लेख

ठग उद्योगपति और उनके मददगार (लेखक-अजित वर्मा/ ईएमएस)

10/01/2019

विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहूल चोकसी, नितिन और चेतन संदेसरा जैसे कुछ व्यापारियों के कारण निस्संदेह देश के उद्योग जगत का मुँह काला हुआ है और तमाम उद्योगपतियों को शर्मिन्दगी झेलना पड़ी है क्योंकि अंगुलियाँ तो पूरी बिरादरी पर उठ रही हैं। इन भगोड़ों की कारगुजारियों ने 2018 में पूरे भारतीय उद्योग जगत के सामने प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है।
बैंकों के साथ अरबों रुपए की धोखाधड़ी और मनी लांडरिंग के मामलों में नामजद अय्याशी पसंद शराब कारोबारी विजय माल्या, आभूषण कारोबारी चोकसी और नीरव मोदी तो देश के राजनीतिक महाभारत में पक्ष-विपक्ष के बीच अनवरत चलने वाले वाकयुद्ध का हथियार भी बन गए हैं। गुजरात की दवा कंपनी स्टर्लिंग बायोटेक समूह के प्रवर्तक नितिन और चेतन संदेसरा के नाम भी इसी तरह ठगी के कारनामों में सामने आये। ये दोनों 5000 करोड़ की बैंक धोखाधड़ी और धनशोधन अक्षमता मामले में आरोपी हैं। फिलहाल दोनों देश से फरार हैं। उद्योग जगत में 2018 में फोर्टिस और रेनबैक्सी के पूर्व प्रवर्तक सिंह बंधु भी सुर्खियों में रहे क्योंकि दोनों भाइयों के बीच मतभेद मारपीट तक पहुंच गए।
लंदन की अदालत ने माल्या के प्रत्यर्पण की मंजूरी दे दी है। हालांकि माल्या अभी इस आदेश के खिलाफ अपील कर सकते हैं। आने वाले साल में देखना होगा कि कितने कॉर्पोरेट दिग्गज भगोड़ा घोषित होते हैं और क्या कानून का सामना करने के लिए वास्तव में उन्हें भारत लाया जा सकेगा।
यह सच है कि धोखाधड़ी करके फरार हुए इन भगोड़ों को ठग कहा जाएगा लेकिन तब उन नेताओं, अफसरों और बैंक अधिकारियों को भी दल्ला कहा जाना चाहिए, जिनने साँठ गाँठ करके इन धोखेबाजों को मदद की और उन्हें नियम कायदों को ताक पर रखकर जनधन उन पर लुटाया। उन पर उपकार किया और स्वयं भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उपकृत हुए।
तमाम पूंजीवादी देशों में ऐसे साँठगाँठ करने वाले गिरोह समय के साथ उभर आते हैं और देश की अर्थव्यवस्था में सेंधमारी करते हैं। भूमण्डलीकरण के साथ भारत पर चढ़ बैठे पूंजीवाद में भी ऐसे गिरोहों के उभार को अगर असामान्य अपराध नहीं माना जाता तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
यह सच है कि समाजवादी व्यवस्था में भी घपलों-घोटालों की गुंजाइश रहती ही है, लेकिन उनका पैमाना इतना विशाल नहीं होता क्योंकि सब कुछ लोगों की निगाह में जल्दी ही आ जाता है और गिरोह बड़े खेल नहीं खेल पाते। देखना होगा कि व्यवस्था इसे किस रूप में देखती है?
10जनवरी/ईएमएस