लेख

त्रिशंकू लोकसभा का किंगमेकर कौन होगा ? (लेखक-डॉ. भरत मिश्र प्राची / ईएमएस)

16/05/2019

देश में 17वीं लोकसभा गठन हेतू वर्श 2019 में हो रहे आम चुनाव अंतिम पड़ाव पर है जहां इस लोकतंत्र पर्व के अंतिम दौर सातवें चरण का चुनाव 19 फरवरी 19 को होना शेष रह गया । अब तक के हुये मतदान में लोकसभा गठन हेतु किसी भी एक दल को स्पश्ट बहुमत आता नजर नहीं आ रहा है। चुनाव पूर्व आ रहे अधिकांश सर्वेक्षण भी इसी ओर संकेत दे रहे है। इस तरह के उभरे हालात में त्रिशंकू लोकसभा का किंग मेकर कौन होगा ? इस तरह के प्रश्न आज के परिवेश में महत्वपूर्ण बन गये है जहां मीडिया में फिर से मोदी सरकार की वापसी की बात भी जोर - शोर से की जा रही है।
देश में हो रहे 2019 के लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक सीट उत्तर प्रदेश में 80 है जहां गठबंधन की राजनीति चुनाव परिणाम को इस बार विशेष रूप से प्रभावित कर रही है जिससे इस राज्य से 2014 जैसे परिणाम आने की उम्मीद नहीं की जा रही है। आज तक केन्द्र की राजनीति की दिशा इसी राज्य से तय की जाती रही है । इस परिवेश में दूसरे नं. पर बिहार राज्य का स्थान आता है जहां लोकसभा की 40 सीटे है, यहां भी गठबंधन की राजनीति केन्द्र की राजनीति को प्रभावित कर रही है। तीसरे नं. पर पं. बंगाल, उड़िसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू एवं तेलगांना राज्य है जहां क्षेत्रीय दलों का प्रभाव है। इन राज्यों से भी त्रिशंकू लोकसभा की स्थिति में किंग मेकर की भूमिका उभर सकती है। इस बार हिन्दी प्रदेश के तीन राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन हुआ जहां कांग्रेस की सरकारें गठित हुई है, जहां से 2014 में लोकसभा की सर्वाधिक सीटें भाजपा के पक्ष में गई थी, पर 2019 के लेकसभा चुनाव में वे आकडे इस बार भाजपा के पक्ष में आते नजर नहीं आ रहे है जिससे केन्द्र में भाजपा का बहुमत का गणित गड़बड़ा सकता है।
चुनाव उपरान्त जो भी स्थिति उभर कर सामने आती है, उसके लिये वर्तमान केन्द्र की सरकार पूर्णरुपेण जिम्मेवार है जो आवाम को अपने काम से संतुश्ट नहीं कर पाई। यदि इस बार त्रिशंकू की स्थिति उभरती है तो यह स्थिति बेहतर लोकतंत्र की दिशा में सही नहीं मानी जा सकती है। इस तरह के उभरे परिवेश में सौदे की राजनीति उभर कर सामने आती है जो लोकतंत्र में कभी भी अस्थिरता पैदा कर सकती है। इस बार के चुनाव में कांग्रेस की राजनीति में प्रियंका गांधी के प्रवेश से कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव से बेहतर परिणाम आने के भी आसार बनते नजर आ रहे है जो आगे चलकर कांग्रेस की दिशा और दशा तय करेंगे । त्रिशंकू लोकसभा की स्थिति में प्रधानमंत्री पद पर परिवर्तन होने के भी आसार उभर कर सामने आ रहे है। जिसे नकारा नहीं जा सकता। इस दिशा में केन्द्र में सत्ताधारी भाजपा के ही वरिश्ठ राजनेताओं के चुनाव के दौरान आ रहे विपरीत विचार जो वर्तमान नेतृत्व को कहीं न कहे से नकारते नजर आ रहे है।
इस बार के लोकसभा चुनाव में कई बातें पूर्व आम चुनाव से अलग देखने को मिल रही है। आम चुनाव के दौरान चुनाव सम्पन्न होने से पूर्व किसी भी तरह के सर्वेक्षण किये जाने पर रोक चुनाव आयोग द्वारा पूर्व में लगाई जाती रही है पर इस बार आमचुनाव होने के दौरान सर्वेक्षण खुले रूप से देखने को मिल रहा है जो चुनाव को प्रभावित कर सकता है। चुनाव के दौरान किसी के मत जानने एवं पूछना चुनाव प्रक्रिया के विरूद्ध है पर इस बार के चुनाव में खुले तौर पर मीडिया के जनप्रतिनिधियों द्वारा आम मतदाताओं से मत अर्थात वोट के बारे में जानकारी ही केवल नहीं ली जा रही बल्कि उसकी जाति भी पूछी जा रही है। चुनाव के दौरान ही सीबीआई के छापे क्यों डलवाये जाते ? इस तरह के उभरते हालात चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ है पर चुनाव आयोग इस तरह के मामले पर मौन है आखिर क्यों ?
आम लोकसभा चुनाव के बाद भले ही किसी की सरकार गठित हो पर लोकतंत्र की परिधि में उभरती अस्थिरता एवं कमजोर विपक्ष की स्थिति लोकतंत्र के हित में कदापि नहीं हो सकती। इससे देश में विकास का हो पाना कतई संभव नहीं । देश में वोट के लिये झांसे भरी तुश्टीकरण की राजनीति एवं मुत की रेवड़ियां बांटने का सिलसिला भी आमजन को समस्याओं से निजात नहीं दिला सकता। आज देश के बेरोजगार युवा पीढ़ी के लिये बेरोजगारी भत्ता नहीं रोजगार चाहिए, रोजगार के लिये उद्योग चाहिए। किसानों को कर्ज से राहत नहीं फसलों का उचित मुआवजा चाहिए। आमजन को महंगाई से निजात के लिये बाजार पर नियंत्रण एवं टैक्स भार से मुक्ति चाहिए। इन सब चीजों के लिये सत्ता परिवर्तन बार - बार होता रहा है पर जनता को झांसे के सिवाय कुछ हाथ नहीं आया। जब तक लोकतंत्र पर माफियाओं का शिकंजा हावी रहेगा, इस तरह की समस्याओं से देश की आमजन को राहत नहीं मिल सकेगी। इस तथ्य को समझना होगा आखिर देश में सत्ता परिवर्तन बार - बार क्यों होता है ? लोकतंत्र की सही दिशा एवं दशा कब तय होगी ? इस पर मंथन होना चाहिए।
16मई/ईएमएस