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" पंच धारणाओं से होती है मन पर विजय" : आचार्यश्री आर्जव सागर

07/11/2019


भोपाल (ईएमएस)। परम पूज्य वात्सल्य मूर्ति धर्म प्रभवक आचार्य श्री 108 आर्जव सागर जी महाराज के सासंघ सानिध्य अशोका गार्डन में चल रहे चतुर्मास में 1008 मज्जिनेन्द्र सिद्धचक्र महा मण्डल विधान चल रहा जिसमें इन्द्र कुबेर और साथी सभी इन्द्रों और इन्द्रानियों ने आचार्य श्री के संगीतमय लहरियों में पूजन में बड़ी उत्साह के साथ भक्ति नृत्य किया एवं समिति के अंकित जैन ने बताया कि आज सभी इन्द्र इन्द्राणीयों ने विशेष " वत्तिस अर्ध सिद्ध भगवान के अर्ध समर्पित करने के बाद आचार्य श्री विधासागर महामुनि राज के जयमाला करी गई जिसमें बहार से पधारे श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
आज सभी विधान में सम्मिलित इन्द्र इन्द्राणीयों को यही संदेश दिया कि प्रत्येक मानव को ध्यान धारणा और योग के माध्यम को जरूर अपनाना चाहिए जिससे जीवन अध्यात्मिक ऊंचाई को छू लेता है। आज आचार्य श्री जी ने आशीष वचनों में कहा कि मन पर विजय प्राप्त करने के लिए योगी लोग पंच धारणाओं का आलम्बन लेते हैं जिस कारण उनका मन अपनी आत्मा के ध्यान में लीन हो समता को प्राप्त होता है। इसी का नाम शुद्धोपयोग कहा गया है। आचार्य गूरूवर जी ने आगे बताते हुए कहा कि सामायिक के काल में पृथ्वी धारणा करते समय योगी एक पर्वत पर कमलासन में विराजमान रूप चिंतवन करता है इसी का नाम पृथ्वी धारण है और जब नाभिस्थल के अर्हम से ध्यानग्नि उत्पन्न होती है जो कर्म ईंधन को जलाती प्रतीत होती है इसी का नाम अग्नि धारणा है ,कर्म राख को जो वायु द्वारा पलायन करता है इसी का नाम वायु धारणा है इसी तरह कर्म की राख के स्थल को मेधों की नीर से धुलाते हुए ध्यान करना इसका नाम जल धारणा है।
आशीष वचन में विराम देते हुए कहा कि तथा हि मै ज्ञान, दर्शन, व शुद्ध स्वरूपी और अखण्ड चैतन्य स्वरूप हूँ ऐसा चिंतवन करना यह तत्व धारणा कहलाती है। इस तरह की धारणायें हमारे भटकते मन को एकाग्र करके हमें बाहरी चिन्ताओं और विकल्पों से मुक्त बनाती हुई स्वस्थ कर देती है।
डेविड/ईएमएस 07 नवंबर 2019