लेख

अमित शाह पुलिस को उसकी दासता से मुक्त कर सकेंगे...! (लेखक-नईम कुरैशी / ईएमएस)

11/06/2019

भारत में आजादी के बाद से ही पुलिस तंत्र को सियासतदां अपना गुलाम बनाकर रखते आये हैं जिससे पुलिस आम आवाम की सुरक्षा न करके सियासतदां के इशारों पर उनके सियासी स्वार्थ पूरी करती दिखाई देती रही है। उत्तर प्रदेश पुलिस इस मामले में सबसे आगे आकर महिलाओं, दलितों व अल्पसंख्यक मुसलमानों पर जुल्म करती आई है। 1972 में मेरठ के पास उत्तर प्रदेश पुलिस ने माया त्यागी नामक महिला के पति की हत्या कर उसे सरेराह बेइज्जत करा था। उसके गुप्तांगों में डंडा डालने तक का लोमहर्षक काण्ड किया था पर सियासतदां इस काण्ड में भी पुलिस को संरक्षण देते रहे थे। न्यायालयों की सुस्त चाल से 30 साल बाद इसके गुनहेगारों को कुछ दण्डित कराया जा सका था।
उत्तर प्रदेश व बिहार व कुछ मध्य प्रदेश में भी पुलिस अत्याचारों को राजनेता लगातार संरक्षण देते आ रहे हैं। अपना डी.जी.पी. बनाकर अपने बन्दे को जोन आई.जी. बनवाकर ये लोग अपने दबंगों से जनता पर अत्याचार कराना बीमारू राज्यों के सियासतदां की आदत रही है क्योंकि यहां पर सियासतदां तो पुराने राजे रजवाड़े बड़े सामंत ही रहे हैं व वर्तमान में हैं। उधर सर्वोच्च न्यायालय लगातार पुलिस सुधार की सिफारिशें सीधे राज्यों व केन्द्र सरकारों को देता आ रहा है पर वो सब ठंडे बस्तों में डाला जाता रहा है। पुलिस सुधार सियासतदां इसलिये भी नहीं कराना चाहते क्योंकि उससे उनकी पुलिस पर से पकड़ खत्म हो जायेगी। थानेदार से लेकर आई.जी., डी.जी.पी. तक उनके गुलाम की तरह देखे जाते रहे हैं। उनके सभी जायज व नाजायज काम पुलिस वाले रात के अन्धेरे में तो क्या उजाले में करते दिखाई देते हैं। एक विधायक व सांसद चन्द घंटे में अपने इलाके में मर्जी का थानेदार गृहमंत्री से कहकर पदस्थ करवा देते हैं पर अच्छी छवि के थानेदार को एस.पी., आई.जी. हतों महीनों पत्र लिखकर नहीं उचित जगह पदस्थ करा पाते हैं।
मध्य प्रदेश में खदानों की रेत की लूट में भा.ज.पा. वाले व कांग्रेसी दोनों बराबर से शामिल हैं। इसी तरह आम तौर पर देखा गया है कि जमीनों के घोटालों, खनिज लूट व जंगलों की लूट कांग्रेसियों ने कुछ कम नहीं की। शिवपुरी के एक कांग्रेसी सियासतदां ने आदिवासियों के नाम पर करोड़ों व अरबों की खनिज लूटी जिसकी शिकायत दमोह के समाजसेवी व पत्रकार संतोष भारती ने सर्वोच्च न्यायालय तक से ही पर फिर भी उस पर पूरी तौर अमल सियासतदां ने नहीं होने दिया। 1999-2000 में ग्वालियर आयुक्त रहे विमल जुल्का ने इस मामले में दबाव के चलते ठीक रिपोर्ट तक नहीं न्यायालयों को भेजीं। मुलजिमों का सियासतदां के दबाव में साथ उन्हें देना पड़ा था क्योंकि उन्हें ग्वालियर संभाग का आयुक्त जो बने रहना था।
पुलिस व राजस्व मेहकमे के पटवारी, तहसीलदारों का उपयोग अपने हित में करने का खुला खेल उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान में देखा जा सकता है। राजस्थान के धौलपुर से तो इंडियन एक्सप्रेस के एक पत्रकार ने कमला नामक महिला को खरीदकर ये सिद्ध कर दिया था कि राजस्थान धौलपुर व मध्य प्रदेश के मुरैना में सरेआम दलित व कमजोर महिलायें खरीदी व बेची जाती हैं। यदि पुलिस निष्पक्ष व निर्भय हो तो इन पर लगाम लगाई जा सकती है। क्या केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह पुलिस सुधार लागू कराके सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन करवा पायेंगे? लगता है वो इसे लागू जरूर करायेंगे जिससे पुलिस आजादी से काम करके असामाजिक लोगों को कानून की धाराओं में जकड़ा जा सकेगा और कुछ सामाजिक न्याय का पक्ष मजबूत शायद हो सके।
केन्द्रीय गृह मंत्रालय यदि सक्रिय व जागरुक हो तो देशभर की पुलिस का नजरिया भी कुछ बदल सकता है। भले ही पुलिस का मामला राज्स सरकारों का विषय है पर राष्ट्रीय एकता सद्भावना के लिये केन्द्र सरकार की सलाह मानना भी राज्यों को जरूरी होता है। केन्द्र सरकार ही सारी राज्य सरकारों को पुलिस व शिक्षा के लिये 80 फीसद तक आर्थिक मदद करती है। आई.बी., सी.बी.आई. भी सब जानते हैं केन्द्र के आधीन होते हैं। जो राज्य सरकारों को समय-समय पर सलाह व मार्गदर्शन करता ही है। सूबों में पुलिस महानिर्देशक से लेकर पुलिस अधीक्षक तक की पदस्थापना में सियासत चलायी जाती है। नियम व कानूनों को सरेआम मुंह चिड़ाया जाता रहा है जिससे पुलिस थानों में सरेआम धारायें बिकती दिखाई देती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस महानिर्देशक की पोस्टिंग के लिये स्पष्ट निर्देश जारी किये हैं व पुलिस जनता के बीच मामलों की शिकायतें निपटाने हेतु भी आयोग बनाने की सर्वोच्च न्यायालय की सलाह को 7-8 सूबों की सरकार ने ही लागू किया है फिर भी न्यायालय बाकी सरकारों को ज्यादा कुछ नहीं करा सका है। अमित शाह इस मामले में यदि जागरुक रहे व सक्रिय रहे तो आम जनता को लाभ जरूर संभव होगा। दलित, पिछड़ों, महिलाओं को कुछ वास्तविक न्याय भी शायद कुछ मिल सकेगा। आम तौर पर देखा गया है कि कुछ एस.पी. लोग मध्य प्रदेश में सियासी फायदे के लिये कमजोर तब्कों, दलितों व मुसलमानों पर जुल्म करते देखे गये थे जो शिवराज सिंह के दौर में जनसम्पर्क मेहकमे में भी रखे गये थे। देशभर के 1200 आय.पी.एस. अफसरों के आचरणों की जांचें जारी हैं। उनके खिलाफ शीघ्र कार्यवाही का निर्णय होना चाहिये वरना गलत संदेश जायेगा। जिन्हें न्याय दिलाने को रखा गया था वो ही अन्याय करते व कराते देखे जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में भी 40-50 आय.पी.एस. ऐसे हैं कुछ ए.डी.जी. स्तर की महिलायें भी देखी जा रही हैं।
11जून/ईएमएस