लेख

(विचार-मंथन) संक्रमण की गंभीर चुनौतियां (लेखक-सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

02/05/2021


संक्रमण के तेजी से बढ़ते मामलों ने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। देश जिस अपूर्व संकट से गुजर रहा है, वैसा शायद कई दशकों में नहीं देखा गया। अस्पतालों में बिस्तरों, दवाइयों और आक्सीजन सिलेंडरों की भारी कमी पड़ गई है। यह स्थिति किसी एक राज्य की नहीं बल्कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्यप्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा जैसे कई राज्यों के हालात चिंताजनक हैं। दैनिक संक्रमितों का आंकड़ा 4 लाख तो पार कर ही गया और तीन लाख पहुंचने का अंदेशा है। हम अमेरिका से भी ज्यादा भयानक स्थिति में हैं। गौर इस बात पर करने की जरूरत है कि आज लोग सिर्फ संक्रमण से दम नहीं तोड़ रहे, बल्कि समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है, इसलिए मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है। जरूरतमंदों को आक्सीजन नहीं मिल रही है। रेमडेसिविर जैसी दवाओं की भारी कमी है और इसकी कालाबाजारी हो रही है। अस्पतालों में अब और जगह नहीं बची है। ये हालात बता रहे हैं कि हम कुछ भी खास नहीं कर पाए। जब संक्रमितों का आंकड़ा दो से तीन लाख तक जाने का अनुमान था तो आक्सीजन और दवाइयों के बंदोबस्त क्या पहले से नहीं किए जाने थे? अगर चीजें उपलब्ध रहतीं तो हजारों जानें बचाई जा सकती थीं। अभी देश महामारी से बुरी तरह जूझ रहा है। अस्पतालों में बिस्तर, दवाइयों और आक्सीजन के लिए भारी मारामारी है। आक्सीजन सिलेंडरों की लूटपाट होने तक की खबरें आ रही हैं। दिल्ली सहित ज्यादातर राज्यों के अस्पतालों में आक्सीजन की भारी किल्लत अभी भी बनी हुई है। आक्सीजन नहीं मिल पाने से अस्पताल मरीजों को भर्ती नहीं कर रहे हैं। कई अस्पताल अपने यहां बिस्तरों की संख्या इसीलिए कम करते जा रहे हैं क्योंकि आॅक्सीजन नहीं है। निजी अस्पताल रो-रो कर बता रहे हैं कि उनके यहां विकट हालात हैं। भर्ती मरीजों की जान सांसत में है। ऐसे में एक सवाल यह भी है कि जब अस्पताल मरीजों को भर्ती ही नहीं करेंगे तो लोग जाएंगे कहां? इतनी भयंकर अराजकता देश ने कभी देखी हो, याद नहीं पड़ता। हालात बता रहे हैं कि सरकारें पूरी तरह से लाचार हो चुकी हैं और लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया है। ऐसे में जरूरत है कि अस्पतालों को जहां से, जैसे भी और जिस कीमत पर आक्सीजन उपलब्ध कराई जा सके, करवाई जाए। आक्सीजन मुहैया कराने के लिए स्थानीय स्तर पर फौरन कोशिश होती तो अस्पताल एक-एक घंटे की आक्सीजन पर नहीं चल रहे होते। हालत यह है कि फिलहाल जितनी भी आक्सीजन जहां पहुंच रही है, वह सैंकड़ो किलोमीटर दूर से ही रेल और टैंकरों के जरिए आ रही है। जिन राज्यों में आक्सीजन संयंत्र कम हैं, वहां यह संकट ज्यादा गहरा है। कहने को केंद्र ने पिछले दिनों आॅक्सीजन के उत्पादन, आपूर्ति और क्रायोजनिक टैंकरों के आयात के लिए नीतिगत कदम उठाए हैं। लेकिन इनका असर दिखने में तो अभी बहुत समय लग जाएगा। तब तक हालत और भयावह हो जाएंगे। अगर अस्पताल अपने स्तर पर आॅक्सीजन का बंदोबस्त नहीं कर पाए, जैसा कि हो भी रहा है, तो हर पल मरीज दम तोड़ते रहेंगे। आज के हालात के लिए ज्यादा जिम्मेदार वह शासन तंत्र है जिसे जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ जिम्मेदारी सौंपी थी। इस वक्त हालत यह है कि लोग संक्रमण से कम, व्यवस्था की खामियों और लापरवाही से ज्यादा मर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि केंद्र और राज्य इस हकीकत से अनजान रहे होंगे कि आने वाले वक्त में देश को कितनी आक्सीजन की जरूरत पड़ेगी।
02मई/ईएमएस