लेख

अगला पखवाड़ा न्यायपालिका का (लेखक-ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस)

07/11/2019

देश पर गहरा असर डालने वाले फैसले आएगें....!
आज से शुरू हुआ नया पखवाड़ा देश के सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्रों के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है, क्योंकि इन पन्द्रह दिनों की अवधि में देश की न्यायपालिका इन्हीं क्षेत्रों से जुड़े वर्षों से लम्बित अहम्् फैसले सुनाएगी जो देश में गहरा असर डाल सकते है। ये चार प्रकरण है- राम जन्मभूमि विवाद, सबरीमाला मंदिर विवाद, राफैल खरीदी विवाद और एक स्वयं न्यायपालिका से जुड़ा मुख्य न्यायाधिपति के कार्यालय को आर.टी.आई. के दायरे में लाने का मामला है। चूंकि मौजूदा मुख्य न्यायाधिपति रंजन गोगोई अगले पखवाड़े सेवानिवृत्त हो रहे है, इसलिए उन्होंने संकल्प लिया है कि वे अपनी सेवानिवृत्ति के पूर्व इन चारों अहम्् प्रकरणों पर फैसले सुना कर ही जाएगें। इधर देश के मनोनीत भावी मुख्य न्यायाधिपति जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े ने अभी से न्यायपालिका को आरोपों के कटघरे में खड़े करने के सोशाल मीडिया के कुत्सित प्रयासों को लेकर अभी से चिंता व्यक्त करना शुरू कर दिया है। उनकी दलील है कि न्यायाधीश भी तो आखिर इंसान ही है, सोशल मीडिया की इन से क्या दुश्मनी है? यद्यपि श्री बोबड़े अठारह नवम्बर को देश के 47वें मुख्य न्यायाधीश का पद ग्रहण करेंगे किंतु चूंकि उनका मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायाधीश होने के कारण प्रदेश से गहरा रिश्ता रहा है, इसलिए इस प्रदेश पर उनकी चिंता का गहरा असर होता है। उन्होंने अपनी इसी पीड़ा का सार्वजनिक रूप से इजहार किया। भावी प्रधान न्यायाधीश ने समय पर न्याय देने को प्राथमिकता निरूपित करते हुए कहा कि आज भी देश की अदालतों में एक लाख से अधिक ऐसे मामले है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे है और हर पीढ़ी न्यायालयों के चक्कर लगा लगाकर परेशान रही है, इस परम्परा को अब न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका तीनों को समन्वित प्रयास कर खत्म करना चाहिए और शीघ्र, सस्ता व सुलभ न्याय के संवैधानिक सिद्धांत को अपनाना चाहिए। उनका कहना है कि वे यद्यपि अठारह माह ही प्रधान न्यायाधीश के पद पर रह पाएगें, लेकिन इस दिशा में प्रयास अवश्य करेंगे।
इस मौजूदा पखवाड़े में आने वाले चार अहम्् फैसलों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद का फैसला है, जो पिछले डेढ़ सौ सालों से विवादित है और पांच दशक से भी अधिक समय से विभिन्न न्यायालयों में लम्बित रहा है और अब इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के विरूद्ध याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने व्यक्तिगत दिलचस्पी दिखाकर स्वयं की सेवानिवृत्ति के पूर्व इसे निपटाने का फैसला लिया और लगभग चालीस दिन तक रोजाना इस मामले से जुड़े विभिन्न पक्षों की सुनवाई कर सेवानिवृत्ति तिथि सत्रह नवम्बर से पूर्व इसका फैसला सुनाने की पहल की, और अब जैसे-जैसे फैसले की घड़ी निकट आती जा रही है वैसे-वैसे कानून व्यवस्था से जुड़ी सरकारी एजेंसियां अपनी सतर्कता बढ़ाती जा रही है। केन्द्र ने इस मामले में जहां राज्य सरकारों को सतर्क रहने के निर्देश दे दिए है और राज्य सरकारों ने अभी से अगले दो महीनों के लिए प्रतिबंधात्मक धारा-144 लागू करने के कदम उठा लिए है, वहीं धार्मिक संगठनों पर कड़ी नजर रखना शुरू कर दिया है। इस राम जन्मभूमि के विवाद से जुड़े किसी भी मसले पर धार्मिक व सामाजिक आयोजनों पर प्रतिबंध लगा दिए गए है, क्योंकि सरकार को आशंका है कि अभी चाहे सभी साम्प्रदायिक संगठन सर्वोच्च न्यायालय के भावी फैसले को शांति से स्वीकार करने की बात कर रहे है, किंतु फैसले के बाद कौन सा असंतुष्ट गुट धार्मिक उन्माद फैला दे, कुछ नही कहा जा सकता। इन्हीं सब आशंकाओं को लेकर सरकार व सुरक्षा संगठनों से अभी से सतर्क व मुस्तैद रहने को कह दिया गया है।
वैसे इसी प्रकरण के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने ये संकेत अवश्य दिए है कि इस विवादित प्रकरण के फैसले से कोई भी पक्ष निराश नहीं होगा, क्योंकि हर एक को कुछ न कुछ अवश्य हासिल होगा। किंतु मुख्य विवादित स्थल किसे मिलता है? इस मसले को लेकर फैसले के बाद देश में भावी फैसले को लेकर साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के अनवरत्् प्रयास किए जा रहे है और अच्छी बात यह है कि कुछ मुस्लिम संगठनों ने ही इसकी पहल भी की है, जिसे पूरे देश में सराहा जा रहा है। किंतु राज्य व केन्द्र सरकार को आशंका है कि देश में इस मसले पर सबसे ज्यादा विभाजित मुस्लिम पक्ष है, इसलिए कौन सा पक्ष भावी फैसले को लेकर कब क्या रूख अपना ले कुछ भी कहा नहीं जा सकता, इसी आशंका से इन दिनों पीड़ित है देश के कानून व्यवस्था के रखवाले।
इस राममंदिर प्रकरण के फैसले का इंतजार पूरे देश को है जबकि अन्य तीन प्रकरणों में सीमित वर्गो की दिलचस्पी है, जैसे राफैल सौदे वाले मामले में केवल सरकार पर काबिज राजनीतिक दल व उसके प्रतिपक्षी दलों की। मुख्य न्यायाधीश कार्यालय को आरटीआई के दायरें में लाने में भी सीमित दिलचस्पी ही है। इसी तरह साबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर भी सम्बंधित पक्षों की ही फैसले में दिलचस्पी होगी। इसलिए सबसे अहम्् राम जन्मभूमि के मसले का फैसला होगा, जिसमें पूरे देश की दिलचस्पी होगी, इसीलिए इस अभी से विभिन्न अंदाजों से देखा जा रहा है।
07नवंबर/ईएमएस