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(लेख) न्याय के नाम पर गरीब-अनपढ़ों से अन्याय (लेखक-दीपक राय / ईएमएस)

11/07/2019

नगर निगम के अफसरों को क्रिकेट के बल्ले से खुलेआम पीटने वाले विधायक आकाश विजयवर्गीय को 4 दिन में ही जमानत मिल गई। इंजीनियर पर हमला करवाने वाले कांग्रेस विधायक नीतेश राणे खुलेआम घूम रहे हैं। इन मामलों ने न्याय व्यवस्था पर फिर नई बहस छेड़ दी है। कुछ लोग इसे भारत में जर्जर न्याय व्यवस्था के रूप में देखते हैं। न्यायिक सुधार के समर्थकों की लोकप्रिय सूक्ति है- 'न्याय में देरी अन्याय है।Ó अर्थात किसी व्यक्ति को न्याय तो मिलता है, लेकिन उसमें देरी होती है तो वह न्याय नहीं, बल्कि अन्याय है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और दूसरी बड़ी आबादी वाले भारत में उक्त सूक्ति अक्षरश: साबित होती है। आईये कुछ तथ्यों पर गौर करते हैं तो जो इस तथ्य का समर्थन करते हैं। देश की जि़ला एवं अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 2 करोड़ 60 लाख से अधिक है। देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में 58 हजार 669 मामले लंबित हैं। इनमें से 26 केस 25 सालों से, 100 केस 20 सालों से, 593 केस 15 सालों से और 4 हजार 977 केस पिछले 10 सालों से लंबित हैं। देश के 24 हाई कोर्ट में 43 लाख केस लंबित हैं। 2016 की एनसीआरबी की रिपोर्ट के मानें तो देश की 1,400 जेलों में 4 लाख 33 हजार 003 कैदी बंद हैं। इनमें सबसे अधिक 67 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं। 1 लाख 35 हजार 683 कैदी दोषी पाए जा चुके हैं, जबकि 2 लाख 93 हजार 058 कैदी विचाराधीन हैं। 3,089 निरुद्ध किये गये थे। 1,942 बच्चे बिना वजह अपनी माताओं के साथ जेल में हैं। विचाराधीन कैदी ऐसे कैदी जिसे अदालत ने दोषी कऱार नहीं दिया हो और उसके खिलाफ चल रहा मामला अदालत में लंबित हो। वे इसलिए जेलों में कैद पड़े हैं क्योंकि एक नियत समय के बाद उन्हें रिहा करने का तंत्र अभी तक हमारी जेल प्रणाली विकसित नहीं कर पाई हैं। बीबीसी हिन्दी की एक रिपोर्ट के मुताबिक जेलों में बंद 74 प्रतिशत कैदी या तो अनपढ़ हैं या फिर दसवीं कक्षा तक ही पढ़े हुए हैं। वे गरीब हैं और जमानत के लिए या वकील के लिए उनके पास पैसे नहीं होते। वे जेल में सड़ते रहते हैं। कोर्ट के पास उनके मामले सुनने के लिए समय नहीं होता और उन्हें आजादी के बजाय तारीख पर तारीख ही नसीब होती है। 4 सितंबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर जि़ला एवं सत्र न्यायाधीशों को निर्देशित किया था कि वो जेलों का निरीक्षण करें और ऐसे कैदियों को निजी मुचलके पर रिहा करें, जिनका मामला लंबे समय से विचाराधीन है। उन्होंने संभावित सज़ा का आधा समय जेल में बिता दिया है। हालांकि सीआरपीसी की धारा 436 ए के तहत ऐसा प्रावधान है, कि संभावित सज़ा का आधा समय अगर किसी कैदी ने विचाराधीन कैदी रहकर गुज़ार दिया हो, तो उसे निजी मुचलके पर ज़मानत दी जा सकती है। मगर इस प्रावधान के बावजूद लम्बी खिंचती हुई क़ानूनी प्रक्रिया की वजह से विचाराधीन कैदी सालों तक जेलों में बंद रहते हैं। उन्हें राहत नहीं मिल पाती। देश में जजों की संख्या भी एक समस्या है। केंद्रीय कानून मंत्रालय के मुताबिक मार्च 2018 तक देश में करीब 6,160 जजों की कमी थी, जिनमें 5,000 से अधिक पद निचली अदालतों में थे। हाई कोर्ट में जजों के स्वीकृत 1079 पदों में से 403 खाली थे। हालांकि सरकार और न्यायपालिका ने उच्च स्तर पर न्यायिक सुधार की पुरजोर कोशिश की है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट में 11 साल पर जजों की निर्धारित संख्या (31) पूरी हो पाई है। साल बाद अब सुप्रीम कोर्ट में जजों की कुल संख्या 31 है। लेकिन बड़े सुधार मुुंह बाएं खड़े हैं। हाल ही में प्रधान न्यायाधीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जजों की संख्या 37 और सेवानिवृत्ति की उम्र 62 वर्ष से 65 वर्ष करने का आग्रह किया है।
जन प्रतिनिधियों के लिए विशेष न्यायालय बनाए गए हैं तो विचाराधीन कैदियों के लिए ऐसे प्रयास क्यों नहीं किये जाते?
सड़क से लेकर संसद तक वीवीआईपी सुविधा लेने वाले सांसद, विधायकों को क्या न्यायपालिका में भी आरक्षण मिल रहा है? यह महज आरोप नहीं हैं। गंभीर अपराध करने वाले माननीयों को दूसरे ही दिन सुनवाई की तारीख मिल जाना इस बात के पुख्ता सबूत हैं। सुनवाई के बाद तत्काल जमानत मिल जाना इस बात की पुष्टि कर देता है।वर्ष 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देशभर की अदालतों में करीब साढ़े तीन करोड़ केस लंबित हैं। इन मामलों में 87.5प्रतिशत मामले जिला और निचली अदालतों में सुनवाई को इंतजार में तारीख पे तारीख झेल रहे हैं। इन मामलों को निपटाने के लिए 2373 अतिरिक्त जजों की आवश्यकता है। निचली अदालतों में 2279 जज, हाईकोर्ट में 93 जज और सुप्रीम कोर्ट में एक जज की नियुक्ति से इन मामलों को तेजी से निपटाया जा सकेगा। अब सरकारों को, समाजसेवियों को, न्यायपालिका को इस विषय पर स्वत: संज्ञान लेना चाहिए कि क्यों न आम आदमी को भी समय पर न्याय दिया जाये। क्यों बेवजह किसी को जेल में ठूंसकर रखा जाये। क्यों किसी के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृति जीवन को जेल की चारदीवाहरी पर कैद किया जाये। न्यायिक हिरासत में विचाराधीन कैदियों को वर्षों तक जेल में बंद हैं। 90 दिनों में चालान पेश करना जरूरी होता है। पुलिस और जांच एजेंसियां समय पर चालान पेश नहीं करतीं हैं। गरीबों के पास जमानत और फीस के पैसे नहीं होते। अपराध में जितनी सजा है उससे ज्यादा अवधि से कैदी जेल में बंद हैं। न्यायालयों में पेशी बढ़ती चली जाती हैं। निचली अदालतें, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करती हैं। न्याय के नाम पर न्यायपालिका ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों का जाने-अनजाने में हनन कर रही हैंं। निचली अदालतों में मुकदमें के निपटारे की समयसीमा तय नहीं है। निचली अदालतों, सत्र न्यायालयों, हाई कोर्ट में मुकदमों की संख्या के अनुपात में जज उपलब्ध नहीं हैं। जिसका खामियाजा गरीब एवं मजबूरों को भुगतान पड़ता है। कानून के द्वारा ही उनके संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है।
दीपक राय/11 जुलाई २०१९