लेख

भारतीय संस्कृति से सम्रद्ध है नेपाल भी! (लेखक/ईएमएस -डा श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट)

22/02/2021

भले ही नेपाल एक अलग देश हो
लेकिन नेपाल में भारतीय संस्कृति की धारा बहती है।पिछले दिनों राजनीतिक रूप से रिश्तों में तल्खी के बावजूद भारत और नेपाल के आम लोगो को इसी संस्कृति ने एक बनाये रखा।कई मायनों में नेपाल भारत पर निर्भर है तो भारत को भी एक अच्छे पड़ोसी के रूप में नेपाल की आवश्यकता है।
नेपाल और भारत के बीच आने जाने के लिए उपलब्ध कानूनी सुगमता भी नेपाल को भारत के करीब लाती है। दोनो देशो की समान संस्कृति होने से भी भारत नेपाल एक दूसरे के पूरक है।तभी तो यह लगता ही नही कि नेपाल भारत से अलग है।वैसे भी भारत से कब नेपाल मे चले जाते है और कब लौट आते है।पता ही नही चलता।यही स्तिथि भारत मे नेपालियों के लिए भी है।इससे भी दो कदम आगे बढ़कर दोनो देशो के लोगो ने आपस मे रोटी बेटी का रिश्ता कायम करके रही सही दूरी को भी समाप्त प्राय कर दिया है।नेपाल के वीर गजं के व्यापारी शिव गोयल कई पीढ़ियों पहले हरियाणा के हिसार से नेपाल जाकर बस गए थे,लेकिन उनकी शादी नेपाल के बजाए भारत की बेटी से ही हुईं।उनकी पत्नी बिहार के खगडिया की है।उनके बच्चों की ननिहाल भारत मे होने से उनका नेपाल और भारत से निकटता का रिश्ता बन गया है।इसी प्रकार त्रिभुवन विश्व विद्यालय काठमांडू के केन्दीय हिन्दी विभाग की प्रोफेसर डॉ श्वेता दीप्ति भी भारत की बेटी है और नेपाल की बहु के रूप में वहां भारतीय संस्कृति की पताका फैहरा रही है।वे बिहार मे जन्मी व पली बढ़ी है लेकिन ससुराल नेपाल मे होने से उनके दिल मे भी भारत और नेपाल दोनो की इज्ज़त बसती है। नेपाल की अनेक बेटिया भारत में बहु बनकर आई हुई है। जिनके कारण भारत व नेपाल के बीच सामाजिक रिश्ते प्रगाढ़ हुए है।नेपाल की आर्थिकी भी भारत के विशाल बाजार पर ही निर्भर है।केरलिफोनिया का बादाम,चीन की काली मिर्च,छोटी इलायची,तेजपात,सोंफ,जीरा समेत सभी मशालो को दुनियाभर के देशो से नेपाल लाकर ही भारत मे सप्लाई किया जाता है।जिसका एक बड़ा कारण यहां वस्तुओ के आयात निर्यात पर टैक्स का बहुत कम होना है।जबकि भारत मे यह टैक्स यहां से कई गुना है।टैक्स कम होने के बावजूद नेपाल को एक बड़ी आमदनी मसालों के कारोबार से होती है।इसी प्रकार नेपाल मे सोने की गुणवत्ता अधिक व कीमत भारत से कम होने के कारण सोने की खरीद फरोख्त भारतीय लोग बहुतायत मे करते है।उच्च शिक्षा,बेहतर स्वास्थ्य सेवाओ और नोकरियो के लिए भी नेपाल देश,अपने भारत पर निर्भर करता है।जिसके लिए भारत को एक पड़ोसी देश होने के नाते नेपाल मे ही शिक्षा,स्वास्थ्य व नोकरी के अवसर उपलब्ध हो इसके लिए काम करने की आवश्यकता है। भारत चाहता भी यही है लेकिन पिछले कुछ समय से राजनीतिक तल्खी और नेपाल का चीन के प्रति झुकाव बढ़ने के चलते भारत के इस प्रयास में ब्रेक लगे है। नेपाल मे उच्च शिक्षण संस्थान बहुत कम है,अच्छे अस्पतालों की भी कमी है और नोकरियो के अवसर भी बहुत कम है।साथ ही यहाँ व्याप्त गरीबी और क्षेत्रीय स्तर के मतभेद नेपाल की प्रगति मे बाधक है।लम्बे समय तक राजशाही व्यवस्था मे रहा नेपाल अब लोकतांत्रिक व्यवस्था मे है तो भी विकास के मामले मे यह देश तक अभी पिछड़ा हुआ कहा जा सकता है।नेपाल को देखकर लगता है कि जैसे वह कम से कम तीस साल पहले का भारत हो।जिसे मदद करके आगे लाने की नीति बनानी होगी।मीडिया उन्नति मामले में भी नेपाल भारत से बहुत कमजोर है। सामान्यत नेपाल शांत रहने वाला बहुत छोटा देश है। नेपाल मे सात प्रांत और 77 जिले है ।कई प्रान्तों का तो अभी तक नामकरण भी नही हो पाया है।फिर भी कहा जा सकता है कि नेपाल भारत के प्रबल सहयोग से धीरे धीरे विकास की पटरी पर आगे तक जा सकता है जो एक सुखद संकेत हो सकता है भारत के सहयोग से नेपाल की तरक्की ऊंचाइयों को छू सकती है।जिसके लिए दोनो देशो के लोग मन ,वचन और कर्म से तैयार भी है।क्योकि नेपाल मे जाकर भारतीयो को और भारत मे आकर नेपालियों को लगता ही नही कि वे किसी दूसरे देश मे हो।दोनो देशो की अंतरराष्ट्रीय सीमाओ पर भी सुरक्षा प्रहरी नागरिको के साथ मित्रवत व्यवहार करते है।कोई तलाशी नही,कोई छानबीन नही और कोई किसी प्रकार की रोक टोक नही।लगता है जैसे नेपाल ,भारतीयो के लिए अपना दूसरा घर हो।इसी तरह नेपाली भी बेखटके भारत मे बिल्कुल घर की तरह ही आते जाते है।पिछले दिनों दोनो देशो के साहित्यकारों ने पहले मेरठ व फिर नेपाल के वीर गजं मे साहित्यिक महोत्सव करके मित्रता व प्रेम की नई धारा बही है।जिसे भारत व नेपाल दोनो देशो की सरकारो ने भी खुले दिल से समर्थन दिया है।मेरठ मे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल द्वारा नेपाली साहित्यकारों का स्वागत करना और अब नेपाल मे मुख्यमंत्री प्रांत नम्बर 2 लालबाबू राउत द्वारा भारतीय साहित्यकारों का उनके बीच मे आकर स्वागत करने से आपसी सदभाव का सूत्रपात हुआ था।जिसके लिए आगे बढ़ने का निरन्तर प्रयास किया जा रहा है ।इस साहित्यिक आयोजनो से हिन्दी का नेपाली मे और नेपाली का हिन्दी मे अनुवाद की सहमति दोनो देशो को और करीब ला रही।उम्मीद है इस साल फिर नेपाल में जाकर भारतीय साहित्यकार फिर से शांति,भाई चारे व एकता का संदेश देंगे।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है )
ईएमएस/डा श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट/22फरवरी2021