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परदे के पीछे से चल रही है चुनावी जंग (लेखक - योगेश कुमार गोयल / ईएमएस)

15/05/2019

महासंग्राम-2019 : हिमाचल प्रदेश की रपट)
कुल चार लोकसभा सीटों वाले पर्वतीय राज्य हिमाचल प्रदेश में चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण में 19 मई को मतदान होना है। 2011 की जनगणना के अनुसार 55673 वर्ग किलोमीटर में फैले इस हिन्दू बहुल राज्य की कुल आबादी 6864602 है, जहां 95.17 फीसदी हिन्दू तथा 2.18 फीसदी मुस्लिम हैं। कुछ जिलों में तो हिन्दुओं की आबादी करीब 98 फीसदी तक है और मुस्लिम एक फीसदी से भी कम हैं। यही कारण है कि इस प्रदेश से न कभी कोई मुस्लिम विधायक रहा और न ही सांसद। अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या 1729252 है जबकि अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या 392126 है। राज्य में 20 हजार से भी ज्यादा गांव है और करीब 90 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। कुल 12 जिलों में विभाजित हिमाचल तीन डिवीजनोंशिमला, कांगड़ा तथा मंडी में बंटा है। विधानसभा की कुल 68 सीटें हैं जबकि लोकसभा की कुल चार सीटें हैं, हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी तथा शिमला और इस प्रदेश में चुनावी मुकाबला सदैव भाजपा तथा कांग्रेस के बीच ही होता रहा है।
2014 के लोकसभा चुनाव में 53.85 फीसदी मत प्राप्त करते हुए चारों लोकसभा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज कराई थी जबकि 41.07 फीसदी मत प्राप्त करने के बावजूद कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला था। इस बार भी भाजपा की हरसंभव कोशिश है कि वह पिछली बार की जीत को पुनः दोहरा सके। हालांकि कांग्रेस ने भी चुनावी रण जीतने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी है। 2009 में कांग्रेस को एक तथा भाजपा को तीन सीटों पर जीत मिली थी। 2017 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा कांग्रेस से सत्ता हथियाने में सफल रही थी। तब उसे 48.8 फीसदी मतों के साथ 44 सीटें मिली थी जबकि 41.7 फीसदी मतों के साथ कांग्रेस 21सीटों पर सिमट गई थी। एक सीट पर सीपीआई (एम) तथा दो सीटों पर निर्दलीय अपना परचम लहराने में सफल रहे थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 42.81 फीसदी मत प्राप्त कर 36 सीट हासिल कर सरकार बनाने में सफल हुई थी जबकि भाजपा को 38.47 फीसदी मतों के साथ 26सीटों पर संतोष करना पड़ा था।
इस बार कुल चार लोकसभा सीटों के लिए विभिन्न दलों के कुल 45 उम्मीदवार चुनावी मैदान में किस्मत आजमाने उतर रहे हैं। हालांकि यह तय है कि मुख्य मुकाबला कांग्रेस तथा भाजपा उम्मीदवारों के बीच ही रहेगा लेकिन राज्य के इतिहास में यह पहली बार देखा जा रहा है, जब प्रदेश की राजनीति का कोई भी सूरमा स्वयं चुनावी मैदान में नहीं उतरा है बल्कि तमाम बड़े-बड़े दिग्गज परदे के पीछे से ही अपनी-अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को जिताने के लिए अपनी भूमिका निभा रहे हैं। शांता कुमार हों या वीरभद्र सिंह अथवा प्रेम कुमार धूमल या विद्या स्टोक्स, इनमें से खुद इस बार कोई भी चुनाव मैदान में नहीं है। वास्तव में हिमाचल में इस बार का लोकसभा चुनाव उम्मीदवारों से ज्यादा उन नेताओं के बीच माना जा रहा है, जो खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं लेकिन साख उन्हीं की दांव पर लगी है।
चारों लोकसभा क्षेत्रों का सिलसिलेवार विश्लेषण करें तो सबसे बड़ी हॉट सीट बनी है मंडी संसदीय सीट, जहां से रिकॉर्ड17 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाने चुनाव में कूद रहे हैं। इस हाई प्रोफॅइल सीट से पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुखराम के पोते आश्रय शर्मा चुनावी मैदान में हैं। अब तक आठ बार इस सीट पर सुखराम तथा वीरभद्र सिंह या उनके परिवार ने ही कब्जा किया है लेकिन पिछली बार भाजपा के रामस्वरूप शर्मा यह सीट झटकने में सफल रहे थे और भाजपा ने इस बार भी उन्हीं पर दांव लगाया है। हिमाचल की ‘छोटी काशी’ के नाम से विख्यात यह सीट सुखराम तथा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के लिए निजी प्रतिष्ठा का सवाल बनी हुई है। 93 साल की उम्र में भी सुखराम खुद अपने पोते के लिए प्रचार करते और वोट मांगते घूम रहे हैं। एक ओर जहां मंडी संसदीय क्षेत्र को सुखराम का गढ़ माना जाता रहा है, वहीं जयराम ठाकुर सराज विधानसभा क्षेत्र से जीतकर विधानसभा पहुंचे थे, जो मंडी संसदीय क्षेत्र का ही हिस्सा है, इसलिए वह भी अपना गढ़ बचाए रखने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। कुछ साल पहले सुखराम के कांग्रेस से निष्कासन के बाद भले ही उनकी कांग्रेस में घर वापसी हो गई किन्तु हिमाचल सरकार में मंत्री रहे उनके बेटे अनिल शर्मा भाजपा में हैं जबकि सुखराम का पोता कांग्रेस का प्रत्याशी है। हालांकि अपने बेटे को लोकसभा टिकट मिलने के बाद अनिल शर्मा ने जयराम सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस सीट से प्रत्याशी भले ही रामस्वरूप तथा आश्रय हैं किन्तु वास्तव में परदे के पीछे असली मुकाबला पं. सुखराम और जयराम ठाकुर के बीच ही है। मंडी के बारे में यह भी कहा जाता रहा है कि जो भी पार्टी यहां से चुनाव जीतती है, दिल्ली में उसी की सरकार बनती है। इसलिए भी यह सीट सर्वाधिक चर्चा का केन्द्र बनी हुई है। मंडी संसदीय क्षेत्र की कुल 17 विधानसभा सीटों में से फिलहाल 13 भाजपा के पास हैं और भाजपा इस सीट पर सुखराम तथा वीरभद्र सिंह के बीच बने छत्तीस के आंकड़े का फायदा उठाकर इतिहास कायम करना चाहती है।
हमीरपुर संसदीय सीट से कुल 11 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं और भाजपा के अनुराग ठाकुर चौथी बार सांसद बनने के लिए मैदान में हैं। उनके मुकाबले कांग्रेस ने रामलाल ठाकुर को मैदान में उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी राजेन्द्र सिंह राणा ने अनुराग ठाकुर को चुनौती दी थी किन्तु अनुराग से करीब एक लाख वोटों से हार गए थे। भाजपा को 35 फीसदी मतों के साथ यहां से कुल 448035मत मिले थे जबकि कांग्रेस को 28 फीसदी मतों के साथ 349632 वोट प्राप्त हुए थे। आप प्रत्याशी महज एक फीसदी मतों के साथ 15329 वोट पाने में ही सफल हुआ था।
दो बार हिमाचल के मुख्यमंत्री रह चुके भाजपा के दिग्गज नेता शांता कुमार का गढ़ मानी जाने वाली कांगड़ा संसदीय सीट से 11 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। भाजपा ने कैबिनेट मंत्री और गद्दी समुदाय के किशन कपूर पर दांव खेला है। पिछली बार इस सीट से शांता कुमार ही जीते थे किन्तु शांता कुमार द्वारा इस बार चुनाव लड़ने से इन्कार करने पर उनकी जगह किशन कपूर को मैदान में उतारा गया है, जिन्हें चुनौती देने के लिए कांग्रेस ने जातीय समीकरण साधते हुए पिछड़ी जाति के पवन काजल पर दांव लगाया है। 2014 के चुनाव में विजयी रहे शांता कुमार को 456163 वोट मिले थे जबकि दूसरे स्थान पर रहे कांग्रेस के चंदर कुमार को 286091 वोट मिले थे। यह सीट कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा की झोली में जाती रही है। 1951 में यह सीट कांग्रेस के हेमराज ने जीती थी और उसके बाद लगातार चार बार 1957, 1962, 1967 व 1971 में भी कांग्रेस ने ही यहां से जीत दर्ज की। 1977 में बीएलडी के दुर्गा चंद, 1980 में कांग्रेस के विक्रम चंद, 1984 में कांग्रेस की चंद्रेश कुमारी, 1989 में भाजपा के शांता कुमार, 1991 में भाजपा के डीडीखनोरिया, 1996 में कांग्रेस के सत महाजन, 1998 व 1999 में भाजपा के शांता कुमार, 2004 में कांग्रेस के चंदर कुमार और 2009 में भाजपा के डा. राजन इस सीट से विजयी रहे।
शिमला हिमाचल की एकमात्र आरक्षित सीट है, जहां से कुल छह प्रत्याशी मैदान में हैं। यहां से 2009 से पहले भाजपा कभी भी जीतने में सफल नहीं हुई। उसके बाद वीरेन्द्र कश्यप लगातार दो बार चुनाव जीते। 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से भाजपा के वीरेन्द्र कश्यप 385973 वोट हासिल करके 84187 वोटों के भारी अंतर से जीते थे। उनके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के मोहनलाल को 301786 वोट मिले थे। इस बार भाजपा द्वारा उनकी जगह पच्छाद से बीजेपी विधायक सुरेश कश्यप पर विश्वास जताया गया है जबकि कांग्रेस ने सोलन से अपने विधायक कर्नलधनीरामशांडिल को कड़ी टक्कर देने के लिए मैदान में उतारा है।
जहां तक चुनावी मुद्दों की बात है तो भाजपा जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम और काम के अलावा राष्ट्रवाद तथा सर्जिकलस्ट्राइक के मुद्दे पर चुनावी मैदान में मतदाताओं को रिझाने के लिए उतरी है, वहीं कांग्रेस विभिन्न मोर्चों पर केन्द्र सरकार की विफलता के साथ-साथ कांगड़ा तथा निचले हिमाचल से भेदभाव, हाटी समुदाय को जनजाति का दर्जा न दिए जाने तथा हिमाचल में विकास के मामले में भाजपा सरकार की नाकामी को भुनाने के लिए प्रयासरत है। विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों के अलावा औद्योगिक विकास में कमी के आरोप, फलों पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की मांग, खराब सड़कें इत्यादि भी चुनाव के अहम मुद्दे बने हैं। बहरहाल, अब देखना यह है कि हिमाचल में परदे के पीछे से चल रही चुनावी जंग में भाजपा जीत का अपना पिछला रिकॉर्ड बरकरार रखने में सफल हो पाएगी या कांग्रेस उसकी सीटों में सेंध लगाने में सफल हो पाती है।
15मई/ईएमएस