससे दुनिया की तमाम बड़ी ताकतों समेत विकासशील देशों की विदेश नीति भी प्रभावित होती हुई दिखी है। अब चूंकि अमेरिकी प्रतिबंध प्रभावी हो रहे हैं अत: ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी ने धमकी भरे लहजे में कहा है कि 'अमेरिका को मालूम होना चाहिए कि वह ईरान से तेल के निर्यात को रोक नहीं सकता है। अगर वह ऐसा करने की कोशिश भी करता है तो फारस की खाड़ी से तेल का निर्यात नहीं हो सकेगा।' इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि यदि अमेरिका नहीं माना तो ईरान खाड़ी के रास्ते को अवरुद्ध कर देगा, जिसका खामियाजा अनेक देशों को उठाना पड़ सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा होने पर टकराव की स्थिति और जटिल हो जाएगी और एक तरह से अमेरिका और ईरान समेत अन्य देश आमने-सामने खड़े दिखाई देंगे। गौरतलब है कि खाड़ी के कई देश इस रास्ते से बड़ी मात्रा में अन्य देशों के लिए कच्चे तेल का निर्यात करते चले आ रहे हैं। अब यदि ईरान खाड़ी देशों का रास्ता रोकने के लिए कोई बड़ा कदम उठाता है तो इन देशों के साथ ही साथ अन्य तेल आयातक देशों को भी खासी परेशानी हो जाएगी। गौरतलब है कि इन खाड़ी देशों में बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। ऐसे में यदि फारस की खाड़ी का रास्ता रोक दिया जाता है तो सऊदी अरब से होने वाले व्यापार पर भी विपरीत असर पड़ना तय है। गौर करें तब क्या होगा जबकि सऊदी भी तेल निर्यात नहीं कर पाएगा, तब भारत जैसे देश को भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। तब तेल की कमी और महंगा तेल पूरी अर्थव्यवस्था को ही चरमरा कर रख देगा। इस समय सऊदी दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है, इसलिए ईरान की धमकी और अमेरिका का अपने फैसले पर अड़े रहने का असर उस पर सबसे ज्यादा दिखाई देगा। एक बार फिर खाड़ी विवाद देखने को मिलेगा और तब 1980 से 88 के बीच वाली स्थिति दोहराई जा सकती है। दरअसल तब खाड़ी विवाद के चलते दोनों देशों ने एक दूसरे के तेल के जहाजों पर हमले करके दोनों ही देशों के तेल निर्यात को अवरुद्ध करने की भरपूर कोशिश की थी। अब जबकि 2015 में तेहरान के परमाणु समझौते से अलग होने के बाद अमेरिका ने दोबारा प्रतिबंध लगा दिए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी कि खाड़ी समस्या दोबारा जन्म ले ले। अमेरिकी प्रतिबंध से उठती समस्या को देखते हुए ही बाद में आठ देशों को ईरान से तेल आयात के लिए अस्थाई छूट अमेरिका ने दी, लेकिन ईरान के राष्ट्रपति रूहानी ने जो धमकी दी है उससे यह संदेश जा रहा है कि न तो अमेरिका पीछे हटने वाला है और न ही ईरान ही और प्रतिबंधों को सहन ही कर सकता है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सजगता की आवश्यकता है और कोशिश की जानी चाहिए कि अमेरिका प्रतिबंधों में शिथिलता बरतते हुए एक बार फिर परमाणु समझौते की ओर लौटे क्योंकि इसी में सभी की भलाई है।
06दिसम्बर/ईएमएस