लेख

(विचार-मंथन) चुनावी जीत-हार वाले मुद्दों से परे हों देश के विकास की बातें (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

15/04/2019

इस लोकसभा चुनाव के प्रचार-प्रसार को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानों ये चुनाव आते ही इसलिए हैं, ताकि सत्ताधारी दल अपने किए-धरे पर मिट्टी डाल सके और विपक्ष भोली-भाली जनता को भुलक्कड़ साबित कर खुद की जीत सुनिश्चित करने के लिए भविष्य में छुपे भय का अहसास कराता रहे। ऐसे में देश के आमजन से जुड़े आवश्यक एवं गंभीर मुद्दों या मूल-भूत समस्याओं से किसी को कोई सरोकार या कुछ लेना-देना ही नहीं होता है। इसलिए प्रमुख राजनीतिक पार्टियां और कद्दावर कहे जाने वाले नेता चुनाव के दौरान बढ़-चढ़कर जो वादे करते हैं वही जीत के बाद उन्हें चुनावी जुमले करार देने के रिवाज का भी पालन करते दिख जाते हैं। यही नहीं बल्कि जिन मुद्दों के जरिए बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक वोटबैंक को अपने पाले में करने का काम बहुतायत में किया जाता है, जीत हासिल होने के बाद कह दिया जाता है कि पार्टी या सरकार ने ऐसा कभी कोई वादा किया ही नहीं। सरकार में आते ही इन्हें याद हो आता है कि महान देश अपने महान संविधान और पर्याप्त कानून व्यवस्था के जरिए ही तो चलेगा। यूं ही गाल-बजाने वालों की जुबानी जमाखर्च के जरिए कभी कोई सत्ता अपने अंजाम तक पहुंची है जो अब पहुंचेगी। मतलब यहां कथनी और करनी में भयानक अंतर देखने को मिलता है और इसी के साथ जनता भी अपने आपको ठगा महसूस करती रह जाती है। यदि यकीन नहीं आता हो तो देख लें कि किस तरह से पिछले आम चुनाव में मंदिर मुद्दे को भुनाने का काम किया गया और सरकार में आते ही मामला अदालत में विचाराधीन होने और फैसला आने तक खामोश रहने की सलाह भी दे दी गई। इसे लेकर सरकार के सहयोगी और भाजपा के अनुवांशिक संगठन भी उसके खिलाफ बातें करते देखे गए, लेकिन जो होता है सो होता है, की तर्ज पर सब होता चला गया।
इसी प्रकार जो लोग मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग के खुद को हिमायती कहते और विरोधियों से समय-समय पर मुस्लिम तुष्टिकरण के तमगे लेते रहते हैं, उनके राज में आखिर कितने अल्पसंख्यकों का भला हुआ? कभी इन आंकड़ों पर भी बिना किसी पूर्वाग्रह और दुराव-छिपाव के नजर डाल लें, मालूम चल जाएगा कि सभी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे की तरह साबित होने को तैयार बैठे हैं। दरअसल इन मामलों से मालूम चल जाता है कि ये तमाम राजनीतिक चुनावी चोचले हैं, जिनसे सिर्फ और सिर्फ उन्हीं का भला हो सकता है जो इन्हें मुद्दा बनाकर चुनाव जीतने की मंशा से चुनावीसमर में उतरते हैं। कुल मिलाकर ऐसे अवसरवादी कथित नेताओं के लिए ये आमजन की समस्या नहीं बल्कि चुनावी मोहरे होते हैं, जिनकी चाल चलकर वो जीत सुनिश्चित करने के लिए बड़ा दांव खेलते हैं। यहां कहना गलत नहीं होगा कि अधिकांश राजनीतिक पार्टियां और उनके ज्यादातर नेता व सलाहकार तो इस कार्य में मशरुफ नजर आते हैं कि वो चुनाव कैसे जीतेंगे और किन मामलों को उठाने से कौन सा वर्ग उनके समर्थन को आगे आ सकता है। कुल मिलाकर वोट-बैंक वाली मानसिकता संपूर्ण देश के हित को साधने में रुकावट बनती दिखती है। इस पर वाकई गंभीर चिंतन और विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
इसमें शक नहीं कि हमारा भारतीय संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को बराबरी का दर्जा देता है, लेकिन यह राजनीति आम नागरिक को अलग-अलग खंडों में रखकर देखने को मजबूर करती है। कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर, कभी छुआ-छूत और ऊंच-नीच की भावना भड़काकर तो कभी अमीर-गरीब के नाम पर। हद तो तब हो जाती है जबकि क्षेत्रवाद से लेकर बोलचाल और पहनावे से लेकर खान-पान और आचार-विचार से भी लोगों को अलग-थलग करके देखा जाने लगता है। इसके साथ कोशिश होती है कि ये लोग ऐसे तंग मिजाजी हो जाएं कि एक-दूसरे को कट्टर दुश्मन समझ लें। ऐसा होने से चालाक राजनीतिज्ञों को वोटबैंक बनाने और हथियाने में आसानी हो जाती है। इसलिए आरक्षण भी मुद्दा हो जाता है, सीमा पर रहने वाले नागरिक भी मुद्दा बन जाते हैं और रही सही कसर जम्मू-कश्मीर की बर्फीली वादियां जो इंसानी खून से रंगती नजर आ रही हैं वह भी चुनावी मुद्दा बनती दिखती हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव को साधने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों नैशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी को निशाने पर लेना नहीं भूलते हैं। कठुआ में जनसभा को संबोधित करते प्रधानमंत्री मोदी कह जाते हैं कि सूबे को तबाह करने और देश को बांटने में इनका बहुत बड़ा हाथ रहा है। जम्मू-कश्मीर की तीन-तीन पीढ़ियों को महज दो परिवारों ने नोंचा और निचोड़ा है, जिन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने की अपील वो जनता से करते दिखते हैं, लेकिन यहां वो भूल जाते हैं कि महबूबा मुफ्ती की सरकार तो उनके सहयोग से ही चलती रही है, फिर क्या इसमें उनका बराबर का शरीक होना नहीं बनता है। कुल मिलकार मकसद सिर्फ चुनावी जीत तक सिमटकर रह जाता है। सूबे की भलाई के लिए क्या किया जाएगा, इस पर न तो मोदी सरकार ध्यान केंद्रित करती दिखती है और न ही स्थानीय सरकारें ही। इसलिए कहना पड़ जाता है कि जिनके पास देश के बेरोजगारों के लिए बेहतर योजना हो और जो किसी एक राज्य नहीं बल्कि संपूर्ण देश को विकास के पथ पर ले जाने की सोच रखता हो वो सामने आए। अन्यथा जम्मू-कश्मीर के ठप्प पड़े कारोबार को दोबारा पटरी पर लाने का एजेंडा ही बनाकर दिखला दें। मालूम है ये सब ऐसा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उनसे सिर्फ राजनीतिक जीत-हार सधती है घाटी और देश की भलाई नहीं। इसके लिए खुद मतदाता को जागरुक होने की आवश्यकता है।
15अप्रैल/ईएमएस