लेख

हिंदी राष्ट्रभाषा और जनसंख्या नियंत्रण कैसे करे? (लेखक-डॉक्टर अरविन्द जैन / ईएमएस)

10/06/2019

नयी शिक्षा नीति ने यह स्पष्ट कह दिया हैं की हम हिंदी नहीं थोपेंगे किसी भी प्रान्त या भाषा पर। यह बहुत सही निर्णय हैं। जिस प्रकार हमारे यहाँ जन संख्या नियंत्रण करना असंभव हैं ! जी हां भारत एक लोक कल्याणकारी राष्ट्र हैं जो लोगों के लिए ,लोगों के द्वारा ,लोगों को चुनकर भेजती हैं और चुने हुए प्रतिनिधि विभिन्न दल या विचारधारा के होते हैं और सबके अपने अपने स्वार्थ /हित होते हैं। हम स्वंत्रत होने के बाद स्वछन्द हो गए हैं। कोई भी पार्टी का किसी पर कोई नियंत्रण नहीं हैं।
पता नहीं देश कौन चला रहा हैं भगवान् जो निराकार और साकार दोनों हैं। वह कैसे इतने बड़े देश को नियंत्रित करता होगा। हमारे देश में कई भाषा, जाति ,परम्परा हैं पर भारतीय संस्कृति एक हैं,नियम एक हैं । इस देश का सौभाग्य रहा की कई कार्यकाल आये और चले गए जैसे मुग़ल के पहले और बाद में अंग्रेज आये और चले गए पर कई विरासतें छोड़ गए जो नासूर बनकर अब कैंसर हो गए पर हम जिन्दा हैं और अब इतने अधिक जागरूक हैं की विवाद करना हमारी आदत बन गयी हैं। स्वयं से संघर्ष,परिवार से संघर्ष से ओत प्रोत होकर समाज और व्यवस्थाओं से लड़ने की आदत बन गयी हैं।
हम भारतवासी अपने देश के इतिहास ,संस्कृति सभ्यता की बहुत बड़ाई करते हैं और हमारी छाती फूली नहीं समायी जाती हैं पर हम हम भी असभ्य ,गरीब और अपराधी प्रवत्ति के हैं हममे मानवीय ,नैतिक ,धार्मिक गुण से रहित हैं। हम भाषण बहुत अच्छा देते हैं पर उन पर अमल नहीं करते। देश की स्वतंत्रता के बाद । हमने बहुत शिक्षा का विकास किया और हम अविकसित से विकासशील बनने जा रहे हैं पर हम आज भी मानसिक दारिद्रता से जूझ रहे हैं। छोटी छोटी बातों के लिए अपना तन ,मन ,धन ,समय व्यर्थ में बर्बाद करते हैं !
देश के विकास के लिए बहुत कारक हो सकते हैं पर मूल में जब तक शिक्षा और जनसंख्या जैसे मुद्दों पर अपना चिंतन स्पष्ट नहीं करेंगे तब तक कल्पना करना कोरी हवा में दौड़ना होगा। जी हां। कारण ये मुद्दे जब संकीर्ण मानसिकता के साथ राजनीती से जुड़ जाते हैं तब समस्या सामान्य से असामान्य बन जाती हैं और उसका मूल कारण देश में प्रजातंत्र का होना। हां यह कड़वी सच्चाई हैं ,क्या हम इन विषयों पर जापान ,चीन से कुछ सीख सकते हैं। चीन ने एक समय कानून बनाया की एक से अधिक बच्चे होने पर उनके अभिभावक और संतान को कोई भी शासकीय सुविधा नहीं मिलेंगी और जापान ने स्वन्त्रता के तुरंत बाद वहां उन्होंने अपनी भाषा को राष्ट्रीय भाषा की घोषणा कर दी थी.
हमारे देश में कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा और भानवती का कुनबा जोड़ा। कभी कोई किसी भी बात पर एक नहीं होते हमारे देश के विधायक,सांसद ,मंत्री मुख्य मंत्री ,प्रधान मंत्री आदि बस एक बात पर सब एक हो जाते है वह हैं उनका वेतन ,भत्ता और सुविधाएँ। वो चुनाव में जीतने के बाद देश के दामाद और धरोहर मान लिए जाते हैं और माननीय हो जाते हैं। और उनको देश से कोई मतलब नहीं और इस समय जो चुने गए सांसद है उनमे तो अधिकतम अपराधी हैं और बिना पढ़े लिखे और जो पढ़े लिखे हैं वे और नाकारा। निठ्ठले और बस हल्ला गुल्ला मचाने वाले। उनसे आप कोई भी संविधानिक चर्चा नहीं कर सकते कारण उनकी शिक्षा, दीक्षा संस्कार --विहीन हैं। उनको तो सुविधाएं चाहिए और दलाली से अपने चुनाव में खरच किये धन की वसूली करना हैं। उनके पास देश हित की कोई बात नहीं हैं, स्व-हित पहले हैं।
इस समय जो स्थिति निर्मित हुई हैं उसमे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनना मुश्किल हैं और उसी प्रकार देश में जनसंख्या नियंत्रण पर बात करना भी लाज़िमी नहीं हैं ,कारण यह मुद्दा जातिगत पर रुक जाता हैं। जबकि यह मुद्दा देशके विकास के लिए बहुत जरुरी हैं पर न जाने कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग इसमें भी लाभ देखते हैं। जबकि हम जानते हैं की जनसंख्या को रोक नहीं सकते पर सीमित परिवार बनाया जा सकता हैं जिससे वे बच्चे अच्छे ढंग से पढ़ लिख सके और देश के विकास में भागीदारी निभा सके। आज स्थिति यह है की सामान्य वर्ग का नागरिक तीन वर्गों का लालन पालन कर रहा हैं। सरकार कराधान लगाकर सामान्य वर्ग का खून चूसकर अन्य वर्गों को उपकृत कर, वाह वाही लूट रही हैं।
इस मसलों का निराकरण दो तरीके से हो सकता पहला सर्वसम्मति से निर्णय होना चाहिए यह सबसे सरल सुगम मार्ग हैं अन्यथा वर्तमान सरकार जिसे प्रचंड बहुमत मिला हैं वह अपने अधिकारों का उपयोग करे जैसे राम मंदिर प्रकरण ,काश्मीर में ३७० और ३५ ए धारा हटाना इसी तर्ज़ पर राष्ट्रभाषा और जनसँख्या नियंत्रण के अलावा जो भी देश हित में नियम कानून हों समय समय पर रज़ामंदी से या फिर एकाधिकारवाद से कार्यवाही करे तभी हम विकसित हो पाएंगे अन्यथा हम दिन रात राग अलापते रहेंगे।
देश के विकास में भाषा ,शिक्षा ,स्वास्थ्य,बिजली, सड़क, पानी,रोज़गार ,किसान का बचाव, आबादी,हत्यायें आत्महत्याएं ,बलात्कार ,बिखराववाद का सीमित होना और राजनीती में नैतिकता और शुचिता का होना जरुरी हैं इसके अलावा नागरिक अपने कर्तव्य और अधिकार पर विचार करे , और उनका पालन करे। यह एक पक्ष हैं और दूसरा पक्ष ---
ईति भीति व्यापै नहीं जग में ,वृष्टि समय पर हुआ करे।
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे।।
कभी न चूके धरम से ,पापों को अरि रूप।
हठ से रक्षक मान का, वीर वही सच भूप।।
न्याय करे निष्पक्ष हो ,पालन की रख टेव।
ऐसा भूपति धन्य हैं ,पृथ्वी में वह देव।।
10जून/ईएमएस