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(15 अगस्त : रक्षाबंधन पर विशेष) संकल्पों की याद दिलाने वाला त्यौहार है रक्षाबंधन (लेखक-मनोहर पुरी / ईएमएस)

14/08/2019


रक्षा बन्धन एक ऐसा राष्ट्रीय त्यौहार है जो निरन्तर अपना रंग रूप और तेवर बदलता रहा है। यह महापर्व हम सब के लिए एक अमृतमय उद्देश्य लेकर आता है। कहते हैं कि देवासुर संग्राम में जब देवता राक्षसों से जीत नहीं पा रहे थे तो इन्द्राणी ने श्रावण की पूर्णिमा के दिन अभिमंत्रित करके एक रक्षा कवच तैयार करवाया। युद्ध में जाने से पूर्व उसने वह रक्षा कवच इन्द्र की कलाई बांध दिया। इस रक्षा कवच के प्रभाव से देवता युद्ध में विजय प्राप्त कर सके। पौराणिक काल में जो रक्षासूत्र पत्नी ने बांधा बाद में वह बहन के पास चला गया। पति की रक्षा के लिए उसकी कलाई पर राखी बांधने वाली नारी अपनी रक्षा के लिए भाई की कलाई पर राखी बांधने लगी। इसी प्रकार रक्षा सूत्र जो पति की कलाई पर बांधा गया था वह भाई की कलाई पर बंधने लगा। एक अन्य पौराणिक कथा में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इन्द्र की पत्नी ने शिव को राखी बांध कर उन्हें अपना भाई बनाया था। महादेव की कृपा के कारण ही देवों की असुरों पर विजय हुई थी। राखी बांधने का प्रारम्भ इसी कथा के मूल से लिया गया है। यह भी माना जाता है कि सबसे पहली राखी सुभद्रा ने अपने भाई कृष्ण को युद्ध में जाते समय,माता पार्वती द्वारा दिए गए रक्षा कवच के रूप में बांधी थी। कुछ लोगों के अनुसार एक बार किसी कारणवश जब भगवान कृष्ण की अंगुली कट गई और उसमें से रक्त बहनले लगा तब द्रौपउाr ने अपनी नई साड़ी का किनारा फाड़ कर अपने सखा की अंगुली पर बांधा था। ऐसी अनेक पौराणिक कथाओं के कारण तभी से यह विश्वास किया जाता है कि मंत्रों द्वारा पवित्र किए हुए रक्षा कवच को जो व्यक्ति श्रावणी के दिन धारण करता है वह वर्ष पर्यन्त स्वस्थ्य और सुखी रहता है। संक्षेप में रक्षा सूत्र का एक मात्र उद्देश्य है विश्वास दिलाना। पौराणिक काल का यह त्यौहार मध्य युग से होता हुआ आधुनिक काल में पूरी तरह से भौतिकता के रंग में रंग गया है। संकट के काल में भारतीय ललनाओं ने विधर्मियों और अपरिचितों को राखी भेज कर अपने सम्मान की रक्षा की है। इस प्रकार राखी किसी रक्त संबंध अथवा धर्म के साथ जुड़ी हुई नहीं है। राखी रक्षा सूत्र है जिसका अर्थ है रक्षा करने का आश्वासन। आज राखी भाई बहन के शुद्ध प्यार और स्नेह का प्रतीक है। कभी यह ब्रह्मणों का त्यौहार होता था तो उससे पूर्व ऋषि मुनियों के आश्रम में इसे मनाया जाता था।
राखी का अपना अलग इतिहास है। कहा जाता है कि यूनान के शासक सिकन्दर ने जब भारत पर आप्रमण किया तो उसकी बहन रूखसाना ने भारत के पराप्रमी शासक पोरस को राखी बांध कर अपने भाई के लिए जीवन दान प्राप्त किया था। यह मत भी व्यक्त किया जाता है कि पोरस को राखीबंध भाई बनाने वाली नारी सिकन्दर की पत्नी थी और उसने पोरस से यह वचन ले लिया था कि पोरस उसे विधवा नहीं होने देगा। इसी कारण अवसर मिलने पर भी पोरस ने सिकन्दर को नहीं मारा और युद्ध में पराजित होना स्वीकार कर लिया। मध्य युग में चितौड़ की महारानी कर्मवती ने हुमांयू को राखी भेज कर अपने सम्मान की रक्षा की मांग की थी। चितौड़ पर गुजरात के बादशाह ने जब आप्रमण किया तब महाराज उदयसिंह चितौड़ की परवाह न करते हुए रंगरलियों में डूबे हुए थे। तब महारानी कर्मवती ने अपने देश की रक्षा का बीड़ा उठाया और अपनी सहायता के लिए मुगल शासक को राखी भेजी थी। ज्ञातव्य है कि चितौड़ के शासकों एवं मुगलों के मध्य संबंध शत्रुतापूर्ण थे परन्तु राखी की लाज रखने में हुमांयू ने तनिक भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई थी। इतिहास में ऐसे अन्य अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनसे यह ज्ञात होता है कि स्त्रियों ने कई बार नितान्त अपरिचित अथवा शत्रुओं को राखी के माध्यम से अपना भाई बना कर अपने सम्मान की रक्षा की मांग की। इस सन्दर्भ में रानी बेलुनादियार-टीपू सुलतान, चांद बीबी-महाराणा प्रताप, रामजनी-शाह आलम सानी की कथायें सर्वविदित हैं जिनमें परस्पर संबंध राखी के माध्यम से ही बने। आधुनिक युग में कवियित्री महादेवी वर्मा ने मैथिलीशरण गुप्त और उनके भाईयों, सुमित्रानन्दन पंत, इलाचन्द्र जोशी, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद और महाप्राण निराला को राखी के मोहपाश में बांधा हुआ था।
भारत में यह त्यौहार प्राय: हर राज्य में मनाया जाता है। विश्व के अन्य देशों में इस प्रकार का कोई त्यौहार दिखाई नहीं देता। दक्षिण भारत में टीपू सुल्तान को रानी बेलुनादियार ने राखी भेज कर अपने लिए रक्षा प्राप्त की थी। उस काल में राजघरानों की महिलाएं अपने पतियों के हाथों पर रक्षा सूत्र बांध कर उनसे देश और जाति की रक्षा करने का वचन लिया करती थी। उस समय यह धारणा थी कि यदि लड़ाई में जाने से पहले माता, बहिन अथवा पत्नी रण में जाने वाले योद्धा के हाथ पर राखी बांध दे तो वह अजेय हो जाता है। इसी प्रकार यह भी प्रचलन था कि जब कोई नारी अपने आपको असहाय अथवा असुरक्षित महसूस करती थी तब किसी वीर पुरुष को राखी बांध कर अपनी रक्षा के लिए याचना करती थी। प्राय: प्रत्येक राखी पाने वाला वीर अपनी बहन की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करता था।
स्वतंत्रता संग्राम में भी राखी का व्यापक पैमाने पर प्रयोग किया जाता रहा। सन् 1905 में राखी के बंधन का सफल भावनात्मक प्रयोग लार्ड कर्जन के काल में विश्व कवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने किया। बंग भंग के विरोध में निकलने वाले जुलूसों में विश्व कवि आगे आगे चल कर लोगों को राखी बांधते हुए निकलते थे। इस प्रकार वह जन जन में राष्ट्रीय चेतना जागृत करते थे। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने रक्षाबंधन को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया था और बंगाल के लोगों में एकता के प्रति जागृति पैदा कर दी थी। उस समय किस को राखी बांधी जा रही है इस बात का कोई भेद भाव नहीं किया जाता था। इस प्रकार रक्षाबंधन एक ऐसा पर्व है जिसमें संपूर्ण समाज के पारस्परिक संबंधों की सुदृढ़ भावना निहित है। राष्ट्र और राष्ट्रीय मानबिन्दुओं की रक्षा के लिए कर्त्तव्य पर आगे बढ़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति के मन में अपने जीवन से भी अधिक राष्ट्र रक्षा की भावना जागृत रहे इसीलिए उसके रक्षा सूत्र के रूप में कलाई पर बंधा धागा उसे अपने संकल्प की याद दिलाता रहता है। इससे संकल्पों की पूर्णता का लक्ष्य उस व्यक्ति के सामने स्पष्ट रहता है। संभवत: इसी पावन उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमारे मनीषियों ने इस प्रकार के त्यौहार की संरचना की होगी।
प्राचीन काल में गुरू अपने शिष्यों को राखी बांध कर देश और विद्या की रक्षा का वचन लेते थे। कलान्तर में यही परम्परा व्यास पूजा के रूप में भी जानी जाने लगी। श्रावण मास का त्यौहार होने के कारण इसे श्रावणी भी कहा जाता है और इसे श्रावणी की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन शिष्य अपने आश्रमों में अपने गुरूओं की पूजा का आयोजन करते थे। गुरूजनों को आदरपूर्वक आसन पर बिठा कर उनकी पूजा अर्चना की जाती थी। आज भी अनेक स्थानों पर गुरू की पूजा करने का विधान है।
बुंदेलखंड तथा मध्य प्रदेश के कुछ भागों में स्त्रियां अपने भावी पति अथवा पति को भी राखी बांधती हैं। दक्षिण अफ्रीका की एक आदिवासी जाति में पत्नी द्वारा पति को राखी बांधने की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। इस जाति की स्त्रियां वर्ष में एक दिन अपने पति से भाई जैसा प्रेम और स्नेह प्राप्त करने के लिए उसकी कलाई पर राखी बांध कर उसे एक दिन का भाई बनाती हैं। इसके लिए वे प्रात: जंगल में जा कर भउ नामक सतरंगा पुष्प ले आती हैं। इस फूल को रेशमी धागे अथवा सोने की जंजीर में पिरो कर राखी जैसा बना लेती हैं और उसे पति की कलाई पर बांधती हैं। इस अवसर पर घर में पूजा का विशेष विधान होता है। एक विशेष फल से पति का पूजन करके उसकी आरती उतारी जाती है। बांस के रस से बनी मिठाई से मुहं मीठा किया जाता है। राखी बंधवाने के बाद पति अपनी पत्नी को एक ओढनी भेंट में देता है। इस परम्परा में भारतीय परम्परा का भी कोई योगदान अथवा प्रभाव है इस बात की खोज की जानी चाहिए।
भारत के अधिकांश स्थानों पर रक्षा बंधन का पर्व भाई बहन के त्यौहार के रूप में ही मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे सलोने, सलूनी, सलोमण इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। पंजाब में जा कर राखी रखडी बन जाती है। भारतीय संस्कृति में भाई बहन के संबंधों को समाज के पवित्रतम संबंधों के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। जिसे एक बार बहन कह दिया उसकी अस्मिता की रक्षा भाई जीवन भर करता है। आज के युग में जब परिवार में संबंधों के पवित्र रिश्ते धीरे धीरे समाप्त होते जा रहे हैं यह पर्व हमारी प्राचीन आस्थाओं को परस्पर मजबूती देने का कार्य कर रहा है।
ईएमएस/फीचर 14अगस्त