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(विचार-मंथन) कौन बतलाएगा आईने के सामने खड़े इंसान का चरित्र? (लेखक- डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

16/05/2019

लोकतांत्रिक महासमर के अंतिम चरण की बाजी किसी भी कीमत पर जीत लेने के लिए तमाम राजनीतिक दल और नेता अपने-अपने तरकश में बच रहे तीरों का बेजा स्तेमाल करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। ऐसे में एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश में ये नेता भूल जाते हैं कि जो बात दूसरों पर लागू होती है वही उन पर भी लागू होनी चाहिए। स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल करने के लिए जिस तरह से कांग्रेस नेताओं को सत्ता पक्ष ने घेरने का काम किया है, दरअसल वही सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बयानों पर भी लागू होना चाहिए। फिर यह भी देखा जाना चाहिए कि किस तरह से देश के शहीद भूतपूर्व प्रधानमंत्री के लिए भ्रष्टाचारी नंबर एक जैसे जुमले का इस्तेमाल किया गया। शहीद पिता पर आरोप लगाते हुए बेटे राहुल गांधी को घेरना कहां से उचित ठहराया जा सकता है। इसका तो यही मतलब निकलता है कि सत्ता पक्ष कुछ भी कहे या करे वह ठीक है, बाकी उनकी नकल भी यदि विपक्षी लोग कर जाएं तो वो सबसे बड़ा गुनाह हो जाता है और इसी के साथ वे सजा के हकदार हो जाते हैं। ऐसे ही 'अमीर' लोगों के लिए शायर ने क्या खूब कहा है कि 'जिनके आंगन में अमीरी के शजर लगते हैं, उनके हर ऐब जमाने को हुनर लगते हैं।' अर्थात जो अमीर होते हैं उनके दोष भी लोगों को उनकी अक्लमंदी वाले नुस्खे लगने लगते हैं और उन्हें ही वो सलाम करते हैं। इसलिए जब कोलकाता में अमित शाह के रोड शो के दौरान हंगामा होता है तो कहना पड़ जाता है कि यह तो चुनाव जीतने की एक चाल रही है, जिसे जानबूझकर चली गई और पश्चिम बंगाल के बहाने समस्त देश का ध्यान आकर्षित कर लिया गया। इससे पहले तक श्रीराम मंदिर को लेकर अयोध्या को मथने का काम किया जाता था। हिंसा हो, लोग एक-दूसरे का सिर फोड़ें, घर जलाएं या फिर कत्लेआम हो जाए, लेकिन जीत का मंत्र अप्रभावी सिद्ध नहीं होना चाहिए। अब चूंकि राम के नाम पर केंद्र में सत्ता हासिल की जा चुकी है अत: अब दूसरे फार्मूले को लागू किया जा रहा है। इस बार पश्चिम बंगाल को केंद्र में रखकर सारी योजनाएं और चुनावी एजेंडे तैयार किए गए थे, इसलिए अंतिम क्षणों में भी वह सुर्खियों में बना हुआ है। देश में क्या हो रहा है और देश का मतदाता क्या चाहता है, उसकी मूलभूत समस्याएं और आवश्यक्ताएं क्या हैं और इनकी पूर्ति और समाधान कैसे होगा, जैसे तमाम सवालों से तो मानों किसी को कोई सरोकार ही नहीं है। सभी का ध्यान तो इस बात पर लगा हुआ है कि पश्चिम बंगाल में अब क्या होने जा रहा है और किस पर कौन भारी पड़ने वाला है। इसके चलते ही मीडिया भी शाह के रोड शो को बहुत ज्यादा तवज्जोह देता दिखता है। प्रमुखता से खबरें आती हैं कि कोलकाता में शाह के रोड शो के दौरान हंगामा हो गया। शाह समर्थक और ममता समर्थक आपस में भिड़ गए। इसी बीच शाह जिस वाहन पर सवार थे, उस पर भी लाठी-डंडे फेंके गए। रोड शो के दौरान पत्थर फेंके जाने और आगजनी करने के समाचार तो ऐसे आते हैं मानों प्रायोजित किए जा रहे हों। वहीं दूसरी तरफ हिंसा होती देख पुलिस लाठीचार्ज करती है, जिसके बाद शाह अपना रोड शो खत्म कर रवानगी ले लेते हैं। इससे पहले तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती आई हैं कि इस तरह की रैली और सभाओं से हिंसा भड़कने का अंदेशा है, इसलिए उन्होंने शुरु में तो इसकी इजाजत भी नहीं दी थी, लेकिन मामला अदालत तक पहुंचा और बीच का रास्ता निकालते हुए चुनिंदा कार्यक्रमों को करने के लिए कह दिया गया। चुनाव आचार संहिता को देखते हुए तृणमूल प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि भाजपा चुनाव में अनाप-शनाप पैसा खर्च कर रही है, लेकिन उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद कहा था कि कोलकाता में शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े-बड़े कटआउट लगाए गए हैं और इस तरह से भाजपा यहां काफी पैसा खर्च कर रही है। इसके साथ ही सवाल भी किया गया कि चुनाव आयोग आखिर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करता? बहरहाल एक सियासी चाल से पूरा नजारा ही बदल गया लगता है, क्योंकि अब फरियादी खुद आरोपी के कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है। दरअसल चुनावी हिंसा के बाद केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण और मुख्तार अब्बास नकवी की अगुआई में भाजपा के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से शिकायत करते हुए कहा है कि ममता को पश्चिम बंगाल में प्रचार से रोका जाना चाहिए क्योंकि राज्य में संवैधानिक तंत्र खत्म हो गया है। अब पश्चिम बंगाल के मामले में भाजपा चुनाव आयोग से तुरंत दखल चाहता है, ताकि निष्पक्ष चुनाव हो सकें। वहीं दूसरी तरफ ममता एक रैली के दौरान कहती हुई नजर आती हैं कि मोदी से सावधान रहने की आवश्यकता है, क्योंकि वे हिटलर से भी ज्यादा खतरनाक हैं। यदि वे दोबारा सत्ता में आ गए तो देश को बेच देंगे। आरोप है कि भाजपा ने चुनाव के लिए हवाला के जरिए राज्य में पैसा लाया है और वह राज्य की मशीनरी को हाइजैक कर लिया है। आरोप गंभीर हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है, क्योंकि इस बात की शिकायत तो पहले ही की जा चुकी है कि उनके बताए तथ्यों पर भी कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा है और जो मन में आ रहा है भाजपा किए जा रही है। जहां तक शाह के रोड शो के दौरान हिंसा का सवाल है तो इस मामले में ममता की भाषा भी सधी हुई नहीं थी, उन्होंने भी अनेक दफा इस तरह के शब्द उपयोग में लिए, जिन्हें उनकी आक्रामकता के सुबूत के तौर पर पेश किया गया। यहां चुनावी सभा में ममता कहती दिखती हैं कि ‘भाजपा ने पहले ही हिंसा की योजना बना रखी थी। उन्होंने बाहरी गुंडे-बदमाश बुलवाकर कोलकाता यूनिवर्सिटी कैम्पस में हमला करवाया।' इस पूरे मामले में पुलिस का पक्ष भी काबिले जिक्र है, जिसमें बताया गया है कि 'कलकत्ता यूनिवर्सिटी के सामने तृणमूल छात्र परिषद और लेफ्ट विंग के कार्यकर्ताओं ने शाह के खिलाफ नारेबाजी की और काले झंडे लहराए। वहीं पत्थरबाजी भी हुई और भाजपा व तृणमूल कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए। इसी दौरान विद्यासागर कॉलेज में लगी ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति को तोड़ दिया गया। कुल मिलाकर चुनाव के नाम पर होने वाली हिंसा को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है, इसके लिए सख्त कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। जहां तक राजनीतिक तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप का सवाल है तो इन नेताओं को वाकई आईने के सामने खड़े होकर पूछना चाहिए कि आमचुनाव के लिहाज से उनका चरित्र कैसा है? अब चूंकि आईना है तो वह झूठ नहीं बोलेगा और सामने वाले को वह उसी अंतरआत्मा की आवाज ही लगेगी। वैसे यहां बतला दें कि आईने उन्हें ही जवाब देता है जो पानीदार और ईमान के पक्के होते हैं, झूठे और फरेबी इंसानों के लिए आईना महज एक कांच का तुकड़ा होता है, जिसमें बाहरी छवि दिखाई दे जाती है।

16मई/ईएमएस