लेख

' भारत" देश के नामकरण में भ्रांतियां ! (लेखक- डॉक्टर अरविन्द जैन)

05/12/2018

आज एक वीडियो देखने मिला जिसमे "साहित्य आजतक "में फिल्म अभिनेता अन्नू कपूर से वार्ता हो रही थी। जैसा की अन्नू कपूर की वक्ताशैली बहुत प्रभावकारी होती हैं और वे लेखक भी हैं। उन्होंने बहुत जोश खरोश में भारत का नाम दुष्यंत और शकुंतला के नाम से हुई संतान भरत से कहकर पुष्टि की। इस बात पर मेने गौर से सुनकर कलम उठाने का प्रयास किया और समाज में इस प्रकार की भ्रांतियों को दूर करना मेने उचित समझा।
भारत वर्ष का नाम जैन धर्म के संस्थापक तीर्थंकर ऋषभदेव थे। जिसका उल्लेख नाभिपुत्र और ऋषभपुत्र भरत की चर्चा सभी हिन्दू पुराणों में होती हैं। मार्कण्डेय पुराण अध्याय ९०,कूर्म पुराण अध्याय ४१, आदि पुराण अध्याय १०,वायुपुराण अध्याय ३३, गरुण पुराण अध्याय १,ब्रहांड पुराण अध्याय १४, वाराह पुराण अध्याय ७४, लिंग पुराण अध्याय ४७, विष्णु पुराण अध्याय १ और स्कन्द पुराण वुभार खंड अध्याय ३७ में ऋषभ देव का वर्णन आता हैं। इन सभी में ऋषभ को नाभि और मरुदेवी का पुत्र कहा हैं। ऋषभ के सौ पुत्र उतपन्न हुए, उनमे से बड़े पुत्र भरत को राज्य देकर ऋषभ ने प्रव्रज्या ग्रहण की। इसी भरत से इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।
नाभि स्तवजनपत पुत्रं मसदेव्यां महाह्युति:!
ऋषभं पार्थिव श्रेष्ठम सर्वक्षत्रस्य पूर्वजं !!
ऋषभाद भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशतेशुज : !
सो आ भिषिच्यषरभः पुत्रं महा प्रव्रजिमास्थित: !!
हिमाहाँ दक्षिणम वर्ष तस्य नाम्ना विंदुबुरधीः!
भागवत पुराण में ऋषभावतार में पूरा वर्णन हैं और उनके उपदेश से जैन धर्म की उत्पत्ति बतलाई हैं।
बाहिषि तासिमन्ने विष्णुदत्त भगवान परमऋषिभिः प्रसादितो नामे:
प्रियविकीषरया तद वरोधावने मसदेज्यां धरमां दशयितुकाभौ
वातरशनानां श्रमणाम शोणा मध्य्व्र मंधिनाम शुवकल्या
तनुवावततार २० स्व पू. अध्याय ३१
इस बात की पुष्टि अनेको इतिहासकार, चिंतक दार्शनिकों ने भी किया हैं। और यजुर्वेद में ऋषभदेव, अजितनाथ और अरिष्टनेमि का उल्लेख किया गया हैं। भगवत पुराण में भी इस बात का समर्थन किया गया हैं।
मेजर जे सी आर फ़र्लांग ने कहा हैं की जैन धर्म का आरम्भ को जान पाना असंभव हैं। इसी तरह यह भारत का सबसे पुराना धर्म मालूम होता हैं। (दी शॉर्ट हिस्ट्री इन साइंस ऑफ़ कम्पेरेटिव रिलिजन पेज १४)
मह्यमहोपाध्याय राम मिश्र शास्त्री का कथन हैं की जैन धर्म तब से प्रचलित हैं जबसे श्रष्टि का आरम्भ हुआ हैं। इससे मुझे किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं हैं की जैन दर्शन वेदांतादि दर्शनों से पूर्व का हैं। ( जैन इतिहास का लोकमत )
भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा बताया गया हैं की जैन परम्परा के अनुसार जैन दर्शन का उद्गम ऋषभदेव से हुआ हैं, जिन्होंने कई शताब्दियों पूर्व जन्म धारण किया था, इस प्रकार के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं जिसके आधार पर कहा जा सकता हैं की ईशा पूर्व भी ऐसे लोग थे जो ऋषभदेव की पूजा करते थे, जो सबसे पहले तीर्थंकर थे। इसमें कोई संदेह नहीं हैं की वर्धमान एवं पार्श्वनाथ से भी पूर्व जैन धर्म प्रचलित था। यजुर्वेद में तीन तीर्थंकरों काउल्लेख हैं -ऋषभदेव, पार्श्वनाथ और अरिष्ट नेमि। भागवत पुराण भी इस बात का समर्थन करता हैं की ऋषभदेव जैन धर्म के संस्थापक थे। ( भारतीय दर्शन भाग -१ पेज २३३ )
श्री स्टीवेंसन का कथन जब जैन और ब्राह्मण दोनों ही ऋषभदेव को इस अल्पकाल में जैन धर्म का संस्थापक मानते हैं तो इस मान्यता को अविश्वनीय नहीं कहा जा सकता हैं, (ऋषभ सौरभ पेज २९ )
इस प्रकार आज भी बुद्धिजीवी भी भ्रांतिया पालकर गलत जानकारी देते हैं और उनसे साक्षातकार लेने वाले भी आधी अधूरी जानकारी के कारण उनका समर्थन कर जनता को गुमराह करते हैं। इसके लिए प्राचीन साहित्य के साथ नवीनतम इतिहास का भी अध्ययन करना चाहिए। इस बात की जानकारी आजतक को भी जा रही हैं। इस सम्बन्ध यदि किसी को और जानकारी चाहिए हो तो उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
डॉक्टर अरविन्द जैन/05 दिसंबर2018