लेख

(व्यंग्य) ई वी एम बिकाऊ नही है (लेखक-विवेक रंजन श्रीवास्तव / ईएमएस)

03/12/2018

सब कुछ तो बिक रहा है, बाटल में पानी, मां की कोख, गरीब की किडनी, अफसर की आत्मा, डाक्टर का दिल, संन्यासी का प्रवचन सब कुछ बिकाऊ है। क्रिकेट के खिलाड़ी नीलाम हो जाते हैं हर बरस, सभी की बढ़ चढ़ कर बोली लगाई जाती है। हर चौका, हर छक्का बिकता है। हर केच हर क्लीन बोल्ड पर करोड़ो के व्यारे न्यारे हो जाते हैं। खिलाड़ियो की ड्रेस पर उनके जूते, टी शर्ट पर अंकित लोगो बिकते हैं। टी वी का टाईम स्लाट बिकता है। विज्ञापन होते हैं और फिर उनके भरोसे अच्छा बुरा माल बिकता है, जैसे किस्सागोई में कहानी में से कहानी निकलती है, ठीक उसी तरह बिकने बिकाने का सिलसिला चलता है। प्रियंका चोपड़ा ने अपनी शादी के कैमरे शाट्स ही बेच कर मिसाल बना ली है। गरीब का दर्द और किसान का कर्ज, वोट में तब्दील करने की टेक्नीक हमारे नेताओं ने डेवेलेप कर डाली है। ऐसे माहौल में केवल नेता का चरित्र बाजार में आ जाये तो उस पर प्रश्न चिन्ह क्यो ? हार्स ट्रेडिंग का टाईम आ रहा है। बेचारी मूक विषपाई ई वी एम को, चुनाव आयोग ने किसी कुलीन संयुक्त परिवार की बहू की तरह हार के सारे दोष अपने उपर लेने के लिये तैयार कर दी गई है। जैसे परिवार में किसी से भी कुछ भी गलती हो घूम फिर कर उसका दोष बहू पर मढ़ दिया जाता है, ठीक उसी तरह जब चुनाव हुये हैं तो हार जीत तो होनी ही है, हार की संभावना वाले दल और प्रत्याशी ई वीएम पर दोषारोपण की तैयारी में हैं। कोई ई वीएम को अदालत में घसीट उसका चीर हरण करने पर आमादा दिखता है तो कोई उस पर ताने कस रहा है और अपनी अलोकप्रियता का ठीकरा ई वी एम के सर फोड़ने की तैयारी में है। पर मैं खुश हूं कि ई वी एम बिकाऊ नही है। जैसे कि आज की तारीख तक मेरी बीबी का प्यार और मेरी कलम दोनों अनमोल है, बिकाऊ नही हैं, ई वी एम की तरह। हां मेरी पूरी सैलरी भी मेरे परिवार की मुस्कान खरीदने हेतु कम पड़ रही है, यह गम जरूर है। देखें नई सरकार हमारी खुशियां खरीद कर हम तक पहुंचा पाती है या नही।
03दिसम्बर/ईएमएस