लेख

(विचार-मंथन) भारत की रुस से बढ़ती दूरियों का सबब और समाधान (डॉ हिदायत अहमद खान/ईएमएस)

13/03/2019

जिसके पास सच्चा दोस्त है वह दुनिया का सबसे अमीर आदमी है। इस सोच को यूं समझें कि दुनिया के अधिकांश विचारकों का यही मानना रहा है कि यदि आपके पास एक सच्चा मित्र है तो आपको जिंदगी में आने वाले संकटों की परवाह नहीं करना चाहिए और लगातार आगे बढ़ते चले जाना चाहिए। दरअसल विपत्ती के समय दोस्त आपके साथ खड़ा दिखाई देता है, आपकी हिम्मत बढ़ाता है, हर तरह की मदद करता है और वह आपका अहित होने नहीं देता है। इस मामले में भारत धनवान रहा है, क्योंकि शुरु से ही उसे रुस जैसा सच्चा मित्र मिला। एक सच्चे मित्र देश के तौर पर रुस सदा से ही भारत के साथ खड़ा दिखाई देता रहा है। दुनिया में तो भारत-रुस मित्रता की मिसालें दी जाती रही हैं, लेकिन अब अहसास हो रहा है कि वैचारिक धरातल में बदलाव के साथ ही साथ देश और दुनिया के बदलते हालात ने दो मित्र देशों में दूरियां ला दी हैं। इस बात का एहसास सिप्रि अर्थात् स्कॉटहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट पढ़ने के बाद होता है। दरअसल रिपोर्ट बता रही है कि भारत ने मित्र देश रुस से हथियार खरीदना कम कर दिया है। सिप्रि द्वारा जारी 'अंतर्राष्ट्रीय हथियार लेन-देन का रुख-2018' नामक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत द्वारा रुस से हथियार खरीदी 42 फीसदी तक गिर गई है। ये आंकड़े भारत को रुस द्वारा 2009-13 और 2014-18 के बीच किए गए हथियार निर्यात पर आधारित हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि रुस से हथियारों का भारत में जो आयात 76 फीसदी था वह अब घटकर करीब 58 फीसदी रह गया है। इस प्रकार एक पुराने दोस्त पर ऐतवार करने की बजाय नए दोस्त बनाने के चक्कर में भारत ने यह सब किया है, जिससे भरोसेमंद मित्र के खफा होने की भी बातें की जा रही हैं। सबसे जरुरी बात यह है कि ये बातें ऐसे समय में हो रही हैं जबकि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का दौर चल रहा है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना द्वारा पीओके और बालाकोट स्थित आतंकी ठिकानों पर की गई कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान की इमरान सरकार और पाक सेना बौखलाई हुई है। एयरस्ट्राइक से शर्मिंदगी महसूस कर रही पाकिस्तान की वायुसेना ने भारतीय सीमा पर घुसने की भी गुस्ताखी की है और भारतीय विमान के गिरने के साथ विंग कमांडर अभिनंदन को गिरफ्तार करने और फिर नाटकीय ढंग से छोड़े जाने से भी मामला गर्माया हुआ है। ऐसे में भारत और रुस के रिश्तों को लेकर जारी रिपोर्ट विशेष मायने रखती है। दरअसल इससे पहले तक रुस ने हर संकट की घड़ी में भारत की मदद की है, लेकिन अब दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में दरार की बातें आम हो गई हैं और उसका मुख्य कारण अमेरिका व अन्य देशों से हथियार खरीदना रहा है। आखिर यह कौन नहीं जानता कि इस समय चीन पाकिस्तान को अंदरुनी तौर पर मदद कर रहा है। उसने पाकिस्तान को आर्थिक गलियारे से जोड़ने के नाम पर इस्लामाबाद तक अपनी पैठ बना ली है, जिससे अमेरिका भी खफा होता हुआ दिखाई दिया है। कहा तो यहां तक जाता रहा है कि पाकिस्तान का चीन के करीब जाना ही उसकी आर्थिक पाबंदी का कारण बना है, जबकि सच तो यह है कि पाकिस्तान ने अपनी जमीन पर अनेक आतंकवादियों को पनाह देने से लेकर उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देने तक का काम किया है। इसे दुनिया जानती और मानती चली आ रही है और लगातार दबाव बनाया जाता रहा है कि पाकिस्तान को मजबूर किया जाए कि वो अपने देश में मौजूद आतंकी ठिकानों को खत्म करे, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका है। इसके चलते पड़ोसी देश परेशान हैं। इसी का नतीजा है कि भारत में सीमापार से आतंकवादियों की घुसपैठ होती रहती है और तब-जब हमले भी हो जाते हैं, जिस कारण हमारे जवान शहीद होते रहे हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार आतंकी हमले में पाकिस्तानी नागरिक के हाथ होने या उसकी जमीन का हमले के लिए इस्तेमाल होने का सुबूत मांगता है और फिर बात आई-गई बाली हो जाती है। इस मामले में भी वही हो रहा है, लेकिन इससे क्या क्योंकि पाकिस्तान को तो चीन का साथ मिला हुआ है। जहां तक अमेरिका की बात है तो वो सदा से कहता कुछ है और करता कुछ है। पाकिस्तान के मामले में भी उसने आर्थिक पाबंदी लगाई लेकिन उन देशों को कुछ नहीं कहा जो अब पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आ चुके हैं। इस प्रकार पिछले दरबाजे से वह पाकिस्तान को कहीं न कहीं सहयोग करता हुआ नजर आता है। वह आतंक की आड़ में कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने की भी बात करता है। इसलिए अब इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि भारत हथियार किससे आयातित करे, क्योंकि मित्र कभी संकट खड़ा नहीं करते, बल्कि उसका समाधान तलाशने में मदद करते हैं। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया में हथियार खरीददारी में भारत की हिस्सेदारी 10 फीसदी की बैठती है, ऐसे में भारत सरकार को भी विचार करने की आवश्यकता है कि वित्त वर्ष 2014 से 18 तक अमेरिका, फ्रांस और इजरायल से जो हथियार खरीदी की गई है उससे कहीं हमने अपने सच्चे और अच्छे मित्र रुस को खोने का काम तो नहीं किया है। यदि हथियार खरीदी से दो देशों के पुराने रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं तो इस पर पुन: विचार किया जाना चाहिए। जहां तक रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने की आवश्यकता है तो इसके लिए आतंकवाद के खात्में को केंद्र में रखकर रुस का सहयोगी बनना बेहतर होगा। खासतौर पर तब जबकि हमारी नीति तटस्थ रहने की हो तो हमें अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी या चीन जाने की बजाय रुस से मित्रता बनाए रखना उचित होगा। शांति के रास्ते पर अग्रसर होकर विकास करना हमारा ध्येय होना चाहिए, तभी हम आत्मनिर्भर बन सकेंगे, अन्यथा ये हथियारों के सौदागर हमें भी युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा करेंगे, क्योंकि उन्हें तो अपने महंगे हथियारों को दूसरे देशों में खपाना जो है।
ईएमएस/13/03/2019